You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
प्रियंका गांधी जैसी नेताओं को सुंदरता पर इतना तंज़ क्यों झेलना पड़ता है ?: ब्लॉग
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हमारे चारों ओर हर व़क्त सुंदर चेहरों की तारीफ़, सुंदर ना होने की हीन भावना और सुंदरता निखारने के तरीकों की नुमाइश. मतलब कितनी भी पढ़ी-लिखी हो और अपने काम में तेज़ पर थोड़ा सुंदर भी हो जाती तो बेहतर होता.
सुंदरता की इस श्रेष्ठता से मैं इत्तफ़ाक नहीं रखती पर दुनिया रखती है और इसीलिए हैरान हो जाती हूं जब देखती हूं कि कैसे वही सुंदरता बोझ बन जाती है.
चेहरे से सुंदर हैं तो दिमाग से बंदर ज़रूर होंगी. मौका भी इसीलिए दिया गया है क्योंकि सुंदर है. और काम कुछ ख़ास नहीं कर पाएंगी क्योंकि क़ाबिलियत के नाम पर सुदंरता ही तो है.
प्रियंका और मायावती पर नेताओं के बोल
ये दोहरे मानदंड एक बार फिर देखने को मिले जब प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाया गया.
तब भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की टिप्पणियां कुछ इस प्रकार थीं.
"लोक सभा चुनाव में कांग्रेस चॉकलेट जैसे चेहरे सामने ला रही है."
"इससे उत्तर प्रदेश में बस ये फ़ायदा होगा कि कांग्रेस की चुनाव सभाओं में कुर्सियां खाली नहीं दिखेंगी".
"वोट चेहरों की सुंदरता के बल पर नहीं जीते जा सकते."
पर ऐसा भी नहीं कि महिला नेता 'सुंदर' की परिभाषा में फ़िट ना होती हों तो इज़्ज़त मिल जाएगी.
बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा था, "क्या मायावती इतनी सुंदर हैं कि कोई उनका बलात्कार करना चाहेगा?"
राज्य सभा सांसद शरद यादव ने राजस्थान में कहा था कि पूर्व-मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया मोटी हो गई हैं, उन्हें आराम करने देना चाहिए.
यानी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, बात बस इतनी सी है कि पार्टी कोई भी हो, ऐसे पुरुषों की कमी नहीं जो ये मानते हैं कि राजनीति में औरतें पुरुषों से कमतर हैं और उसके लिए वो कोई भी तर्क रख सकते हैं.
राजनीति में अड़ी महिलाएं
किसी जगह आपको इतना बेइज़्ज़त किया जाए, आपके शरीर पर बेहिचक भद्दी बात हो और आपके काम को इसी बल पर नीचा दिखाया जाए तो आप वहां का रुख़ करेंगे क्या?
शायद नहीं. पर इन औरतों को देखो, ये उस राह पर चल ही नहीं रहीं, डटी हुई हैं. चमड़ी गोरी हो या सांवली, मोटी ज़रूर कर ली है.
तादाद में अभी काफ़ी कम हैं. पहली लोकसभा में 4 फ़ीसदी से बढ़कर 16वीं लोकसभा में क़रीब 12 फ़ीसदी महिला सासंद हैं.
पड़ोस में झांकें तो नेपाल की संसद में 38 फ़ीसदी, बांग्लादेश और पाक़िस्तान में 20 फ़ीसदी महिलाएं हैं.
और इससे पहले आप कहें कि ख़्वाब देखना छोड़ दो, ये बता दूं कि अफ़्रीकी देश रवांडा ने मुमकिन की हद इतनी ऊंची कर दी है कि चाहत को और पंख मिल गए हैं.
रवांडा की संसद में 63 फ़ीसदी महिलाएं हैं.
भारत में औरतों को टिकट देने में हिचकिचाहट
भारत में औरतों को वोट डालने का अधिकार कई दशक पहले, आज़ादी के साथ मिल गया था. पर इसके साथ राजनीति के ताक़तवर पदों में उनकी भागीदारी तय नहीं हुई.
