लोकसभा चुनाव 2019: प्रतापगढ़, जहां राजघरानों के ही इर्द-गिर्द घूमती रही सियासत

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, प्रतापगढ़ से, बीबीसी हिंदी के लिए

दोपहर के क़रीब डेढ़ बजे हैं. प्रतापगढ़ ज़िले के रानीगंज बाज़ार से नौ किमी दूर भटनी गांव में कांग्रेस उम्मीदवार राजकुमारी रत्ना सिंह के समर्थन में जनसभा चल रही है. मंच की कुर्सियां अभी खाली पड़ी हैं लेकिन शामियाने के नीचे रखी कुर्सियों पर लोग बैठे हैं. कुछ लोग पेड़ों के नीचे भी कुर्सियां लगाकर भाषण सुन रहे हैं.

कड़ी धूप और गर्मी से बेहाल लोग उठकर चले न जाएं, इसलिए लोकगायकों और गायिकाओं की एक टोली लगातार उनका मनोरंजन कर रही है. कुछ दूरी पर एक चाट वाले ने भी माहौल देखकर अपना ठेला लगा दिया है और खीरे-ककड़ी वालों की तो जैसे 'चांदी' हो गई है. मंच से उद्घोषक बार-बार घोषणा करता है- "हमारे जनप्रिय नेता प्रमोद तिवारी जी का हेलीकॉप्टर बहुत जल्द हवा में मंडराने वाला है."

दरअसल, ये लोग कांग्रेस उम्मीदवार राजकुमारी रत्ना सिंह, प्रतापगढ़ के दिग्गज कांग्रेसी नेता और पूर्व सांसद प्रमोद तिवारी और विधयाक आराधना मिश्रा 'मोना' के इंतज़ार में बैठे हैं.

ठीक उसी समय दर्जनों लक्ज़री गाड़ियों का एक लंबा काफ़िला वहां से गुज़रता है. आगे की गाड़ी पर कुंडा से निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह 'राजा भैया' बैठे हैं और पीछे चल रही गाड़ियों पर बैठे लोग उनके समर्थन में नारेबाज़ी और जय जयकार कर रहे हैं.

सभा स्थल से क़रीब दो सौ मीटर दूर एक मंदिर में मत्था टेकने के लिए राजा भैया रुकते हैं, लोग उन्हें घेर लेते हैं, मेरे सामने पड़ने पर राजा भैया मुस्कराते हैं और मैं कुछ पूछूं, उससे पहले ही जवाब दे देते हैं- "सब ज़िंदाबाद है."

लगभग दस मिनट के बाद राजा भैया का काफ़िला आगे बढ़ने लगता है और फिर उसके बाद जनसभा का शोर उस काफ़िले की हलचल पर भारी पड़ने लगता है. राजा भैया अपने रिश्ते के भाई और अपनी पार्टी जनसत्ता दल के उम्मीदवार अक्षय प्रताप सिंह के समर्थन में सुबह से ही रोड शो कर रहे थे.

किनके-किनके बीच लड़ाई

क़रीब आधे घंटे बाद हेलीकॉप्टर हवा में मंडराया. प्रमोद तिवारी हरे रंग के चमचमाते हेलीकॉप्टर से उतरे. रत्ना सिंह पहले से ही उनका इंतज़ार कर रही थीं और फिर उसी तरह की नारेबाज़ी इधर भी शुरू हुई जैसी कि थोड़ी देर पहले राजा भैया के लिए हो रही थी.

जनसभा जिस जगह पर हो रही थी, वह रामपुर ख़ास विधानसभा क्षेत्र में आती है. प्रमोद तिवारी की बेटी और कांग्रेस नेता आराधना मिश्रा यहां से विधायक हैं. राजकुमारी रत्ना सिंह प्रतापगढ़ से तीन बार कांग्रेस पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीत चुकी हैं और एक बार फिर अपनी क़िस्मत आज़मा रही हैं.

