वर्ल्ड कप 2019 में धोनी पर होगा दारोमदार: नज़रिया

    • Author, नीरज झा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

क्रिकेट वर्ल्ड कप एक ऐसा त्यौहार है जहाँ पूरी दुनिया से इस खेल के युद्धवीरों का जमघट हर चौथे साल लगता है. पिछले कुछ सालों में वैसे तो क्रिकेट के फॉर्मेट में कई बदलाव आये.

20-20 ने तो इसको खेलने और देखने का तरीका ही बदल दिया लेकिन 50 ओवर वाले वर्ल्ड कप की भारत में अपनी एक अलग जगह और पहचान है और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है 1983 का वर्ल्ड कप.

1983 वर्ल्ड कप- लॉर्ड्स का वो मैदान जहाँ भारत पहली बार इस महासंग्राम के फाइनल में पहुंचा था और शायद ही किसी ने उस समय सपने में भी सोचा होगा कि वो कप उनके नाम होगा. कपिल देव के सामने वेस्टइंडीज की धुरंधर टीम फिर से इस कप पर कब्ज़ा जमाने की पूरी तैयारी में थी. उस समय कपिल की सेना ने मैदान में ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक की जिससे वेस्टइंडीज के सारे दिग्गज धराशायी हो गए. इस वर्ल्ड कप ने हिन्दुस्तानियों का ना सिर्फ़ दिल जीता बल्कि इस खेल को आज जो लोकप्रियता हासिल है, उसकी शुरुआत यहीं से हुई थी.

इस जीत से भारत में कपिल देव रातों-रात स्टार बन गए और उस समय के युवा खिलाडियों को भी इस खेल में करियर की संभावना दिखनी शुरू हो गई. उसके बाद से इस खेल ने भारत को कई स्टार खिलाड़ी दिए. चाहे 90 के दशक के सचिन तेंदुलकर हो या फिर सौरव गांगुली, अनिल कुंबले, युवराज सिंह, महेंद्र सिंह धोनी और अभी के विराट कोहली.

धोनी युग, जब चोटी पर था भारतीय क्रिकेट

इन नामों में से एक नाम ऐसा है जिस पर हिंदुस्तान के खेल-प्रेमी अटक जाते है वो है धोनी. अटकना स्वाभाविक है और सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों ने इसे धोनी युग का नाम दे दिया है, वजह ये है कि भारतीय टीम ने उनकी कप्तानी काल में ऐसे ऐसे कारनामे किए जो कभी पहले हुआ ही नहीं था.

वो ऐसे अकेले कप्तान हैं जिन्होंने भारत को 2007 में हुए पहले टी-20 वर्ल्ड कप में ख़िताब दिलाया, 2011 में कपिल देव के बाद वर्ल्ड कप जीतने वाले दूसरे भारतीय कप्तान बने.

यही नहीं, 2013 में इंग्लैंड में हुए चैंपियंस ट्रॉफी पर कब्ज़ा कर आईसीसी की इन तीनों ट्रॉफियों पर भारत की मुहर लगा दी. इनकी कप्तानी में कोई ऐसी चीज़ बची नहीं चाहे वो टेस्ट हो या फिर कोई और फॉर्मेट. लगातार तीन सालों (2011, 2012 और 2013 ) तक भारत इनकी कप्तानी में आईसीसी टीम ऑफ़ द ईयर का ख़िताब जीतता रहा.

तभी ऑस्ट्रेलियाई खिलाडी मैथ्यू हेडन कहते है "आप धोनी को जानते हैं, वह सिर्फ़ एक खिलाड़ी नहीं है, वह क्रिकेट का एक युग है. कई मायनों में, मुझे लगता है कि एमएस गली क्रिकेट टीम के कप्तान की तरह है, वह हम में से एक हैं, वह टीम के लिए कुछ भी कर सकते हैं.''

2019 वर्ल्ड कप में क्या होगा धोनी का रोल

हो सकता है कि एमएस धोनी का ये आखिरी विश्व कप हो लेकिन इसमें शायद ही किसी को संदेह होगा है कि विकेटकीपर-बल्लेबाज़ धोनी को 2019 वर्ल्ड कप में जगह मिलनी चाहिए या नहीं. उनके बिना भारत के मध्य क्रम के बल्लेबाज़ी अधूरी है. वो अपने बल्ले से ही नहीं बल्कि विकेटों के पीछे भी खेलते हैं और टीम को विकेट दिलाने में उनका अहम रोल होता है.

विराट कोहली की गिनती दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में होती है और अभी भी आईसीसी रैंकिंग में वो अव्वल हैं लेकिन जब कप्तानी की बात आती है तो धोनी उनसे बहुत आगे है.

क्रिकेट विश्लेषक तो ये भी मानते है कि धोनी के बाद किसी को कप्तानी की पूरी समझ है तो वो रोहित शर्मा हैं और उसका सबसे अच्छा उदाहरण है आईपीएल- जहां विराट पूरी तरह से विफल रहे हैं.

खै़र कप्तानी तो विराट के हाथों में ही रहेगी लेकिन अगर आपको सही सलाह देने वाला मिल जाए तो आप टीम को शीर्ष पर ले जा सकते हैं. धोनी, कोहली के अब तक के सर्वश्रेष्ठ सलाहकार रहे हैं, चाहे वो डीआरएस हो या फिर फील्डिंग प्लेसमेंट या गेंदबाजी में बदलाव करना. हर मोर्चे पर धोनी का रोल रहा है और रहेगा. साथ में रोहित जैसे कप्तान का भी टीम में होना भी विराट के लिए फायदेमंद ही साबित होगा.