राजनीतिक पार्टियां पुरुष-बहुल रहीं और औरतों को टिकट देने में हिचकती रहीं, चाहे वो विधायक का पद हो या सासंद का.
2014 के लोकसभा चुनाव में क़रीब 7,500 उम्मीदवार मैदान में थे, उनमें से सिर्फ़ आठ फ़ीसदी यानी क़रीब 500 औरतें थी.
शोध संस्था 'एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्मस' के विश्लेषण के मुताबिक इन औरतों में से एक-तिहाई किसी पार्टी से नहीं लड़ीं, वो स्वतंत्र उम्मीदवार थीं.
पार्टियों में आम आदमी पार्टी ने सबसे ज़्यादा 59, कांग्रेस ने 60 और बीजेपी ने 38 सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया.
सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का जिन्होंने एक-तिहाई सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया.
इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि पार्टी किसी उम्मीदवार को टिकट देने से पहले उसकी जीतने की काबिलियत आंकती है.
जानने वाली बात ये है कि आम समझ से बिल्कुल उलट, इसमें औरतें मर्दों से बेहतर है.
सरकार द्वारा जारी की गई जानकारी के मुताबिक 2014 के लोक सभा चुनाव में औरतों की जीतने की दर (नौ फ़ीसदी) मर्दों (छह फ़ीसदी) से कहीं बेहतर है.
इसके बावजूद राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व होने की वजह से महिला उम्मीदवार के लिए चुनौती दोहरी है.
इसीलिए बदलाव के लिए पार्टियों की नीयत बदलना बहुत ज़रूरी है.
वो नहीं बदली तो लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं में औरतों के लिए सीटें आरक्षित करने वाला विधेयक कभी पारित नहीं होगा. और पारित हो जाए तो लागू नहीं होगा.
रुकावट के लिए खेद है
सवाल ये भी है कि क्या आरक्षण ही सही रास्ता है?
महिलाओं के लिए पंचायत स्तर पर पहले एक-तिहाई और फिर 50 फ़ीसदी आरक्षण लाया गया और इससे उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ा है.
पर नीयत ना बदलने की वजह से अब भी ज़्यादातर महिला सरपंच नाम के लिए अपने पद पर हैं. काम उनके पति, ससुर, पिता या कोई और प्रभावशाली मर्द ही कर रहे हैं.
वजह वही कि उनकी काबिलियत को कम आंका जाता है और क्षमता हो भी तो उसे निखारने का, सीखने का, आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जाता है.
पर कुछ महिलाएं हैं जो इन सब रुकावटों के लिए खेद व्यक्त करने की बजाय अपनी जगह बना रही हैं.
वो सुंदर भी हैं, सांवली भी, मोटी भी हैं. वो महिला होने के अलावा निचली समझी जाने वाली जाति से भी हैं, आदिवासी हैं, ग़रीब हैं या मध्यमवर्गीय परिवार से हैं.
पर उन्होंने चुना है लीडर होना, निडर होना. वो ये जान गई हैं कि तंज़ भरे भद्दे कमेंट उनको नहीं, ऐसी बातें कहने वालों को नीचा दिखाते हैं.
और वो जानती हैं कि नीयत के बदलने का इंतज़ार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बल्कि अपनी आवाज़ को चुटकलों के शोर से बुलंद कर होगा.
राजनीति में औरतों के अनुभव जानने और चुनौतियों से निपटने की रणनीति समझने के लिए बीबीसी हिंदी ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया है.
'लीडर भी, निडर भी' की चर्चा में सरपंच से लेकर सांसदों से बातचीत होगी जिसे आप पढ़ सकते हैं बीबीसीहिंदी.कॉम और हमारे फ़ेसबुक, ट्विटर पन्नों पर #NidarLeader के साथ.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)