पं. बंगालः बाबुल सुप्रियो बनाम मुनमुन सेन का चुनावी घमासान- लोकसभा चुनाव 2019

बाबुल सुप्रियो

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    • Author, प्रभाकर एम
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

एक तरफ जाने-माने गायक हैं तो दूसरी तरफ अपने ज़माने की मशहूर हीरोइन. इससे किसी फ़िल्मी पटकथा का संकेत मिल सकता है.

पश्चिम बंगाल में झारखंड से सटी औद्योगिक नगरी आसनसोल में इस चुनावी पटकथा के दोनों प्रमुख पात्र भले फिल्मी हों, लेकिन उनके बीच लड़ाई एकदम असली है और साथ ही कठिन भी.

इलाके की हवा में फैले तनाव और वोटरों की खामोशी ने इन दोनों की नींद उड़ा रखी है. यहां 29 अप्रैल को मतदान होना है. लेकिन मतदाताओं की चुप्पी के चलते अब तक किसी के पक्ष में किसी हवा या लहर का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है.

आसनसोल राज्य की उन दो सीटों में से है जहां वर्ष 2014 में बीजेपी जीती थी. गायक बाबुल सुप्रियो तब जीतकर केंद्र में मंत्री बने थे. वे लगातार दूसरी बार यहां मैदान में हैं.

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने लोहे से लोहा काटने की तर्ज पर यहां अभिनेत्री मुनमुन सेन को मुकाबले में खड़ा कर दिया है. मुनमुन पिछली बार बांकुड़ा सीट से जीती थीं. इस सीट पर इस बार दोनों दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इलाके में दो-दो रैलियां कर चुके हैं.

मुनमुन सेन

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सांप्रदायिक हिंसा का साया

कोयला खदान वाला यह इलाका हाल के समय में सांप्रदायिक हिंसा के लिए भी सुर्खियों में रहा है. सबसे ताज़ा मामला रामनवमी के मौके पर निकले जुलूस पर पथराव के बाद उपजे तनाव का है.

इससे संसदीय सीट के विभिन्न इलाकों में तनाव है और लोग खुल कर राजनीति पर बात करने को तैयार नहीं हैं. बीजेपी और तृणमूल यहां अपने-अपने जीत के दावे भले कर रही है लेकिन खुद उनको भी इसका पूरा भरोसा नहीं है.

बीते साल हुई सांप्रदायिक हिंसा के निशान इलाके में अब भी देखे और महसूस किए जा सकते हैं. मोहल्लों में भी और लोगों के दिलों में भी. फ़िज़ा में पसरे सांप्रदायिक तनाव को महसूस करना भी ख़ास मुश्किल नहीं है. नुक्कड़ और चाय दुकानों पर राजनीति पर खुलेआम बहस करने की बंगाल की परंपरा यहां सिरे से गायब है.

आम लोग सीधे-सीधे किसी के समर्थन में या विरोध में मुंह खोलने से डर रहे हैं. रानीगंज में एक व्यापारी नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं, "इस बार मुकाबला कड़ा है. लेकिन वोटरों के धुव्रीकरण से बीजेपी फायदे में नज़र आ रही है."

आसनसोल में चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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मुनमुन का आसनसोल होगा या नहीं

आसनसोल इलाका हिंदीभाषी-बहुल है. यहां कुल वोटरों में इस तबके के 30 फीसदी लोग हैं जबकि अल्पसंख्यकों की तादाद लगभग 15 फीसदी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि हाल के वर्षों में इलाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थिति लगातार मजबूत हुई है और वह हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी के लिए अनुकूल माहौल बनाने में कामयाब रहा है.

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस असंतोष से जूझ रही है. कई स्थानीय नेता मुनमुन सेन की उम्मीदवारी से नाराज़ हैं. आसनसोल नगर निगम के मेयर जितेंद्र तिवारी को यहां से टिकट मिलने की उम्मीद थी. लेकिन उनकी बजाय ममता ने मुनमुन को तरजीह दी.

