कांग्रेस सरकार ने छत्तीसगढ़ में अडानी को दिया कोयला खदान का ठेका, उठे सवाल

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिये
छत्तीसगढ़ के कोरबा ज़िले में गिधमुड़ी और पतुरिया कोयला खदान को कांग्रेस पार्टी की सरकार ने गौतम अडानी की कंपनी को सौंपने का फ़ैसला किया है. अडानी की कंपनी कुछ दूसरी कंपनियों के साथ मिल कर इस कोयला खदान में एमडीओ यानी माइन डेवलपर कम ऑपरेटर के तौर पर कोयला खनन का काम करेगी.
विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस पार्टी एमडीओ के तौर पर कोयला खनन का विरोध करती रही है और इसे बड़ा भ्रष्टाचार बताती रही है.
यहां तक कि पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी कोयला खनन के इलाके में जा कर ग्रामसभा के मुद्दे पर राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार को घेरने का काम करते रहे हैं.
लेकिन अब सरकार में आने के बाद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी ने भी कोयला खनन के लिए एमडीओ का रास्ता अपनाते हुए अडानी को ही चुना है.
छत्तीसगढ़ स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड के अध्यक्ष और निदेशक शैलेंद्र कुमार शुक्ला ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "इस मामले में निविदा आमंत्रित की गई थी और इसकी सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई है. अडानी और उसकी सहयोगी कंपनियों को इसके लिये योग्य पाया गया है."
अडानी समूह की ओर से ईमेल के माध्यम से दिए गए जवाब में कहा गया है कि खनन अनुबंधों को सक्षम अधिकारियों द्वारा निर्धारित नियमानुसार आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से दिया जाता है. कई अनुभवी संस्थानों ने परसा ईस्ट केते और गिदमुडी-पतुरिया खदानों के खनन अनुबंधों के लिए बोलियों में दिलचस्पी दिखाई थी.

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अडानी को एमडीओ आधार पर गिधमुड़ी और पतुरिया कोयला खदानों को देने का फ़ैसला ऐसे समय में किया गया है, जब कुछ समय पहले ही पड़ोसी ज़िले सरगुजा में परसा कोयला खदान अडानी समूह को इसी तरह एमडीओ के तौर पर दिए जाने के बाद से विवाद चल रहा है.
आरोप है कि हसदेव अरण्य इलाके के इस कोयला खदान के लिए पंचायत क़ानून के तहत ग्रामसभा की सहमति के बिना फ़र्ज़ी काग़ज़ों के सहारे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई गई है. यहां तक कि कोयला उत्खनन के लिए वन अधिकार क़ानून के तहत मिले अधिकार को भी सरकार ने रद्द कर दिया.
वैसे दिलचस्प यह है कि एक के बाद एक, कुल पांच कोयला खदानें अडानी समूह को मिली हैं, हालांकि समूह की ओर से दावा यही है कि उन्होंने समुचित प्रक्रिया के बाद ही दूसरे समूहों को पछाड़ कर ये अुनबंध हासिल किया है.
जन संगठनों का आरोप है कि इन खदानों में कोयला उत्खनन का सिलसिला शुरू होने से हसदेव अरण्य में फैले पौने दो लाख हेक्टेयर में फैले घने जंगलों का अस्तित्व ख़तरे में आएगा.
यह वही इलाका है, जिसे यूपीए सरकार के कार्यकाल में वन्यजीवों और श्रेष्ठतम पर्यावरणीय पारिस्थितकी के कारण 'नो गो एरिया' घोषित करते हुए यहां कोयला उत्खनन पर रोक लगा दिया गया था. लेकिन बाद में यह रोक हटा ली गई और अब एमडीओ के सहारे फिर से खनन का रास्ता साफ़ हो गया है.
सवालों के घेरे में एमडीओ

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2014 में कोल खदानों के आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोप के बाद जब उच्चतम न्यायालय ने 214 कोयला खदानों का आवंटन रद्द कर दिया, तब केंद्र सरकार ने दावा किया कि इन कोयला खदानों का आवंटन अब नीलामी से किया जाएगा.
हालांकि इसके बाद केवल 27 प्रतिशत कोयला खदानों की ही नीलामी हो पाई और बाद में एक-एक कर अधिकांश कोयला खदानों को सार्वजनिक क्षेत्र या सरकारी कंपनियों को आवंटित कर दिया गया.
लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने कोयला खनन में अनुभव का हवाला दे कर अंततः इन खदानों को निजी कंपनियों को एमडीओ यानी माइन डेवलपर कम ऑपरेटर बना कर सौंप दिया.
इस एमडीओ को ही तमाम तरह की पर्यावरण स्वीकृतियां लेने, भूमि अधिग्रहण करने, कोयला खनन और परिवहन करने समेत तमाम काम करने होते हैं. यानी कहने को तो खदान सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र को आवंटित होती है लेकिन खदान पर पूरा नियंत्रण निजी कंपनी का ही होता है.
छत्तीसगढ़ में अडानी समूह के पास एमडीओ के तौर पर पहले से ही चार कोयला खदानें थीं, अब इसमें गिधमुड़ी और पतुरिया कोयला खदान भी जुड़ने वाली हैं.

