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क्या पुलवामा में CRPF के क़ाफ़िले पर हमले को रोका जा सकता था?
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में अपनी तरह के पहले पूर्व-नियोजित आत्मघाती हमले में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के कम से कम 40 जवान मारे गए हैं.
ये पहली बार है कि आत्मघाती हमलावर ने बारूद से भरी एक गाड़ी को सुरक्षाबलों की गाड़ी से टकरा दिया.
ये घटना अफ़ग़ानिस्तान या इराक़ की याद दिलाती है.
रिपोर्टों के मुताबिक़ आत्मघाती हमले के बाद सुरक्षाबलों पर फ़ायर भी किए गए.
मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं लेकिन सवाल पूछे जा रहे हैं कि ये घटना कैसे हुई, और चूक कहां हुई होगी.
एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा, "इतनी विस्फोटक से भरी गाड़ी घूमती रही और उसका पता नहीं चला. इसके लिए हमको बहुत अफ़सोस है."
सीआरपीएफ़ प्रमुख आरआर भटनागर ने एएनआई से कहा था कि जम्मू से श्रीनगर जा रहे सीआरपीएफ़ के इस दल में ढाई हज़ार जवान चल रहे थे.
इस पर मलिक ने कहा, "फ़ोर्सेज़ के चलने के जो नियम हैं उनको कहीं तोड़ा (गया) है. ढाई हज़ार लोगों को लेकर एक साथ नहीं चला जाता है. आईईडी ब्लास्ट का जहां ख़तरा होता है गाड़ियां तेज़ रफ़्तार से चलती हैं. लेकिन ये क़ाफ़िला धीरे-धीरे आ रहा था, कोई भी आकर इसपर हमला कर गया. हमारी ग़लती हुई है."
चरमपंथियों को अंदरूनी मदद की संभावना पर मलिक ने कहा, "भेदिए तो उनके सब जगह हैं."
बीबीसी ने हमले के विभिन्न पहलुओं पर सीआरपीएफ़, बीएसएफ़ और सेना में काम करने वाले और रिटायर्ड अधिकारियों से बात की.
नई चुनौती के लिए कोई सोच नहीं
अधिकारी कह रहे हैं कि इस नए तरीक़े के हमले के बाद अब उन्हें घाटी में काम करने के तरीक़े को बदलना होगा.
पूर्व सीआरपीएफ़ प्रमुख दिलीप त्रिवेदी के मुताबिक़ घाटी में पूर्व में सुरक्षाकर्मियों पर ज़्यादा हमले आईडी ब्लास्ट या गोलियों से होते थे जिससे निपटने के लिए रोड ओपेनिंग पार्टीज़ (आरओपी) का इस्तेमाल होता था.
ज़्यादातर सीआरपीएफ़ के जवान ही इन पार्टीज़ का हिस्सा होते थे.
इन दलों का काम होता था सुरक्षाकर्मियों की आवाजाही के लिए रास्ता सुरक्षित करना.
ये पार्टीज़ सुरक्षाकर्मियों के गुज़रनेवाले रास्ते, सड़क के किनारे पुल और पुलियों, सड़क के किनारे दुकानों और गांवों को सूंघने वाले कुत्तों, विस्फोटक पता लगाने वाले उपकरणों की मदद से रास्ते को सुरक्षित बनाती थीं. वो छानबीन करती थीं कि कहीं आसपास ताज़ा खुदाई करके नीचे बम तो नहीं प्लांट किया गया.
सीमा सुरक्षा बल के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक पीके मिश्रा के मुताबिक़ इन पार्टीज़ का काम न सिर्फ़ सड़क को बल्कि सड़क से लगे कुछ दूर तक के इलाक़े को सुरक्षा घेरे में लाना होता है लेकिन एक व्यस्त राजमार्ग पर हमेशा ऐसा कर पाना आसान नहीं. मिश्रा के मुताबिक़ इन पार्टीज़ में जवानों की संख्या हज़ारों में होती है.
लेकिन दिलीप त्रिवेदी के अनुसार, "ये पहली बार है जब किसी ने गाड़ी में बारूद रखकर ख़ुद को उड़ा लिया हो" और इसके लिए कोई तरीक़ा या एसओपी सोचा ही नहीं गया था.
यानि चाहे जो कुछ कर लिया जाता, लोगों की जान जाना तय था. इसलिए चरमपंथ से निपटने के लिए नए तरीक़ों को खोजना होगा.
इंटेलिजेंस में चूक
दिलीप त्रिवेदी के मुताबिक़ इस घटना में शुरुआत से आख़िर तक सुरक्षा चूक है.
वो पूछते हैं, ''कैसे इतनी बड़ी मात्रा में बारूद घाटी में आया, उसे सुरक्षित रखा गया, उसे गाड़ी में लादा गया, उसमें डेटोनेटर्स लगाए गए, कैसे वो गाड़ी सुरक्षाबलों की गाड़ियों के नज़दीक पहुंची और किसी को कुछ पता नहीं चला.''
पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक के मुताबिक़, "हमले के लिए गाड़ी और हमलावर को तैयार करने में कई दिन लगे होंगे. ये कैसे हुआ कि हमें कुछ पता नहीं चला."
ये ज़िम्मेदारी स्थानीय इंटेलिजेंस अधिकारी की थी कि वो ये जानकारी इकट्ठा करें जो नहीं हो सका.