साल 2014 में रत्ना सिंह बीजेपी समर्थित अपना दल के उम्मीदवार कुंवर हरिवंश से हार गई थीं लेकिन इस बार यह सीट अपना दल के खाते से बीजेपी के खाते में चली गई और बीजेपी ने अपना दल के ही एक विधायक संगमलाल गुप्ता को टिकट दे दिया है. गठबंधन के तहत बीएसपी के अशोक त्रिपाठी यहां से चुनाव लड़ रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में राजकुमारी रत्ना सिंह कहती हैं कि उनकी लड़ाई किसी पार्टी या व्यक्ति से नहीं बल्कि राज्य की ख़राब क़ानून व्यवस्था है.

वो कहती हैं, "मैं और जगह का नहीं जानती कि क्या हो रहा है लेकिन प्रतापगढ़ में जिस तरह से अपहरण, हत्या, गुंडागर्दी जैसे अपराध बढ़े हैं वो बेहद चिंतित करने वाले हैं. इसीलिए मुझे उम्मीद है कि लोग एक बार फिर कांग्रेस के पक्ष में वोट देंगे."

रत्ना सिंह के प्रचार में लगीं रामपुर ख़ास से विधायक आराधना मिश्रा दावा करती हैं, "मेरे विधानसभा के ज़्यादातर मतदाता कांग्रेस को ही वोट देंगे. अन्य विधानसभा में भी देंगे लेकिन यहां के बारे में मैं विश्वास के साथ कह सकती हूं."

चुनाव प्रचार

रामपुर ख़ास से इससे पहले प्रमोद तिवारी विधायक थे. 1980 से वो लगातार नौ बार यहां से जीते और फिर राज्यसभा में जाने के बाद इस सीट से आराधना मिश्रा ने जीत दर्ज की. भटनी गांव के ही रहने वाले देवीराम कहते हैं, "इहां पंजइ पे पड़ी वोट. प्रमोद तिवारी भैया एतना काम किए हैं कि अउर कौनो पार्टी का कोई मतलब नहीं."

देवीराम के लिए देश-प्रदेश में चल रहे दूसरे चुनावी मुद्दे कोई मायने नहीं रखते.

रानीगंज से प्रतापगढ़ ज़िला मुख्यालय की दूरी क़रीब 35 किलोमीटर है. रास्ते भर आश्चर्यजनक रूप से ज़्यादातर जनसत्ता पार्टी और कांग्रेस के ही झंडे, पोस्टर और प्रचार करने वाले दिखे. बीजेपी, सपा-बसपा गठबंधन और अन्य उम्मीदवारों की प्रचार सामग्री ढूंढने पर ही दिखती है. जनसभा और रोड शो को छोड़ दें तो कोई चुनावी शोर नहीं दिखता है.

प्रतापगढ़ शहर से क़रीब दस किलोमीटर दूर बाबूपट्टी गांव में कुछ लोगों से बात हुई तो उनका कहना था कि गांव में किसी पार्टी के लोग चुनाव प्रचार करने नहीं आ रहे हैं.

गांव के ही रहने वाले राजेश सरोज बताने लगे, "कभी-कभी यहां जनसत्ता पार्टी वाले लोग गाड़ियों से आ जाते हैं और किसी पार्टी का प्रचार हम लोग नहीं देख रहे हैं. चुनाव में सिर्फ़ चार दिन बचे हैं, अब तक तो कोई नहीं आया, आगे देखिए. हो सकता है कोई आ ही जाए."

यह सवाल जब मैंने बीएसपी नेता और गठबंधन के उम्मीदवार अशोक त्रिपाठी से पूछा तो उनका कहना था, "प्रचार जहां होना चाहिए, वहां हो रहा है. हम मतदाताओं तक सीधे पहुंचने की कोशिश में हैं. बैनर-पोस्टर पर तो वैसे ही चुनाव आयोग ने पाबंदी लगा रखी है. जहां तक संभव हो रहा है, मतदाताओं तक सीधे पहुंचकर अपनी बात रख रहे हैं."

