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चुनाव आचार संहिता के क्या हैं मायने?
उत्तर प्रदेश-पंजाब सहित भारत के विभिन्न राज्यों में चुनाव अब कुछ महीने दूर रह गए हैं.
चुनाव आयोग ने अब तक इन राज्यों में चुनाव कराए जाने के लेकर अभी कोई घोषणा नहीं की है, लेकिन कयास हैं कि चुनाव आयोग जल्दी ही इसकी घोषणा कर सकता है.
चुनाव आयोग की घोषणा के साथ ही इन राज्यों में चुनावी आचार संहिता लागू हो जाएगी.
देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग के बनाए गए नियमों को ही आचार संहिता कहते हैं.
आचार संहिता लागू होते ही शासन और प्रशासन में कई अहम बदलाव हो जाते हैं.
- राज्यों और केंद्र सरकार के कर्मचारी चुनावी प्रक्रिया पूरी होने तक सरकार के नहीं, चुनाव आयोग के कर्मचारी की तरह काम करते हैं.
- आचार संहिता लागू होने के बाद सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किसी ऐसे आयोजन में नहीं किया जा सकता जिससे किसी विशेष दल को फ़ायदा पहुंचता हों. आचार संहिता लगने के बाद सभी तरह की सरकारी घोषणाएं, लोकार्पण, शिलान्यास या भूमिपूजन के कार्यक्रम नहीं किए जा सकते हैं.
पढ़ें-
सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगला का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता है.
किसी भी पार्टी, प्रत्याशी या समर्थकों को रैली या जुलूस निकालने या चुनावी सभा करने की पूर्व अनुमति पुलिस से लेना अनिवार्य होता है.
कोई भी राजनीतिक दल जाति या धर्म के आधार पर मतदाताओं से वोट नहीं मांग सकता है.
राजनीतिक कार्यक्रमों पर नज़र रखने के लिए चुनाव आयोग पर्यवेक्षक भी नियुक्त करता है.
आचार संहिता के उल्लंघन पर चुनाव आयोग क्या कर सकता है?
यदि कोई प्रत्याशी या राजनीतिक दल आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करता है तो चुनाव आयोग नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है.
उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है. ज़रूरी होने पर आपराधिक मुक़दमा भी दर्ज कराया जा सकता है.
आचार संहिता के उल्लंघन में जेल जाने तक के प्रावधान भी हैं.
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