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मोदी को मुलायम की शुभकामना में छिपा था अखिलेश के लिए संदेशः नज़रिया
- Author, अंबिकानंद सहाय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
जलवा जिसका कायम है, उसका नाम मुलायम है. यह लखनऊ में पुरानी कहावत है. वो जितने भी निष्क्रिय नज़र आएं लेकिन उनमें ऐसी राजनीतिक सिफ़त (गुण) है कि वो ख़बरों में और जनता के बीच भी बने रहते हैं.
चाहे पारिवारिक सुलह या विवाद हो, चाहे बसपा या कांग्रेस का कट्टर विरोध हो, वो ख़बरों में बने रहते हैं.
जनता के बीच मुलायम सिंह यादव बहुत सख्त छवि वाले नेता के तौर पर जाने जाते हैं, मौलाना मुलायम हैं, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से वो बहुत लचीले हैं.
ममता बनर्जी से पूछिए मुलायम सिंह यादव के बारे में. सुबह तय हुआ कि प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति पद के लिए विरोध करना है लेकिन दोपहर होते होते बिल्कुल पलट गये.
वैसे ही सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनना था तो सुबह तक यह तय था कि सपा विरोध पक्ष के साथ जाएगी, लेकिन वो फिर पलट गए और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए.
युवा मतदाता कितने असरदार
निश्चित ही युवा वर्ग देश का सबसे बड़ा मतदाता है लेकिन यह समझना भी भूल है कि वो एक अलग मतदाता समूह है.
देश की राजनीति, ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश में जातियों में बंटा हुआ समाज है. यहां जातिवाद सबसे अधिक राजनीति पर हावी होता है वहां युवा वर्ग अलग-थलग वोट बैंक नहीं माना जा सकता. शहरी क्षेत्रों में यह बहुत हद तक संभव हो सकता है लेकिन आज भी इस देश में ग्रामीण मतदाताओं की संख्या ज़्यादा है.
प्रचंड मोदी लहर में भी मुलायम सिंह यादव 2014 में मैनपुरी से 3,64,666 मतों से जीते. इसलिए मीडिया में यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें सबसे सुरक्षित सीट से उतारा जा रहा है. इसके पीछे वजह है कि वो इस सीट से तीन बार चुनाव जीत चुके हैं. पहली बार 1996 में दूसरी बार 2004 में और फिर 2009 में. 2014 में वो दो सीटों से चुनाव लड़े थे और बाद में मैनपुरी की सीट को छोड़ दिया था.
मुसलमान उनके साथ रहते हैं. जिस तरह लालू यादव बिहार में हैं, उसी तरह उत्तर प्रदेश में यादव गौरव के इकलौता प्रतीक मुलायम सिंह यादव है न कि अखिलेश यादव.
अखिलेश को नेता मुलायम ने बनाया
परदे के पीछ के खेल की हक़ीकत क्या है ये सब नहीं जानते. बाहर दिखता है कि उन्होंने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाया.
उस समय अखिलेश यादव के पास बतौर पार्टी प्रमुख मुलायम थे. इसलिए अखिलेश मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन मुख्यमंत्री बन जाने मात्र से ही राजनीति में किसी को नेता नहीं माना जाता है. नेता बनने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है.
जब परिवार में अनबन की बातें आने लगी तो मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे को खुली छूट दी कि यदि आप में ताक़त है और राजनीति पर पकड़ है तो नेता बनो और इसके बाद तीन वर्षों के भीतर अखिलेश यादव नेता बन गए.
तो अंदरखाने में यह चल रहा था. यानी मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे को नेता के तौर स्थापित किया है.
मोदी को शुभकामना क्यों दी?
संसद में फिर से प्रधानमंत्री बनने की शुभकामना निश्चित ही उन्होंने मोदी को दी लेकिन यह संदेश था उनके अपने बेटे अखिलेश यादव के लिए.
वो अखिलेश को संदेश दे रहे थे कि राजनीति में लचीला बनो, अगर तुम जैसा चाहते हो कि नतीजा आए और वो नहीं आया और नरेंद्र मोदी को कुछ सीटों की ज़रूरत हो तो समर्थन देने से मत हिचकिचाना.
क्या बीजेपी को मिलेगा बसपा-सपा का साथ?
जब मुलायम सिंह यादव सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ जाकर वाजपेयी को समर्थन दे सकते हैं. 1977 में जनसंघ के साथ चुनाव लड़ सकते हैं, बाद में वो बीजेपी के साथ भी चुनाव मैदान में साथ उतरते हैं तो राजनीति में सब कुछ संभव है.
आज सपा-बसपा घोर बीजेपी विरोधी हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी को समर्थन दे, यह भी संभव है.
वैसे भी बसपा तीन बार बीजेपी का समर्थन कर चुकी हैं, खुद वो बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी हैं तो राजनीति के भविष्य के तह में क्या है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
जहां तक अंकगणित का सवाल है, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा अपराजेय गठबंधन है. यदि दोनों पार्टियों का वोट एक दूसरे को हस्तांतरित हो गया तो उन्हें हराना बहुत मुश्किल है.
जहां तक सवाल कांग्रेस पार्टी का है तो उत्तर प्रदेश में वो एक बहुत छोटी खिलाड़ी है.
लेकिन अब तक दोनों पार्टियों ने कम ही सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है तो संभव है कांग्रेस से बात हो जाए, वैसे भी अखिलेश खुद यह कहते रहे हैं कि कांग्रेस गठबंधन में शामिल है, उन्हें दो सीटें दी हैं.
क्या मुलायम अब भी पीएम बनने की लालसा रखते हैं?
कबीर का एक दोहा याद आ रहा है.
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर
आशा, तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर
यानी, इच्छाएं कभी नहीं मरतीं. किसी चीज की चाहत हमेशा जीवित रहती है.
(बीबीसी संवाददाता भूमिकाराय से बातचीत पर आधारित)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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