राजघरानों के ही इर्द-गिर्द घूमती सियासत

प्रतापगढ़ एक ऐसी संसदीय सीट है जहां सियासत मुख्य रूप से पूर्व राजघरानों के ही इर्द-गिर्द घूमती रही है. लोकसभा के अब तक हुए 15 चुनावों में दस बार पूर्व राजघरानों का कब्ज़ा रहा. कालाकांकर के राजपरिवार से आने वाले पूर्व विदेश मंत्री दिनेश सिंह ने चार बार इस संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व किया तो उनकी बेटी राजकुमारी रत्ना सिंह ने तीन बार.

इसके अलावा दो बार यहां से प्रतापगढ़ रियासत के अजीत प्रताप सिंह सांसद रहे और एक बार उनके बेटे अभय प्रताप सिंह. अजीत प्रताप सिंह पहली बार जनसंघ के टिकट पर जीते और उसके बाद कांग्रेस के टिकट पर जबकि अभय प्रताप सिंह ने 1991 में जनता दल से जीत हासिल की थी.

पार्टी के लिहाज़ से देखें तो सबसे ज़्यादा नौ बार यहां कांग्रेस का कब्ज़ा रहा जबकि बीजेपी सिर्फ़ एक बार यह सीट जीत पाई है. हालांकि बीजेपी उम्मीदवार संगमलाल गुप्ता अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. वो कहते हैं, "देश भर में मोदीजी की लहर है. यहां भी उसका फ़ायदा मिलेगा. हमें हर वर्ग का वोट मिल रहा है लोग केंद्र में सिर्फ़ मोदी जी के नेतृत्व में बीजेपी की ही सरकार देखना चाह रहे हैं."

प्रतापगढ़ में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे अमितेंद्र श्रीवास्तव बताते हैं, "संसदीय सीट पर जिन राजघरानों का दबदबा रहा, उनके प्रति यहां के लोगों में सम्मान रहा. हालांकि ऐसा नहीं है कि इन्हें लोगों ने हराया नहीं. दिनेश सिंह भी चुनाव हार चुके हैं. शुरुआत में मुनीश्वरदत्त उपाध्याय यहां के सर्वमान्य नेता रहे लेकिन बाद में राजघरानों के राजनीति में आने से यह सीट ज़्यादातर उन्हीं के पास या ये कहिए कि ठाकुरों के पास ही रही."

अमितेंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि हाई प्रोफ़ाइल नेताओं के बावजूद प्रतापगढ़ का ठीक से विकास नहीं हो पाया. उनके मुताबिक, "केंद्र में यहां से इतने महत्वपूर्ण मंत्री रहे, राज्य में शायद ही ऐसी कोई सरकार रही हो जब यहां से कम से कम दो मंत्री न रहे हों. बावजूद इसके, न तो यहां कोई उद्योग है, न ही शिक्षा की कोई उचित व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर तो समझिए कि कुछ भी नहीं है. रोज़गार के कोई साधन नहीं हैं, पर्यटन तक का ठीक से विकास नहीं हो सका है. इन सबके अलावा यहां गुंडागर्दी और अराजकता हमेशा चरम पर रही है."

प्रतापगढ़ आंवले की खेती के लिए जाना जाता है लेकिन उससे संबंधित उद्योग या फिर विपणन की अब तक कोई ख़ास व्वयस्था नहीं हुई है. आंवला किसान राजदेव तिवारी कहते हैं, "सांसद जी कहे थे कि आंवले के लिए विशेष मंडी बनवाएंगे, लेकिन बनवाए नहीं. अबकी बार तो उनका टिकट भी कट गया."

प्रतापगढ़ लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं- रामपुर खास, विश्वनाथगंज, प्रतापगढ़ सदर, पट्टी और रानीगंज. मौजूदा समय में रामपुर खास कांग्रेस के पास, विश्वनाथगंज और प्रतापगढ़ सदर अपना दल के पास जबकि पट्टी और रानीगंज बीजेपी के पास हैं. प्रतापगढ़ की बेहद चर्चित विधानसभा सीट कुंडा अब कौशांबी लोकसभा क्षेत्र में आती है.

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