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स्टेट बैंक अकाउंट के रेपो रेट से लिंक होने के मायने
- Author, अभिजीत श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने पहली मई से बचत खाते पर मिलने वाले ब्याज़ और कम अवधि के कर्ज़ के रेट को रिजर्व बैंक के रेपो रेट से लिंक कर दिया है.
यानी जब-जब रिज़र्व बैंक रेपो रेट में बदलाव करेगा तब-तब बचत खातों (सेविंग अकाउंट) और कम अवधि के कर्ज़ (शॉर्ट टर्म लोन) की दरों में उसी समय बदलाव हो जाएगा.
इसका मतलब ये हुआ कि अब रिज़र्व बैंक की पॉलिसी को बैंकिंग सिस्टम में लागू करना आसान हो जाएगा.
बैंक ने मार्च में ही इसकी घोषणा की थी कि वो 1 मई 2019 से बैंक 1 लाख रुपये से ज़्यादा बैलेंस वाले बचत खातों और अल्पावधि कर्ज़ को रिजर्व बैंक के रेपो रेट से लिंक कर देगा.
चलिए जानते हैं स्टेट बैंक की इस नई नीति के क्या हैं मायने.
किन ग्राहकों पर सीधा असर पड़ेगा?
इसे ऐसे समझें कि उन ग्राहकों को जिनके खाते में एक लाख रुपये से अधिक जमा हैं, उन्हें 1 मई 2019 से रेपो रेट से 2.75 फ़ीसदी कम ब्याज़ दर मिलेगा.
फ़रवरी और अप्रैल में रिज़र्व बैंक ने लगातार दो बार अपने रेपो रेट को कम किया और अब यह 6 फ़ीसदी पर है.
यानी जिन खातों में एक लाख रुपये से अधिक जमा हैं उन पर (रेपो रेट - 2.75) 3.25 फ़ीसदी की दर से ब्याज़ मिलेगा. 30 अप्रैल की तारीख़ तक एक करोड़ रुपये तक के बचत खातों पर 3.50 फ़ीसदी और एक करोड़ से अधिक वाले बचत खातों पर 4 फ़ीसदी की दर से ब्याज़ दिया जा रहा था.
हालांकि एक लाख रुपये तक के बचत खाता धारकों को बैंक पहले के अनुसार ही 3.50 फ़ीसदी की दर से सालाना ब्याज़ देता रहेगा.
स्टेट बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि इस समय स्टेट बैंक के पास 1 लाख रुपये तक वाले बचत खाता धारकों की संख्या कुल खातों की क़रीब 95 फ़ीसदी है.
इसका मतलब ये हुआ कि 95 फ़ीसदी बचत खाता धारकों पर इस बदलाव का कोई असर नहीं पड़ेगा.
शॉर्ट टर्म लोन पर क्या प्रभाव?
पहली मई से स्टेट बैंक ने शॉर्ट टर्म लोन जैसे कि कैश क्रेडिट (सीसी) और ओवरड्राफ़्ट (ओडी) अकाउंट्स (1 लाख की लिमिट से ज़्यादा वाले) बेंचमार्क पॉलिसी रेट से सीधे लिंक हो जाएंगे. इससे रिजर्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी को सीधे लागू करने में आसानी होगी.
बैंकों के कर्ज़, बैंक के फंडिंग कॉस्ट से लिंक होते हैं. बैंक एक लैंडिंग रेट तय करते हैं. जब कोई व्यक्ति किसी बैंक से कर्ज़ लेता है तो जो ब्याज़ की न्यूनतम दर होती है उसे बेस रेट कहते हैं. यह वो दर है जिससे कम पर बैंक कर्ज़ नहीं दे सकते हैं.
अप्रैल 2016 से बैंक इसी बेस रेट की जगह लेंडिंग रेट (एमसीएलआर या मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट्स) का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसमें कई बातों की गणना करते हुए ही किसी ग्राहक को कर्ज़ दिया जाता है.
स्टेट बैंक इन कर्ज़ों पर रिस्क प्रीमियम चार्ज करेगा. ये रिस्क प्रीमियम लोन लेने वाले की प्रोफाइल के आधार पर चार्ज किया जाता है.
कुल मिलाकर यह है कि अब रेपो रेट के बढ़ने या घटने का सीधा असर ऐसे अकाउंट्स पर पड़ेगा.
स्टेट बैंक से 30 लाख रुपये तक का कर्ज़ लेने वालों को भी फायदा होने वाला है. बैंक ने पहली मई से अपने ऐसे कर्ज़ पर 0.10 फ़ीसदी ब्याज़ कम किया है. 30 लाख रुपये तक के होम लोन पर ब्याज़ की दर 8.60 से 8.90 फ़ीसदी के बीच है.
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