70 से ज़्यादा गाड़ियों और ढाई हज़ार जवानों का लंबा क़ाफ़िला
सवाल पूछे जा रहे हैं कि इतने लंबे क़ाफ़िले के साथ चरमपंथ प्रभावित दक्षिणी कश्मीर से गुज़रना कितनी सही था.
पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक के मुताबिक़ गाड़ियों की इतनी लंबी क़तार का गुज़रना आम बात नहीं. इस लंबी क़तार का कारण था बर्फ़बारी की वजह से ड्यूटी से श्रीनगर लौट रहे जवानों की आवाजाही पर रोक.
कुछ महीनों पहले तक जब भी सैनिकों का कारवां गुज़रता था तब आम लोगों की गाड़ियों को जाने की इजाज़त नहीं होती थी. जनरल मलिक के मुताबिक़ राजनीतिक दबाव के बाद आम लोगों को भी अपनी गाड़ियों को किनारे से ले जाने देने की अनुमति मिली और इस हमले के बाद पुरानी स्थिति को बहाल कर दिया गया है.
उधर पूर्व सीआरपीएफ़ प्रमुख के दुर्गा प्रसाद कहते हैं, "अगर ये कारवां टुकड़े में भी चलता फिर भी बारूद से भरी गाड़ी को आप कैसे रोकते?"
सूत्रों ने उन्हें बताया कि बारूद से भरी ये गाड़ी राजमार्ग से लगी सड़क पर कुछ देर जवानों के कारवां के साथ चलती रही और उसके बाद एक जुड़ी सड़क से होते हुए राजमार्ग पर आ गई और जवानों के वाहन से टकरा गई.
दुर्गा प्रसाद कहते हैं, "इस गाड़ी को रोकने का एकमात्र तरीक़ा था कि राजमार्ग से जुड़ने वाली सड़क पर ट्रैफ़िक को उस वक़्त तक रोके रखा जाए जब तक सभी जवान आगे न निकल जाएं."
लेकिन ऐसा करना कितना संभव था?
आम बसों पर सवार जवान
सवाल उठ रहे हैं कि चरमपंथ प्रभावित दक्षिण कश्मीर से गुज़रने वाले इस कारवां में जवान आम बसों पर क्यों सवार थे और उन्हें श्रीनगर पहुंचाने के लिए हेलिकॉप्टर या बख़्तरबंद गाड़ियों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया.
जनरल मलिक के मुताबिक़, "मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता हूं लेकिन मुझे बताया गया है कि इन बसों में सुरक्षा की व्यवस्था थी."
उधर पूर्व सीआरपीएफ़ प्रमुख दिलीप त्रिवेदी के मुताबिक़ वो 80 के दशक से कश्मीर में आम बसों पर सफ़र कर रहे हैं और पिछले 20-30 सालों में सब कुछ ठीक रहा था.
अधिकारियों के मुताबिक़ हज़ारों जवानों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल प्रैक्टिकल बात नहीं और "बख़्तरबंद गाड़ियों का इस्तेमाल ऑपरेशंस के लिए होता है."
रिपोर्टों के मुताबिक़ ड्यूटी पर लौटने वाले ये जवान निहत्थे थे. जनरल मलिक के मुताबिक़ सुरक्षा कारणों से बड़ी संख्या में हथियार नहीं दिए जाते लेकिन ऐसी हर बस पर हथियारबंद जवान तैनात होते हैं.
असुरक्षित जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर गुज़रना कितना सही
मारे गए सीआरपीएफ़ के जवान जम्मू-कश्मीर राजमार्ग नंबर 44 से गुज़र रहे थे जब हमला हुआ. ये राजमार्ग श्रीनगर को बाक़ी देश से जोड़ता है. इस राजमार्ग पर सुरक्षाबलों के अलावा आम लोग भी सफ़र करते हैं और इसे पूर्ण सुरक्षित रखना आसान नहीं.
पूर्व सीआरपीएफ़ प्रमुख के दुर्गा प्रसाद के मुताबिक़ शुरुआत में इस राजमार्ग में कुछ ही सड़कें जुड़ती थीं लेकिन स्थानीय लोगों की मांग पर इसे ज़्यादा सड़कों से जोड़ दिया गया.
राजमार्ग को पूर्ण सुरक्षित रखने का मतलब है कि हर थोड़ी दूर पर एक सुरक्षाकर्मी की तैनाती ताकि राजमार्ग पर आने वाली गाड़ियों को नियंत्रित किया जा सके लेकिन अधिकारियों के मुताबिक़ इतने सुरक्षाकर्मी उपलब्ध ही नहीं.
सीआरपीएफ़ पर लगातार हमले क्यों
पूर्व अधिकारी पूछ रहे हैं कि चाहे घाटी हो या फिर नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़, सीआरपीएफ़ के जवानों पर ही इतने हमले क्यों हो रहे हैं जिसमें बड़ी संख्या में जवान मारे जा रहे हैं. वो सीआरपीएफ़ की लीडरशिप पर भी सवाल उठाते हैं.
जनरल वीपी मलिक के मुताबिक़ ये ज़रूरी है कि जवानों की ट्रेनिंग, उनकी तैनाती के तरीक़ों पर ध्यान दिया जाए. उधर सीआरपीएफ़ के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक़ 70 से 80 प्रतिशत मामलों में उनकी तैनाती देश के सबसे चुनौतीपूर्ण इलाक़ों में होती है जिसके कारण उन पर इतने हमले होते हैं.
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