विकेट के पीछे रहकर जिस तरीके से धोनी ने अब तक डीआरएस वाले मामलों में सफलता हासिल की है वो शायद ही किसी और ने की होगी. वो जिस तरह बिजली की गति से स्टंपिंग करते हैं, वो टीम के लिए बोनस साबित होता रहा है. ऐसे अनुभव के होने से युवा खिलाडियों को भी प्रेरणा मिलती हैं, खासकर ऐसे खिलाड़ी जो पहली बार विश्व कप खेलने जा रहे हों.

हमने धोनी का विकेट-कीपिंग कौशल देखा है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि विकेट के पीछे से जब वो स्पिनरों का मार्गदर्शन करते हैं और तेज़ गेंदबाजों को स्थिति के मुताबिक बताते हैं कि गेंद कहां डालनी है, सर्कल के अंदर फील्डर्स का समायोजन भी करते है.

विराट, शानदार क्षेत्ररक्षण के कारण उनके लिए लंबे समय तक बाउंड्री लाइन के आसपास फील्डिंग करते है और उनके लिए बैक-वार्ड ,पॉइंट फील्डिंग में बदलाव करना मुश्किल होता है. इस मसले का हल धोनी निकालते है और कोहली के साथ-साथ पूरी तरह से फील्डिंग बदलाव करते रहते है. ऐसा इसलिए भी संभव हो पाता है क्योंकि विराट और धोनी के बीच ट्यूनिंग भी अच्छी है.

ऐसा क्या ख़ास है धोनी में?

भारत के पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर मानते है कि धोनी भारत के विश्व कप अभियान में जीत की तावीज़ साबित हो सकते है. धोनी इस साल इंडियन प्रीमियर लीग में शानदार फॉर्म में रहे हैं. चेन्नई सुपर किंग्स के लिए 12 इनिंग्स में 416 रन बनाए. गावस्कर को लगता है कि इंग्लैंड में 30 मई से शुरू होने वाले इस मेगा-इवेंट में भारत के लिए धोनी महत्वपूर्ण होंगे ना सिर्फ अपनी बल्लेबाज़ी की बदौलत बल्कि अपने अनुभव से भी.

गावस्कर ने पीटीआई से बातचीत में कहा था, "मुझे लगता है कि यह बहुत महत्वपूर्ण होगा क्योंकि हमारे पास एक शानदार टॉप-थ्री है. लेकिन अगर टॉप-थ्री अपना सामान्य योगदान नहीं देते हैं, तो धोनी का योगदान क्रम से नीचे है, चाहे वह नंबर चार पर हो या पांच पर. बात डिफेंडिंग टोटल की हो या फिर टीम की जीत सुनिश्चित करने की, ये उनकी बल्लेबाज़ी ही तय कर सकती है.

गावस्कर कहते है कि ''धोनी 2011 विश्व कप जीत के लिए भारत का नेतृत्व कर चुके हैं और उनका ये अनुभव उन्हें और अधिक मूल्यवान बना देगा. जब आपके पास कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो वास्तव में उस तनावपूर्ण स्थिति में खेल चुका है और टीम को जिता चुका है, तो वो आपकी टीम की शक्ति बन जाता है. इसलिए धोनी का योगदान बड़े पैमाने पर होने वाला है."

ऋषभ पंत, धोनी या फिर कार्तिक

टीम सेलेक्शन से पहले धोनी को टीम में जगह देने पर कई पूर्व खिलाड़ी आपस में सहमत नहीं थे. कुछ मानते थे कि युवा ऋषभ पंत ज़्यादा कारगर साबित हो सकते हैं. टीम सेलेक्शन से पहले हरभजन सिंह का मानना था कि धोनी के लिए बैकअप की कोई ज़रूरत ही नहीं है, अगर धोनी वर्ल्ड कप के दौरान चोटिल होते हैं तो केएल राहुल भी विकेट-कीपिंग करने में सक्षम हैं.

हरभजन कहते है, 'उनके साथ क्रिकेट खेलता हूँ और मुझे पता है कि उनके पास स्वास्थ्य को लेकर कुछ मुद्दे हैं, लेकिन अपने अनुभव से धोनी जानते हैं कि उन सभी मुद्दों के साथ भी कैसे खेलना है.'

हालांकि दिनेश कार्तिक को टीम में दूसरे विकेट कीपर के तौर पर जगह ज़रूर मिली है लेकिन उन्हें तभी मौका मिलेगा जब धोनी किसी चोट की वजह से खेलने में सक्षम नहीं होंगे. खुद दिनेश मानते है की वर्ल्ड कप में वो फर्स्ट एड बॉक्स की तरह जा रहे है और अगर धोनी चोटिल हुए या फिर अपनी बैक इंजरी की वजह से नहीं खेल पाए तभी उन्हें अंतिम ग्यारह में जगह मिल पायेगी.

लोग धोनी को कैप्टन कूल इसलिए भी कहते है क्यूंकि वो अपने फॉर्म की परवाह किए बगैर टीम को आगे रखते है. मैदान पर अपनी भावनाओं पर जितना उनका नियंत्रण होता है, वो शायद ही हमने किसी कप्तान में देखा होगा.

2011 विश्व कप से पहले वो अपने साथी क्रिकेटर्स से व्यक्तिगत रूप से बात करते थे और उन्हें उनकी जोन में लाने में मदद करते थे. उनका इस वर्ल्ड कप टीम में होना कहीं न कहीं मील का पत्थर साबित हो सकता है.

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