तृणमूल के एक नेता बताते हैं, "अंदरूनी गुटबाजी पार्टी के लिए भारी साबित हो सकती है. पिछली बार भी इसी वजह से बाबुल सुप्रियो जीत गए थे और अबकी बार भी हालात लगभग वैसे ही हैं."

सांसद और बीजेपी उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो तृणमूल कांग्रेस पर आतंक फैलाने का आरोप लगाते हैं. वह कहते हैं, "पुलिस हमारे कार्यकर्ताओं को बेवजह गिरफ्तार और परेशान कर रही है. उनके घरों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. इलाके में पूरी तरह आतंक का मौहाल बनाया जा रहा है."

उनका आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस सरकारी तंत्र की सहायता से यहां जीत की कोशिश में जुटी है. बाबुल का दावा है कि इस बार उनकी जीत का अंतर औऱ ज्यादा होगा. उनकी दलील है कि बांकुड़ा में हार के डर से ही मुनमुन सेन आसनसोल आई हैं.

लेकिन तृणमूल नेता और राज्य के श्रम मंत्री मलय घटक उनके आरोपों को निराधार ठहराते हैं. वह कहते हैं, "आसनसोल के लोग जानते हैं कि गड़बड़ी कौन फैला रहा है. यहां इस बार तृणमूल ही जीतेगी."

मुनमुन सेन को उम्मीद है कि बांकुड़ा की तरह यहां भी उनको कामयाबी मिलेगी. वह कहती हैं, "इलाके के लोग बीजेपी की नीतियों से परेशान हैं. बीते पांच साल में इलाके में विकास के नाम पर कोई काम नहीं हुआ है. इसलिए लोगों ने सांसद बदलने का मन बना लिया है."

जीत के लिए मुनमुन के पोस्टरों में उनकी मां और पूर्व अभिनेत्री सुचित्रा सेन की तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है.

मुनमुन सेन के पोस्टर

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बाकी उम्मीदवारों के दावे

कांग्रेस उम्मीदवार विश्वरूप मंडल कहते हैं, "यहां भाजपा और तृणमूल के उम्मीदवार हवाई हैं. जीत के बाद उनके दर्शन दुर्लभ हो जाएंगे. इसलिए इलाके के लोग उनके ख़िलाफ़ वोट डालेंगे."

लेफ्टफ्रंट उम्मीदवार गौरांग चटर्जी भी लगभग यही बात दोहराते हैं. चटर्जी कहते हैं, "स्थानीय बीजेपी सांसद के केंद्र में मंत्री होने के बावजूद इलाके में रोज़गार समेत दूसरी समस्याएं जस की तस हैं."

जहां तक आंकड़ों का सवाल है कि वर्ष 2014 के चुनावों में बाबुल सुप्रियो ने तृणमूल की डोला सेन को 70 हजार वोटों के अंतर से पराजित किया था. वर्ष 2009 से 2014 के बीच इस सीट पर बीजेपी के वोटों में 31.19 फीसदी का ज़बरदस्त उछाल आया जबकि उसी दौरान तृणमूल के वोटों में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

वैसे, यहां सबसे बड़ा नुकसान सीपीएम को हुआ. लेफ्ट की इस पारंपरिक सीट पर पिछली बार सीपीएम उम्मीदवार को मिले वोटों में 26.30 फीसदी का ज़बरदस्त नुकसान हुआ. लेफ्ट के तमाम वोटर बीजेपी के पाले में चले गए.

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ पंडित कहते हैं, "इलाके में हिंदीभाषी वोटर ही निर्णायक हैं और उनके बीच बीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों की खासी पैठ है. लेकिन ममता बनर्जी ने पिछली बार बांकुड़ा सीट पर बासुदेव आचार्य जैसे दिग्गज को धूल चटाने वाली मुनमुन को मैदान में उतार कर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है."

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