मधेपुरा के 'कुरुक्षेत्र' में तीन यादवों के बीच 'महाभारत'

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- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार के यादव बहुल मधेपुरा संसदीय क्षेत्र में उभरे सियासी अवसरवाद ने इस बार जातीय गणित के कुछ आज़माए हुए सूत्र भी उलट-पलट दिए हैं.
पिछले लोकसभा चुनाव में यहाँ से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के टिकट पर निर्वाचित सांसद राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार हैं.
इन्होंने उस समय जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के शरद यादव को पराजित किया था. लेकिन अब जेडीयू छोड़ चुके शरद यादव आरजेडी के प्रत्याशी हैं.
'उसूलों को मारो गोली' वाले सियासी दौर में नेताओं के लिए स्वार्थ तो सर्वोपरि होता ही है.
सियासत की इस उलटचाल से जहाँ पप्पू यादव के चेहरे का चुनावी रंग उड़ा हुआ है, वहीं शरद यादव के ही शिष्य दिनेश चंद्र यादव को जेडीयू-प्रत्याशी बन जाने का अच्छा मौक़ा हाथ लगा है.
दरअसल हुआ ये कि आरजेडी, कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के महागठबंधन से जुड़ कर चुनाव लड़ने की चाहत पाल रहे पप्पू यादव को तेजस्वी यादव ने अंतत: झटका दे दिया.

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पप्पू यादव की पार्टी
इसके पीछे की कहानी ये है कि मधेपुरा से सांसद चुने जाने के कुछ ही समय बाद पप्पू यादव द्वारा अपनी एक अलग पार्टी बना लेने को आरजेडी ने विश्वासघात माना है.
उधर, नीतीश कुमार से रिश्ता तोड़ने के बाद लालू यादव की तरफ़ रुख़ कर चुके शरद यादव आरजेडी के ज़्यादा अनुकूल हो गए हैं.
ऐसे में कांग्रेस से बेहतर रिश्ते के बावजूद पप्पू यादव अपने 'जन अधिकार पार्टी' को महागठबंधन के साथ नही जोड़ पाए.
इसलिए उन्हें निर्दलीय हो कर चुनाव मैदान में उतरना पड़ा है.
बग़ल के सुपौल लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की निवर्तमान सांसद और पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को पार्टी ने फिर से उम्मीदवार बनाया है.

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पति-पत्नी की चुनौतियां
लेकिन सुपौल की अंदरूनी राजनीति समझने वाले यही मानते है कि इसबार रंजीत रंजन अपनी सीट शायद ही निकाल पाएंगी.
मधेपुरा में फँसा विवाद इसका मुख्य कारण बना है. यानी पति पत्नी दोनों को जिन चुनौतियों से सामना करना पड़ रहा है, उनके सूत्र मुख्यत: यादव मतदाताओं से ही जुड़े हुए हैं.
आरजेडी समर्थक यादव मतदाताओं के स्थानीय प्रवक्ता खुल कर बयान दे रहे हैं कि आरजेडी प्रत्याशी शरद यादव को नुक़सान पहुँचाना पप्पू यादव और रंजीत रंजन दोनों को महँगा पड़ेगा.
दूसरी तरफ़ पप्पू यादव के विरोधी भी ये क़बूल करते हैं कि इस इलाक़े का ये अकेला नेता है, जो अपने क्षेत्र में ही नहीं, क्षेत्र से बाहर भी लोगों को रोग-शोक या संकट के समय हर तरह से मदद करने को तत्पर रहता है.
उनके एक पुराने राजनीतिक सहकर्मी ने मुझसे कहा कि पप्पू यादव ज़्यादा बोलने के क्रम में अक्सर कुछ उटपटांग बोल कर बहुतों को अपने विरुद्ध कर लेते हैं.

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मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन
बावजूद कुछ ख़ूबियों के, पप्पू यादव की बाहुबली वाली पुरानी आपराधिक छवि उनका पीछा नहीं छोड़ रही है.
आज भी कई लोग उन्हें 'लंपट-छाप युवाओं' का झुंड लेकर चलने वाला गरम मिज़ाज नेता क़रार देते हैं. इस बीच मामला कुछ और बिगड़ा है.
लालू यादव से प्रतिबद्ध यादव समाज की मुख्यधारा से कट चुके पप्पू यादव को मुस्लिम मतदाताओं का भी समर्थन मिलना मुश्किल है.
ज़ाहिर है कि अब लालू-ख़ेमा ज्वॉइन कर लेने वाले शरद यादव का पलड़ा भारी करने में यादव और मुस्लिम के अलावा कोइरी-कुशवाहा और मल्लाह वाला जातीय महागठबंधन पूरा ज़ोर लगाएगा.
जेडीयू के उम्मीदवार दिनेश यादव नीतीश सरकार में मंत्री हैं और कोशी क्षेत्र के ही निवासी होने के नाते यहाँ कई तबक़ों में इनकी अच्छी पैठ है.

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महागठबंधन के मुक़ाबले
लेकिन इनके पक्ष में जो सबसे अनुकूल चुनावी समीकरण उभरने लगे हैं, उनकी जातिगत और भावनात्मक एकजुटता वाली ताक़त महागठबंधन के मुक़ाबले काफ़ी बढ़ी हुई दिखती है.
18 लाख 74 हज़ार मतदाताओं वाले मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में 22 % यादव और 12 % मुस्लिम वोटर बताए जाते हैं.
बाक़ी 2 से 7 प्रतिशत वोटर वाली 14 जातियों में सवर्ण और दलित समेत अन्य पिछड़ी जातियों से जुड़े मतदाताओं की तादाद यादव-मुस्लिम वोटर के मुक़ाबले दुगुना से भी कुछ ज़्यादा ही है.
इसलिए हालात ऐसे बनाए जा रहे हैं कि महागठबंधन के पक्ष में एकजुट दिख रही यादव-मुस्लिम जमात के ख़िलाफ़ ग़ैरयादव हिंदूओं का ध्रुवीकरण हो जाए.
ख़ासकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की तरफ़ अतिपिछड़ों और सवर्णों के सम्मिलित रुझान को 'राष्ट्रवादी मुहिम' के बूते और ताक़तवर बनाने में दिनेश यादव जुटे हए हैं.

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मधेपुरा संसदीय क्षेत्र
दिलचस्प यह भी है कि इनकी चुनावी नैया यादवों के बजाय ब्राह्मण, राजपूत और पचपनियां कहे जाने वाले ग़ैरयादव पिछड़ों के सहारे पार लग सकती है.
यहाँ मुक़ाबले को तिकोना बनाने वाले तीनों प्रत्याशी एक ही जाति के हैं और यह भी ग़ौरतलब है कि मधेपुरा संसदीय क्षेत्र से अबतक यादव उम्मीदवार ही चुनाव जीतता रहा है.
पिछले लोकसभा चुनाव में आरजेडी के पप्पू यादव को 36%, जेडीयू के शरद यादव को 31% और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विजय कुशवाहा को 25% वोट मिले थे.
उस समय जेडीयू से बीजेपी अलग हो चुकी थी. अगर दोनों पार्टियाँ साथ होतीं तो परिणाम उनके हक़ में जा सकता था.
वैसे भी, कुल मिलाकर मधेपुरा की मौजूदा चुनावी तस्वीर जेडीयू को अभी अपने प्रतिद्वन्द्वी दलों से अधिक चमकदार तो दिखा ही रही है.
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