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क्या जनता दल यूनाइटेड में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं प्रशांत किशोर
- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार की सत्तारूढ़ पार्टी जनता दल यूनाइटेड में सब कुछ ठीक- ठाक नहीं चल रहा. यह तस्वीर शुक्रवार को तब और साफ़ हुई जब चुनावी रणनीतिकार और जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने एक ट्वीट के माध्यम से अपनी भावना को रखा.
उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि "बिहार में एनडीए माननीय मोदीजी एवं नीतीश जी के नेतृत्व में मज़बूती से चुनाव लड़ रहा है. जेडीयू की ओर से चुनाव प्रचार और प्रबंधन की जिम्मेवारी पार्टी के वरीय एवं अनुभवी नेता श्री आरसीपी सिंह जी के मज़बूत कंधों पर है. मेरे राजनीति के इस शुरूआती दौर में मेरी भूमिका सीखने और सहयोग की है."
अब सवाल उठता है कि क्या प्रशांत किशोर (पीके) पर अधिकारी से सांसद बने आरसीपी सिंह की राजनीति और रणनीति भारी पड़ रही है.
क्या पीके जेडीयू से बाहर निकलने का रास्ता देख रहे हैं या राजनीति की पाठशाला में वे ख़ुद को एक शिष्य मान रहे हैं. इस संबंध में जेडीयू प्रवक्ता प्रगति मेहता और डा. अजय अलोक ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार फैज़ान अहमद पीके के ट्वीट के बैकग्राउंड के बारे चर्चा करते हैं.
वे कहते हैं कि "जब सीएम ने पीके को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया तो पार्टी और बाहर के लोगों के बीच यह धारणा बनी कि वे मुख्यमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं. मुख्यमंत्री ने जब पीके को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था तो कहा था कि वे पार्टी के भविष्य हैं."
वो कहते हैं, "पार्टी में नंबर टू की लड़ाई यहीं से शुरू हुई. पीके के यहाँ भीड़ अधिक लगने लगी और आरसीपी सिंह के यहाँ भीड़ घटी. दोनों ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी हैं लेकिन, आज आरसीपी का पलड़ा भारी पड़ रहा है. वो सीएम के गृह ज़िले के हैं, स्वजातीय भी हैं और जब नीतीश कुमार पहली बार केंद्रीय मंत्री बने थे तब आरसीपी उनके सहयोगी थे. आज पीके को लगने लगा है कि राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में उनकी अलग भूमिका थी, लेकिन पार्टी के नेतृत्वकर्ता के रूप में उनकी वह हैसियत नहीं बन पा रही है. यह ट्वीट इसी का परिणाम है."
जबकि वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण का मानना है कि "पार्टी में शामिल होने के बाद पीके ने कई बार अपनी बेबाक और स्वतंत्र राय रखी है. मसलन प्रियंका गाँधी के राजनीति में आने का स्वागत, राजद शासनकाल से तुलना कर लोगों को पार्टी अब गोलबंद नहीं कर सकती बल्कि अन्य राज्यों की तुलना में बिहार का तुलनात्मक विकास दल के लिए वोट जुटा सकता है. ये सब कुछ ऐसी बातें थी जिसे पार्टी के कोई अन्य नेता कहने का साहस नहीं जुटा सकते थे."
नचिकेता कहते हैं कि विवाद पीके के नीतीश कुमार को भाजपा से अलग चुनाव लड़ने की राय देने से खड़ा हुआ.
वो कहते हैं, "मगर जब पीके ने यह बात कह दी कि नीतीश कुमार को भाजपा के साथ जाने के बजाए चुनाव में जाना चाहिए था. उनके इस बयान ने संगठनात्मक तूफ़ान खड़ा कर दिया. इस पृष्ठभूमि के तहत जो लोग पीके के ऊंचे हुए क़द से परेशान थे उन्होंने ही इस मौके का फ़ायदा उठाया और पार्टी की ओर से उनपर हमला शुरू हुआ. इस बार चुनाव में उनकी कोई सक्रिय भूमिका भी देखने को नहीं मिल रही है. ऐसे में उनका ट्वीट दो प्रयोजन को साधने वाला हो सकता है. ट्वीट के जरीय वे अपने मन के क्लेश को जाहिर करना चाह रहे हों या फिर चुनावी माहौल में पार्टी हितों को ध्यान में रखते हुए प्रतिद्वंदिता की लड़ाई को समाप्त करना चाह रहे हों."
राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी का कहना है कि जदयू का भविष्य उपेक्षित महसूस कर रहा है.
उन्होंने कहा, "जो पार्टी का उपाध्यक्ष है, जो वर्ष 2015 में इनका चुनावी रणनीतिकार रहा, जिसको सीएम शपथ- ग्रहण समारोह में अपने साथ गाड़ी में ले जाते हों, जिसको नीतीश कुमार ने पार्टी का भविष्य कहा वही उपेक्षित महसूस कर रहा है.अब यह प्रशांत किशोर पर निर्भर करता है कि वो कितना अपमान सह सकते हैं. यही नीतीश कुमार का स्टाइल है. अपने प्रवक्ताओं को किसी से भी भिड़ा देते हैं. पहले उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी पर संजय सिंह को लगाया और अब प्रशांत किशोर पर नीरज कुमार भारी पड़ गए हैं ".
इस राजनीतिक माहौल में यदि पीके अपने लिखे ट्वीट पर क़ायम हैं तो ज़ाहिर है कि वे व्यक्तित्वों के टकराव में आरसीपी सिंह से अपनी हार मान चुके हैं.
पीके भले ही नाराज़ हों लेकिन पार्टी से जुड़े सूत्रों का मानना है कि इसका बहुत ज़्यादा असर चुनावों में पार्टी की रणनीति पर नहीं पड़ेगा. चुनाव की कमान मुख्य रूप से नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह के जिम्मे आ चुकी है. टिकट बंटवारे में भी पीके की कोई ख़ास भूमिका नहीं रही है. ऐसे में देखना यही होगा कि पार्टी में नज़रअंदाज़ किए गए पीके की अगली रणनीति क्या होगी.
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