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बमों से खेलते हैं झारखंड के ये ‘मोदी जी’
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
"पिताजी शिक्षक थे. सो, बचपन में मुझे आलू बम (एक तरह का पटाखा) तक फोड़ने की भी इजाजत बड़ी मुश्किल से मिल पाती थी. वे डरते थे कि कहीं मेरा हाथ न उड़ जाए. कई दीपावली हमने फुलझड़ी जलाकर ही मना ली. पिताजी ने हमारे लिए आलू बम तक नहीं ख़रीदे. अब बड़े-बड़े बमों को डिफ़्यूज़ करने में भी डर नहीं लगता. यह हमारे लिए पटाखे फोड़ने से भी ज़्यादा आसान काम है. मैं इसे एन्जॉय करता हूं."
यह कहते हुए असित कुमार मोदी की आंखें चमकने लगती हैं. असित झारखंड पुलिस में इंस्पेक्टर के तौर पर काम करते हैं.
अपने 25 साल के करियर के दौरान असित ने 800 से भी अधिक बमों को डिफ़्यूज़ यानी नाकाम किया है. इनमें 40 किलो तक के बम शामिल हैं, जिनके विस्फोट होने से बड़ी तबाही मच सकने का ख़तरा था.
लेकिन, असित मोदी की उंगुलियों ने उन्हें कभी धोखा नहीं दिया. बमों से अदावत में जीत हर बार उनकी ही हुई. यही उनकी खास पहचान की वजह भी है.
असित को मुख्यमंत्री पदक से सम्मानित किया जा चुका है और पुलिस विभाग से उन्हें सैकड़ों प्रशस्ति पत्र मिले हैं.
झारखंड पुलिस के महानिदेशक (डीजीपी) दिनेश कुमार पांडेय ने हाल ही में उन्हें दस हज़ार रुपये का इनाम दिया है.
लेकिन, असित को फुर्सत नहीं कि वो अपनी पत्नी और बच्चों को कहीं बाहर खाना खिलाने भी ले जा सकें. आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र पुलिस तैयारियों में लगी है.
असित मोदी को अधिकारियों ने पुलिस जवानों की ट्रेनिंग में लगाया है. वो उन्हें दूसरी ज़रूरी बातों के साथ लैंडमाइन की पहचान करना और बमों से बचने के तरीके समझा रहे हैं. इस कारण उनकी व्यस्तता बढ़ गई है.
डीजीपी दिनेश कुमार पांडेय उनके काम की सराहना करते हुए कहते हैं कि पुलिस को असित मोदी की वीरता पर गर्व है. वो कहते हैं, "800 से भी अधिक बमों को डिफ़्यूज़ करना असाधारण उपलब्धि है."
पति पर है पूरा भरोसा
असित मोदी की पत्नी सुचित्रा गृहिणी हैं. उन्हें इस बात का गौरव है कि उनके पति की पहचान वीर पुलिस अधिकारी के तौर पर है. इसलिए असित मोदी की व्यस्तता से भी उन्हें कोई परेशानी नहीं. हालांकि, ये ज़रूर है कि पति द्वारा बमों को डिफ़्यूज़ किए जाने की हर सूचना उनकी नींद उड़ा देती है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "जब ये (असित मोदी) घर से बाहर जाते हैं, तो मन में डर बना रहता है. फिर लगता है कि भगवान हैं और मुझे इन पर विश्वास है कि वे लौट कर ज़रूर आएंगे. बस इसी सहारे हम लोग इनका इंतजार करते हैं."
"कई दफ़ा यह इंतजार 3-4 दिन लंबा भी हो जाता है. तब चिंता और ज़्यादा होती है जब इनका मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता."
पुलिस सेवा में ही देखा था बम
बिहार में 1994 बैच के सब इंस्पेक्टर (अब इंस्पेक्टर) असित कुमार मोदी के पिता विभूति भूषण मोदी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा पुलिस में भर्ती हो.