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दिलचस्प ये है कि किसी भी एमडीओ की दर और दूसरी शर्तों को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है. अडानी और राज्य सरकार, दोनों ही इसके 'संवेदनशील' और 'निजता के अधिकार के भंग' होने का दावा करके इससे बचती रही हैं.
हालत ये है कि एमडीओ की दर और दूसरी शर्तों को सूचना के अधिकार में उपलब्ध कराए जाने के संसद में सरकार के दावे के बाद भी छत्तीसगढ़ में राज्य सूचना आयोग भी इसे उपलब्ध करा पाने में असफल साबित हुआ है.
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, "छत्तीसगढ़ में एक के बाद एक कोल खदानें अडानी को दी जा रही हैं. जंगल और आदिवासी हाशिये पर रख दिये गए हैं और कॉरपोरेट के लाभ के लिए सरकार भी इस साजिश में शामिल है. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि भाजपा के शासनकाल के बाद यह सब अब कांग्रेस की सरकार में भी जारी है."
आलोक शुक्ला का कहना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब विपक्ष में थे तो उन्होंने एमडीओ के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाई थी. लेकिन अब एमडीओ को रद्द करने और इसकी जांच के बजाय नए एमडीओ बनाने से कांग्रेस पार्टी की सरकार संदेह के घेरे में आ गई है.
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सरकार को नुक़सान
छत्तीसगढ़ में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव संजय पराते का आरोप है कि प्रतिस्पर्धी नीलामी की जगह एमडीओ के जरिये छत्तीसगढ़ के 5305 मिलियन टन कोल रिज़र्व वाली 14 कोयला खदानों को कॉरपोरेट कंपनियों को आवंटित किए जाने की जांच होनी चाहिए.
पराते का आरोप है कि राज्य सरकार की सहमति से ही केन्द्र सरकार द्वारा यह कोयला घोटाला किया गया है और इससे सरकारी ख़ज़ाने को 12.5 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुक़सान और निजी कंपनियों को इतना ही फ़ायदा पहुंचाया गया है.
पराते कहते हैं, "कॉरपोरेट घरानों को रॉयल्टी में छत्तीसगढ़ में औसतन प्रति टन 2400 रुपये तथा देश में औसतन 3500 रुपये प्रति टन का फ़ायदा मिल रहा है. छत्तीसगढ़ और देश में आवंटित खदानों के कुल रिज़र्व के हिसाब से यह फ़ायदा छत्तीसगढ़ में 12.5 लाख करोड़ और देश के पैमाने पर 60 लाख करोड़ रुपये से अधिक बैठता है."
लेकिन कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शैलेश नितिन त्रिवेदी का कहना है कि केंद्र सरकार के दबाव में इन कोयला खदानों के लिए राज्य की भाजपा सरकार ने निविदा निकाली थी.
त्रिवेदी का कहना है कि उनकी पार्टी एमडीओ के ख़िलाफ़ रही है और अभी भी अपने रुख़ पर क़ायम है.

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त्रिवेदी कहते हैं, "राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विपक्ष में रहते हुए इसका पुरज़ोर विरोध किया है और जल, जंगल व ज़मीन के मुद्दे पर अब भी किसी भी तरह के समझौते का सवाल नहीं उठता."
लेकिन यूपीए सरकार के दौरान कोयला खदान आवंटन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव का कहना है कि राज्य सरकार को गिधमुड़ी और पतुरिया कोयला खदान आवंटन के मामले में अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए.
सुदीप श्रीवास्तव ने एमडीओ के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर कर रखी है और उनका दावा है कि 2014 में कोयला खदानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी थी, एमडीओ उस भावना के ख़िलाफ़ है.
सुदीप श्रीवास्तव का कहना है कि हसदेव-अरण्य इलाके में कोयला उत्खनन से पर्यावरण संकट तो पैदा होगा ही, इससे हसदेव नदी और मिनीमाता बांगो बैराज का पूरा इलाका प्रभावित होगा और राज्य के सर्वाधिक सिंचित जांजगीर-चांपा ज़िले में जल संकट पैदा हो जाएगा.
श्रीवास्तव कहते हैं, "छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार को अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए और बताना चाहिए कि किन परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी की सरकार को भी एमडीओ जैसा रास्ता अख़्तियार करना पड़ा. अगर आप ध्यान से देखें तो एमडीओ असल में कोलगेट 2 है और यह अंततः निजी कंपनियों को ही लाभ पहुंचाने के लिए तैयार किया गया ग़ैरक़ानूनी रास्ता है."
अडानी का इनकार
हालांकि, अडानी समूह इन आरोपों से इनकार कर रहा है.

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हमने अडानी समूह से इन आरोपों के बारे में जानना चाहा, जिसमें कहा जा रहा है कि गिधमुड़ी-पतुरिया में जिस दर से एमडीओ दिया गया है, वह एसईसीएल या दूसरी कंपनियों की तुलना में अधिक है. जिस तरह परसा ईस्ट केते बासन में भी अडानी को अतिरिक्त लाभ पहुँचाया गया था, उसी तरह यहाँ भी अधिक दर से खनन का काम दे कर अडानी को लाभ पहुँचाया गया है.
कंपनी के अनुसार अडानी समूह कम से कम लागत पर अपनी विकास सेवाओं की पेशकश करने वाला एक सफल बोलीदाता के रूप में उभरा. इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि खनन ठेकेदार किसी भी तरह की अनाधिकृत लागत खदान मालिक से वसूल रहा है.
अडानी समूह की ओर से दिए गए जवाब के अनुसार "कोयला मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार स्ट्रिपिंग रेशियो और भूवैज्ञानिक परिस्थितियां जैसे कई कारणों से किसी एक खदान की लागत की तुलना, किसी दूसरी से उचित नहीं है."
अडानी समूह के दावे अपनी जगह हैं. लेकिन कोयला आवंटन और एमडीओ का मुद्दा कम से कम कोरबा और सरगुजा ज़िले में तो ताज़ा लोकसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन कर उभरेगा, यह तो तय है.
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