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ओआईसी के मंच से सुषमा ने पाकिस्तान को क्या मैसेज दिया?
- Author, संदीप सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन (ओआईसी) की बैठक में कहा कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई किसी मज़हब के ख़िलाफ़ नहीं है.
सुषमा ने कहा, "जो देश चरमपंथ को पनाह देते हैं और उनका वित्त पोषण करते हैं, उन्हें निश्चित ही उनकी धरती से चरमपंथ शिविरों को समाप्त करने के लिए कहा जाना चाहिए."
उन्होंने कहा कि यह एक महामारी है और तेज़ी से फैलती जा रही है और इसे अलग-अलग तरीके से चलाया जा रहा है.
सुषमा ने कहा, "अगर हम मानवता को बचाना चाहते हैं, तो हमें निश्चित ही चरमपंथियों का वित्तपोषण करने वाले और उन्हें पनाह देने वाले देशों से उनकी धरती पर चरमपंथी शिविरों के ढांचों और पनाहगाहों को ख़त्म करने के लिए कहना चाहिए."
ओआईसी के सम्मेलन में सुषमा स्वराज को बुलाए जाने की वजह से इसके संस्थापक सदस्यों में से एक पाकिस्तान ने इसमें भाग लेने से मना कर दिया था. पाक विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने सुषमा की उपस्थिति की वजह से इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया.
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कश्मीर के पुलवामा में हुए हमले के बाद और पाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के प्रशिक्षण शिविरों पर भारत के हवाई हमले के तीन दिन बाद सुषमा स्वराज ने ओआईसी के मंच से पाकिस्तान का नाम लिए बिना उस पर निशाना साधा. पुलवामा हमले की ज़िम्मेदारी जैश ने ही ली थी.
सुषमा ने कहा कि चरमपंथ के ख़तरे को सिर्फ़ "सैन्य, ख़ुफ़िया या कूटनीतिक" तरीकों से नहीं हराया जा सकता, बल्कि इसे "हमारे मूल्यों की मज़बूती और धर्म के संदेश" से जीता जा सकता है.
उन्होंने कहा, "यह सभ्यता और संस्कृति का टकराव नहीं है, बल्कि विचारों और आदर्शों के बीच प्रतिस्पर्धा है."
ओआईसी के मंच पर भारत का होना कितना अहम?
ये पहला मौका है जब ओआईसी ने भारत को विशेष अतिथि के तौर पर अपने सम्मेलन में आमंत्रित किया है. ओआईसी में हमेशा से सऊदी अरब का दबदबा रह है और पाकिस्तान का बोलबाला रहा है.
लेकिन शुक्रवार को इसमें सुषमा स्वराज का चरमपंथ पर मुखर होना और पाकिस्तान का इसमें शामिल नहीं होना भारत की विदेश नीति के लिहाज से कितना महत्वपूर्ण है?
भारत की नज़र में ओआईसी पाकिस्तान के लिए एक ऐसा इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म रहा है जहां उस पर कोई रोकटोक नहीं है.
भारत का आरोप है कि पाकिस्तान ने इस मंच का जमकर दुरुपयोग किया है. कश्मीर, बाबरी मस्जिद और मुसलमानों के कथित मानवाधिकार हनन के प्रस्तावों के साथ पाकिस्तान की भाषा भी भारत के लिए बर्दाश्त से बाहर होती चली गई.
नतीजा ये हुआ कि भारत ने पहले तो अपनी कड़ी आपत्ति जताई, लेकिन साल 2001 से इस पर प्रतिक्रिया देना ही बंद कर दिया.
लेकिन अब, जब भारत और पाकिस्तान के बीच पुलवामा हमले के बाद तनाव अपने चरम पर है और भारत पाकिस्तान से लगने वाली सीमा पर चरमपंथियों के ठिकानों पर हवाई हमले करने के दावे कर रहा है, ओआईसी के मंच पर भारत की मौजूदगी का महत्व कई गुना बढ़ जाता है.
ओआईसी में आखिर क्यों बुलाया गया भारत को?
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ द इस्लामिक कॉ-ऑपरेशन (ओआईसी) 57 देशों का समूह है, जो मोटे तौर पर इस्लाम को मानने वाले देशों से मिलकर बना है.
पचास साल पहले येरुशलम में अल अक़्सा मस्जिद पर हमले के बाद मुसलमानों के पवित्र स्थलों को महफ़ूज़ बनाने, परस्पर सहयोग बढ़ाने, नस्लीय भेदभाव और उपनिवेशवाद का विरोध करते हुए इस समूह की आधारशिला रखी गई थी. लेकिन ओआईसी की बुनियाद में ही भारत के साथ विवाद के बीज पड़ गए.
भारत के पूर्व राजनयिक तलमीज़ अहमद कहते हैं कि सुषमा स्वराज का इस मंच से संवाद करना भारत के नज़रिए से बहुत महत्वपूर्ण है.
किंग अब्दुल अज़ीज मेडल से सम्मानित तलमीज़ अहमद पश्चिम एशिया की राजनीति के जानकार और ओमान, यूएई और सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे हैं.
वो कहते हैं, "1969 में रबात में भारत के साथ जो बदसलूकी की गई थी, उसे अब ठीक किया जा रहा है. ये सबसे अहम पहलू है."
