You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद किस ओर हैं जाट और मुसलमान?: लोकसभा चुनाव 2019
- Author, राधिका बोर्डिया
- पदनाम, पत्रकार, मुज़फ़्फ़रनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
26 मार्च को राष्ट्रीय लोक दल यानी आरएलडी के प्रमुख अजित सिंह ने मुज़फ़्फ़रनगर के कई गांवों में चुनावी सभाओं को संबोधित किया और जाट-मुस्लिम एकता की अपील की. दिन का अंत उन्होंने नरेश टिकैत के साथ उनके गांव सिसौली में डिनर के साथ किया.
यह मुलाक़ात दिखाती है कि इस जाट बहुल क्षेत्र की राजनीति घूम-फिरकर वहीं पहुंच गई है. 1986 में नरेश के पिता महेंद्र सिंह टिकैत ने भारतीय किसान यूनियन की स्थापना की थी, जिसने कृषि से जुड़े साझा हितों के आधार पर ऐसा मुस्लिम-जाट फ्रंट तैयार किया था जिसका इस क्षेत्र की राजनीति पर गहरा प्रभाव था.
मगर 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर मे हुए जाट-मुस्लिम दंगों से पहले जो खाप महापंचायत हुई थी, उसमें भारतीय किसान यूनियन के नरेश टिकैत बाकी नेताओं के साथ शामिल हुए थे.
अब टिकैत उस शख़्स के साथ डिनर कर रहे थे जो उनके पिता की विरासत को फिर से ज़िंदा करने में जुटा है.
पूरे दिन अजित सिंह ने गांव दर गांव बात की कि कैसे मुसलमान और जाट साथ आकर 2019 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराने की पटकथा लिख सकते हैं. अगर वे मिलकर वोट करते हैं तो आंकड़े बताते हैं कि इस लोकसभा क्षेत्र को लेकर अजित सिंह का यह अनुमान ग़लत नहीं होगा.
जाट-मुस्लिम पुनर्गठजोड़ की शुरुआत?
मुज़फ़्फ़रनगर में लगभग 16.5 लाख मतदाता हैं. मुसलमानों के वोट 5 लाख हैं और जाटों के डेढ़ लाख.
अजित सिंह महागठबंधन में शामिल हैं, जिसमें बीएसपी भी है. तो पांच लाख मुसलमानों और डेढ़ लाख जाटों के साथ ढाई लाख जाटवों के वोट मिला दिए जाएं तो ये आराम से वे बहुमत में आ जाते हैं.
इस संभावित जाट-मुस्लिम पुनर्गठजोड़ ने ग़ुलाम मोहम्मद जौला जैसे अनुभवी लोगों के बीच उम्मीद पैदा की है. 80 साल के यह बुज़ुर्ग 1986 में स्थापना होने से ही भारतीय किसान यूनियन के सदस्य रहे थे.
मगर 2013 के दंगों के बाद उन्हें यूनियन से निकाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने मुसलमानों का समर्थन न करने को लेकर खुलकर भारतीय किसान यूनियन की आलोचना की थी.
अपने गांव में अजित सिंह के प्रचार अभियान को देखकर जौला ने कहा, "मुज़फ़्फ़रनगर, बागपत, कैराना और मथुरा भी इस वक़्त चौधरी साहब के खाते में लग रहे हैं. दोनों बाप-बेटों ने कई जाट-मुस्लिम बिरादरियों के सम्मेलन किए हैं. दूरियां कम करने की कोशिश की है. अब आख़िर में क्या होगा, वो तो 23 मई को ही पता चलेगा."
जौला कहते हैं, "चार दिन पहले तक नरेश टिकैत कह रहे थे कि बीकेयू किसी पार्टी को सपोर्ट नहीं करेगी. लेकिन आज रात के बाद लग रहा है कि वो भी खुलकर अजित सिंह को समर्थन देंगे."
सांप्रदायिक सौहार्द कितना है अब
पिछले दो सालों से आरएलडी ने मुज़फ़्फ़रनगर में कई जाट-मुस्लिम सभाएं आयोजित की हैं. अजित सिंह ने मुखर होकर बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति की आलोचना की है और कहा है कि उनका मुज़फ़्फ़रनगर से लड़ने का फ़ैसला इस बात का सबूत है कि वह सांप्रदायिक राजनीति से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
इससे जौला जैसे मुस्लिम समुदाय के उन लोगों को उस संदेह से उबरने में मदद मिली है, जो उनके मन में 2013 के दंगों के बाद अजित सिंह से समर्थन न मिलने के बाद पैदा हो गया था.
मगर अजित सिंह ने भी अब लिंचिंग और योगी आदित्यनाथ के राज में मुस्लिमों को निशाना बनाने वाले एनकाउंटर्स पर बोलना शुरू कर दिया है, जिसे लेकर पहले वह थोड़े हिचक रहे थे.
जिस तरह की एकता वह पैदा करना चाहते हैं वह बहुत नाज़ुक है और मुख्य तौर पर उस गन्ना संकट पर निर्भर करती है जिससे जाट और मुस्लिम दोनों प्रभावित हुए हैं.
जौला कहते हैं, "जब दोनों, जाट और मुस्लिम किसान धरनों में साथ बैठे हैं तो मजबूरी कह लो लेकिन कुछ तो दूरियां कम होती हैं. और इस बार चौधरी साब और बेटे ने कोई कसर नहीं छोड़ी इस मुद्दे को उठाने में."