वो बोकारो ज़िले के चंदनकियारी प्रखंड के चंदा गांव के रामडीह टोला में रहते थे. उनके सात बेटे-बेटियों में असित सबसे छोटे हैं, लिहाजा उन्हें सबका दुलार मिला.
पिताजी के शिक्षक होने के कारण असित ने बंदूक या बम पहली बार पुलिस की नौकरी के दौरान ही देखा. झारखंड गठन के बाद उनका कैडर बदल गया और वे झारखंड चले आए.
'डोंट बी ए डेड हीरो'
घर के ऐसे माहौल के बावजूद असित क्यों नहीं डरते, इस सवाल के जवाब में असित मोदी कहते हैं, "बमों को डिफ़्यूज़ करते वक्त अगर आप डर गए, तो कभी सफल नहीं होंगे. आपको मानना ही होगा कि आप जीतने वाले हैं और बम को डिफ़्यूज़ कर सकते हैं. क्योंकि, डर के आगे ही जीत है."
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमारे अफ़सरों ने हमें सिखाया है कि 'डोंट बी ए डेड हीरो' (मर कर हीरो नहीं बनना है). लिहाजा, पुलिस विभाग के मानकों (स्टैंडर्ड आपरेशंस प्रोसिजर्स) पर काम करते हुए हम लोग बमों को डिफ़्यूज़ करते हैं."
"इसमें सावधानी ज़रूरी है. क्योंकि आपकी एक ग़लती से बम डिफ़्यूज़ होने के बजाय फट जाएगा. इसलिए हम हमेशा इस सतर्कता से काम करते हैं, मानो यह हमारा पहला केस है."
जब पहली बार बम फोड़ा
असित मोदी ने यह भी बताया, "मैं बिहार के गया ज़िले में पोस्टेड था. वहां सदर थाने में एक बम छह महीने से रखा हुआ था. मैं तब तक बमों को डिफ़्यूज़ करने की ट्रेनिंग ले चुका था. इससे पहले मुझे मेरे एक सीनियर ने बताया था कि उनका हाथ थाने में रखे बम से उड़ा था."
"मुझे लगा कि मेरे थाने में रखे बम में भी विस्फोट हो सकता है. तब मैंने थाना परिसर में ही उस बम को निष्क्रिय किया. वह मेरा पहला केस था."
"उसके बाद करीब सवा सौ मामले मेरे पास आए और मैं बमों को लगातार डिफ़्यूज़ करता रहा. इस दौरान पलामू में नक्सलियों से बरामद ग्रेनेड भी डिफ़्यूज़ करने में सफलता मिली.
बड़े बमों से सामना
असित मोदी बताते हैं कि साल 2009 में रांची के अनगड़ा इलाके में केन बम होने की सूचना मिली थी.
वो कहते हैं, "जब हम लोग वहां गए, तो नक्सलियों ने बीच सड़क पर 40 किलो का बम लगा रखा था. उसे वहीं पर डिफ़्यूज़ करना पड़ा. इससे पहले हम लोग गुमला ज़िले में 25-25 किलो वाले बम डिफ़्यूज़ कर चुके थे."
हालांकि असित यह भी कहते हैं कि बमों के बड़े-छोटे होने से उन्हें डिफ़्यूज़ करने की प्रक्रिया नहीं बदलती है.
केमिस्ट्री यानी रसायन विज्ञान में ग्रेजुएट असित मोदी की पहली ट्रेनिंग पटना के एडवांस ट्रेनिंग स्कूल में हुई थी.
इसके बाद पुलिस विभाग के कई ट्रेनिंग केंद्रों के साथ ही उन्होंने बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) और नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) के साथ भी प्रशिक्षण प्राप्त किया.
इन दिनों वे रांची में अपनी रोज़मर्रा की ड्यूटी के साथ ही पुलिस वालों को ट्रेनिंग भी दे रहे हैं.
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