"दूसरी बात ये है कि 1990 से पाकिस्तान ने ओआईसी के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया है. भारत के ख़िलाफ़ कई प्रस्ताव रखे हैं. इन प्रस्तावों की भाषा और इनमें जो धोखा किया गया है, वो बर्दाश्त से बाहर है. भारत ने साल 2001-02 में अपना रुख़ तय किया. तब जसवंत सिंह विदेश मंत्री थे. उन्होंने निर्देश दिया कि हम इन प्रस्तावों पर ध्यान ही नहीं देंगे."
तलज़ीम अहमद कहते हैं, "पाकिस्तान हर साल ओआईसी का इस्तेमाल कर रहा है और भारत के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा प्रस्ताव ला रहा है. मुझे लगता है कि ओआईसी के कई ज़िम्मेदार सदस्यों को अब लगता है कि ये अप्रोच सही नहीं है, इसे ठीक करना चाहिए. भारत को न्यौता देना और भारतीय विदेश मंत्री को 'गेस्ट ऑफ ऑनर' बनाना, मुझे लगता है कि वो पचास साल पुरानी ग़लती को अब सुधार रहे हैं."
क्या हुआ था 1969 में?
अगस्त 1969 में एक इसराइली व्यक्ति (जिसे बाद में मानसिक रूप से विक्षिप्त माना गया), उसने अल-अक़्सा मस्जिद पर हमला किया और उसमें आग लगाने की कोशिश की. 1967 के युद्ध के बाद ये मस्जिद इसराइल के कब्ज़े वाले इलाक़े में आ गई थी.
तब मुसलमान देशों में ज़ाहिर तौर पर बहुत घबराहट फैली थी कि ये मस्जिद को तोड़ने की एक साज़िश है. इसी मुद्दे पर चर्चा करने के लिए मोरक्को के रबात में 24 मुसलमान देश इकट्ठे हुए.
मोरक्को के किंग हसन ने सबको बुलाया था. लेकिन इसके पीछे सऊदी अरब का हाथ था. तब वहां सऊदी शाह फ़ैसल की सत्ता थी.
रबात में हुई बैठक में अल-अक़्सा मस्जिद पर हमले की भर्त्सना की गई. इस ग्रुप में उन्होंने भारत को भी बुलाया था. भारत को इसलिए बुलाया क्योंकि यहां बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं.
इस्लामी संस्कृति के साथ भारत का लिंक रहा है. औऱ इस कारण भारत इस समूह में एक स्वाभाविक भागीदार था.
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल वहां पहुंचने वाला था. लेकिन इससे पहले पाकिस्तान के नेता याह्या ख़ान ने कहा कि भारत को नहीं बुलाना चाहिए. उनका कहना था कि भारत यदि आया और सदस्य बना तो पाकिस्तान अपना नाम वापस ले लेगा.
उस ज़माने में पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंध बड़े प्रगाढ़ थे. सऊदी अरब ने फ़ैसला किया कि भारत के आमंत्रण को रद्द कर दिया गया.
तलज़ीम अहमद कहते हैं, "भारतीय प्रतिनिधिमंडल को कॉन्फ्रेंस रूम से हटा दिया गया. भारत की बड़ी बेइज्ज़ती की गई. भारतीय प्रतिनिधिमंडल को जहां आधिकारिक रूप से ठहराया गया था, वहां से भी उसे निकाल दिया गया. मैं इसे भारत की सबसे बड़ी बेइज्ज़ती कहूंगा. भारत को बहुत तरह से शर्मसार किया गया."
तलमीज़ अहमद कहते हैं, "भारत को इस मंच पर बुलाने में संयुक्त अरब अमीरात की अहम भूमिका है. जानकार कहते हैं कि सऊदी अरब से विचार विमर्श के बिना संयुक्त अरब अमीरात भारत को न्यौता नहीं दे सकता."
"इस हिसाब से देखें तो भारत-पाकिस्तान के बीच सीमा पर बदलते घटनाक्रम के बीच दुबई में ओआईसी के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है."
पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ किया मंच का उपयोग
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर कमाल पाशा कहते हैं, "पाकिस्तान ने यहां कश्मीर के एक हिस्से को भारतीय कब्ज़े वाला कश्मीर कहा. पाकिस्तान ने कहा कि भारत में मुसलमानों के मानवाधिकारों का हनन किया जाता है. बाबरी मस्जिद तोड़े जाने और उसके बाद हुए दंगों का मुद्दा भी पाकिस्तान ने उठाया."
"पाकिस्तान के इस तरह के प्रस्ताव हर साल बढ़ते चले गए और उनकी भाषा भी ख़राब होती चली गई. इस तरह ओआईसी ने पाकिस्तान के प्रस्तावों के ज़रिए कश्मीर पर जो रुख़ कायम किया, वो भारत के एकदम ख़िलाफ़ हैं. लेकिन ये भी ध्यान देने वाली बात है कि ये प्रस्ताव ओआईसी के सभी सदस्यों के रुख़ को नहीं दर्शाते."
कुल मिलाकर यह देखा जा सकता है कि इस मंच का उपयोग सुषमा स्वराज ने यह दिखाने में बखूबी किया कि भारत एक मॉडरेट इस्लाम को रिफ्लेक्ट करता है.
भारत में लगभग 20 करोड़ मुसलमान है. उन्होंने इस मंच का उपयोग यह संदेश देने में किया कि भारतीय मुसलमान जिहाद को पसंद नहीं करता और यहां के लोग मेलजोल, सहिष्णुता और बहु-संस्कृति में विश्वास रखते हैं.
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