यह बात कैराना में 2018 में हुए उपचुनाव में भी साबित हुई जब आरएलडी की उम्मीदवार तबस्सुम हसन की जीत 'जिन्ना नहीं, गन्ना' नारे की लोकप्रियता के दम पर सुनिश्चित हुई.
बीजेपी अब कितनी मज़बूत
2013 के दंगे के बाद सांप्रदायिक सौहार्द के लिए काम करने वाले संगठन पैग़ाम-ए-इंसानियत की शुरुआत करने वाले आसिफ़ राही कहते हैं कि ध्रुवीकरण के कारण 2014 में बीजेपी को जो समर्थन मिला था वह धीरे-धीरे कम हो चुका है.
वह कहते हैं, "ख़ासकर कैराना के बाद जब उन्होंने यह भी देखा कि एक मुस्लिम महिला को जाटों ने वोट दिया तो उन्हें लगा शायद उन पर बीजेपी की पकड़ थोड़ी हल्की हुई है."
हालांकि, आसिफ़ कहते हैं कि यहां पर जाटों की पीढ़ियों में विभाजन साफ़ दिखाई देता है, उम्रदराज़ लोग अजित सिंह का समर्थन करते हैं वहीं युवा पर अभी भी 'मोदी जादू' क़ायम है. वह कहते हैं कि मुज़फ़्फ़रनगर की 'लड़ाई' बहुत उग्रतापूर्वक लड़ी जाएगी.
मुज़फ़्फ़रनगर में बहुत सारी मुखर आवाज़ें सुनाई दे रही हैं. इसमें मोदी और बीजेपी का समर्थन करने वाले अधिक हैं.
कभी आरएलडी के साथ रहे और अभी बीजेपी के समर्थक अशोक बालियान कहते हैं कि 2014 में बीजेपी को समर्थन शीर्ष पर था और अभी भी युवाओं और महिलाओं में यह ऐसा ही है.
वह कहते हैं, "देखिए गन्ना इतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितना बनाया जा रहा है क्योंकि किसान को तो हमेशा देर से ही पैसा मिला. पहले अखिलेश के राज में भी कहां वक़्त पर पैसे मिलते थे लेकिन मोदी को लेकर लोग अभी भी ख़ुश हैं. उनको लगता है विकास मोदी ही कर सकते हैं. रेल का आधुनिकीकरण हुआ, हाइवे का काम शुरू हुआ और पुलवामा के बाद युवा तो उसको मज़बूत नेता ही मानते हैं."
जौला इस बात को स्वीकार करते हैं कि 'जनरेशन गैप' वास्तव में है. वह कहते हैं, "35-40 से कम की उम्र के नौजवान अभी भी बहुत हद तक मोदी को चाहते हैं लेकिन अगर ऐसी हवा बनती रही तो जयंत और अजित सिंह मिलकर सीट निकाल लेंगे. पुलवामा का ही मुद्दा अगर ले लिया जाए बीजेपी के मुद्दे कोई ख़ास गर्मी नहीं पकड़ रहे हैं."
पुलवामा हमला बीजेपी को लाभ देगा?
पुलवामा में सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले पर हमले के बाद किए गए बालाकोट स्ट्राइक से समझा जा रहा था कि यह बीजेपी को लाभ देगा. कैराना में बीजेपी के हार के बाद कार्यकर्ताओं का जो मनोबल टूट चुका था, इस घटना ने उनमें एक नई ऊर्जा का संचार किया, लेकिन बालाकोट स्ट्राइक को चुनावी रणनीति को तभी धक्का लगा जब पुलवामा हमले में मारे गए सीआरपीएफ़ जवान प्रदीप कुमार की पत्नी शर्मिष्ठा देवी ने इस स्ट्राइक के सबूत मांग लिए.
हालांकि, दंगों का आरोप वर्तमान सांसद संजीव बालियान को टिकट दिया जाना बताता है कि बीजेपी की हिंदुत्व वाली चुनावी रणनीति में कोई तब्दीली नहीं आई है. फ़रवरी 2019 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सिफ़ारिश की थी कि 38 लोगों पर दंगों के मामले वापस लिए जाएं.
कुछ दिनों के बाद बालियान ने मुज़फ़्फ़रनगर शहर में रैली करके देवबंद में भारत के सबसे बड़े मदरसे को बंद करने की मांग की. एक सप्ताह के बाद 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के जीत के मौक़े पर मनाए जाने वाले 'विजय दिवस' पर बालियान ने भी रैली की.
बालियान का कहना है, "पुलवामा पर लिए गए बदले को दिखाता है कि राष्ट्र को किसे वोट दिया जाना चाहिए. हमारे मज़बूत नेता और इस देश का प्रधानमंत्री केवल मोदीजी हो सकते हैं."
समाजवादी पार्टी से संबंध रखने वाले जाट नेता संदीप बालियान कहते हैं, "मैं भी बालियान हूं और रसूलपुर जट्टान वह गांव है जिसको संजीव बालियान ने सबसे पहले गोद लिया था तो मैं जाटों को समझता हूं."
वह कहते हैं, "मोदी प्रसिद्ध हैं और बालियान के नाम को भी लोग जानते हैं लेकिन इन चुनावों में जाट अपने सच्चे नेता की ओर लौटेंगे. इस समय 70 फ़ीसदी लोग महागठबंधन और 30 फ़ीसदी बीजेपी की ओर हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)