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गंगा यात्रा के बहाने किसे साधने की कोशिश में प्रियंका
लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की ज़मीन पर कांग्रेस की पकड़ मज़बूत करने के लिए कांग्रेस महासचिव और पू्र्वी यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी तीन दिवसीय पू्र्वांचल दौरे पर हैं.
इस दौरे की शुरुआत उन्होंने संगम नगरी प्रयागराज से की और वो गंगा के रास्ते बोट यात्रा करते हुए वाराणसी पहुंचेगी. इस दौरे पर प्रियंका गांधी जगह-जगह लोगों से संवाद करती और मंदिरों के दर्शन करती चल रही हैं. वह गंगा के तटों पर मौजूद अलग-अलग गांवों में भी जा रही हैं.
यात्रा के पहले दिन वो जहां हनुमान मंदिर में पूरे रीति रिवाज से पूजा करतीं और संगम में त्रिवेणी की आरती उतारी दिखीं तो बीच में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों के एक समूह से बात भी उन्होंने बात की.
प्रियंका गांधी की इस यात्रा की शुरुआत होते ही बसपा प्रमुख मायावती ने कांग्रेस को गठबंधन में शामिल होने का भ्रम न फैलाने की चेतावनी दी है तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी ये बात दोहराई है. जबकि कुछ समय पहले उन्होंने ही कांग्रेस के गठबंधन में होने की बात कही थी. वहीं, बीजेपी में भी प्रियंका गांधी के यूपी की राजनीति उतरने से बैचेनी देखने को मिली है.
ऐसे में प्रियंका गांधी की ये गंगा यात्रा इतनी महत्वपू्र्ण क्यों है और कांग्रेस इससे क्या हासिल करने वाली है, इन सभी पहलुओं की पड़ताल के लिए बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी ने वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय से बात की. पढ़ें, उनका नज़रिया:
कांग्रेस के चार खंभे
जिस तरह गंगा, यमुना, रामायण और महाभारत भारतीय संस्कृति के चौखंभे हैं उसी तरह कांग्रेस की ताक़त भी उसके चौखंभों में रही है. कांग्रेस के सुनहरे दिनों में बिहार के समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर इसे इस तरह परिभाषित करते थे कि महिलाएं, ब्राह्मण, मुसलमान और दलित, कांग्रेस के चौखंभे हैं यानि उसका वोट बैंक हैं.
ये चौखंभे कांग्रेस को सत्ता से हिलने ही नहीं देते थे. इनके कारण उसे कोई हरा नहीं सकता था. इंदिरा गांधी या नेहरू जी के ज़माने में कहा जाता था कि पार्टी अगर कुर्सी टेबल को भी टिकट दे दे, तो वो भी जीत जाएंगे. तो इस बात को समझने की ज़रूरत है कि ये गंगा की राजनीति कोई बिल्कुल नई नहीं है. ये सोची समझी रणनीति है क्योंकि जैसे कांग्रेस के पास से मुस्लिम भाग गए और वो हिंदू विरोधी भी कहलाने लगी तो उस छवि को काटने के लिए लगातार एक गंभीर प्रयास चल रहा है.
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ की कार्रवाई देख लीजिए. वो गायों के लिए काम कर रहे हैं और पुजारियों का वेतन बढ़ा रहे हैं. गुजरात में राहुल गांधी मंदिर-मंदिर में घूमे थे. इसके बाद उनका जनेऊधारी ब्राह्मण अभियान चला. उससे भी काम नहीं चला तो वो कैलाश पर्वत चले गए और अब बहन प्रियंका गंगा के रास्ते बनारस जा रही हैं. तो बहुत सोची-समझी रणनीति से अपने जनाधार को वापस लाने के लिए कांग्रेस ये सब कर रही है.
नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले कितनी मज़बूत
2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मां गंगा ने उन्हें बुलाया है और इस अपील के साथ उन्होंने बनारस से चुनाव लड़ा था. इसकी तुलना में प्रिंयका गांधी की शुरुआत कितनी प्रभावी हो सकती है?
मां गंगा भारतीयों के दिल में बसा हुआ शब्द है. उस वक़्त नरेंद्र मोदी ने बहुत ही भावनात्मक नारा दिया था. पूरे वाराणसी ने उन्हें इस कारण भी स्वीकार किया था कि उन्होंने भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि वह मां गंगा की सेवा करेंगे और गंगा बुलावे पर ही वहां आये हैं. तब ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति भी इस बात से प्रभावित हो गया था.
अब प्रियंका गांधी के अभियान के केंद्र में भी मां गंगा है. उनके रणनीतिकारों को ये उम्मीद है कि शायद उनकी भी जनता में स्वीकृति हो जाए. हालांकी, अभी शुरुआत में ही हम ये नहीं कह सकते हैं कि प्रियंका की इस यात्रा का भी वैसा ही कोई चमत्कारिक परिणाम होगा.
दरअसल, मोदी की अपील को समर्थन देने के लिए उनके पास एक बहुत सशक्त संस्थान था. लेकिन, आज कांग्रेस का वहां कोई संस्थान नहीं है या न के बराबर है. इसलिए आज मायावती का भी ये बयान आया.
दूसरे दल और ख़ुद कांग्रेस ये जानती है कि अगर कांग्रेस सवर्णों का वोट बांट लेती है तो बीजेपी को नुक़सान होगा और तब ये महागठबंधन ज़ोरदार ढंग से चुनाव अपने पक्ष में ले जा सकता है. लेकिन, अगर वोट पूरी तरह नहीं बंटा तो दिक्क़त आएगी.
दूर की सोच रही कांग्रेस
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह ने नर्मदा यात्रा निकाली थी और इससे जनाधार और अपने काडर को पुनर्जीवित करने कोशिश की थी. क्या कांग्रेस गंगा यात्रा से भी ऐसा ही कुछ करने की कोशिश में है?
ये उसी रणनीति की कड़ी है. इतना तो मध्य प्रदेश में हो ही गया है कि आज राज्य में कोई कांग्रेस को हिंदू विरोधी नहीं कह सकता है. हिंदू विरोधी छवि से निजात पाने के लिए भी कांग्रेस ये कोशिश कर रही है.
साथ ही रणनीति का एक हिस्सा ये भी है कि कांग्रेस तुरंत लाभ के बारे में नहीं सोच रही है. जो कांग्रेस यूपी में पूरी तरह ख़त्म हो गई थी वो मेहनत करके उसे जिलाना चाहते हैं ताकि 2022 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी को मज़बूती दे सकें.
फ़िलहाल कांग्रेस ख़ुद भी किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं कर रही है. अभी दो सीट उनके पास है और बहुत जमकर लड़ने पर अगर सात-आठ सीट भी जीत जाते हैं तो ये कांग्रेस की बहुत बड़ी सफलता होगी. इससे ज़्यादा वो सोच भी नहीं रहे हैं.
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