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क्या सऊदी अरब से चीन को क़ाबू में करेगा पाकिस्तान
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
चीन और पाकिस्तान की महत्वाकांक्षी परियोजना चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी की जब शुरुआत हुई थी तो इसे पूरी तरह से द्विपक्षीय रखने की बात कही गई थी.
इसमें कई बार दूसरे देशों को आमंत्रित भी किया गया तो इस बात को लेकर दृढ़ता रही कि परियोजना पर नियंत्रण चीन और पाकिस्तान का ही रहेगा.
सीपीईसी के अनुबंधों के अनुसार चीन और पाकिस्तान के अलावा दूसरे देश इससे जुड़ी परियोजनाओं में शामिल हो सकते हैं लेकिन नीति-निर्माण और इसे लागू करने के फ़ैसलों में किसी तीसरे देश का दख़ल नहीं होगा.
अतीत में पाकिस्तान ईरान को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दे चुका है. ऐसे में सऊदी अरब को इसमें शामिल होने के लिए बुलाना कोई नई बात नहीं है.
कहा जा रहा है कि सऊदी पाकिस्तान में बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर पोर्ट में एक अहम साझेदार बन लंबी अवधि की रणनीति पर काम करने का विचार कर रहा है.
कई विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी ऐसा कर अपनी विदेश नीति में प्रयोग करने के मूड में है.
ज़ाहिर है सीपीईसी में सऊदी और यूएई की एंट्री होती है तो परियोजना के ढांचा में परिवर्तन होगा. सभी देशों के अपने भूराजनैतिक उद्देश्य और हित हैं.
इस परियोजना से चीन की ऊर्जा सुरक्षा जुड़ी हुई है. चीन को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के एक चौथाई ऊर्जा की ज़रूरत है और इसके लिए पेट्रोलियम संपन्न देश काफ़ी अहम हैं.
इस योजना में मध्य-पूर्व से प्रस्तावित तेल पाइपलाइन से चीन का बड़ा हित जुड़ा हुआ है लेकिन इसकी जटिलता का अंदाज़ा सबको है. ईरान और खाड़ी के देशों के विवाद की उपेक्षा इस मामले में नहीं की जा सकती है.
चीन के सऊदी अरब और यूएई से भी बहुत अच्छे संबंध हैं. अगर इसमें सऊदी और यूएई की एंट्री होती है तो चीन के प्रभाव कम होने की बात कही जा रही है. सीपीईसी में ज़्यादा देश शामिल होंगे तो चीन के एकाधिकार पर असर पड़ना लाज़िमी है.
इसमें चीन के लिए तीसरी दिक़्क़त ये है कि अमरीका से सऊदी और यूएई के बीच बहुत अच्छे रिश्ते हैं जबकि चीन को अमरीका अपना सबसे कट्टर प्रतिद्वंद्वी मानता है.
वॉशिंगटन स्थित जियोस्ट्रैटिजिक कंस्लटेंसी गल्फ़ स्टेट एनलिटिक्स के थियोडोर कारसिक ने द डिप्लोमैट से कहा है, ''सऊदी का पाकिस्तान में निवेश दोनों देशों के अच्छे होते संबंधों का परिचायक है. सऊदी आतंक विरोधी इस्लामिक सैन्य बल भी बनाने की आकांक्षा रखता है.''
सीपीईसी में नई प्रगति को लेकर इसके एक सकारात्मक पहलू की भी चर्चा हो रही है. ग्वादर अब कई देशों के लिए कारोबार का केंद्र बनने जा रहा है और यह उस अफ़वाह के उलट है कि ग्वादर में चीन सैन्य ठिकाना बनाने जा रहा है.
पाकिस्तान में सीपीईसी को लेकर कई तरह के विवाद बढ़ रहे थे और इसमें चीन की नकारात्मक छवि बन रही थी. ऐसे में सऊदी और यूएई के आने से पाकिस्तान के लिए अच्छा साबित हो सकता है.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बारे में साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है, ''इमरान ख़ान चाहते हैं कि चीन सीपीईसी में सऊदी अरब को भी उतना ही विश्वसनीय साथी बनाए जितना पाकिस्तान है. ख़ान सऊदी और यूएई को इस परियोजना में शामिल कर चीन के प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं.''
पाकिस्तान के साथ समस्या ये है कि वो सऊदी के साथ ईरान को नाराज़ कर नहीं जाना चाहता है और दोनों को एक साथ साधना भी आसान नहीं है.
पाकिस्तान लंबे समय से कोशिश कर रहा है कि वो ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलन बनाकर चले, लेकिन संतुलन की नीति हमेशा मुश्किल होती है.
पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि अगर राजनीतिक और सामाजिक रूप से सबसे ज़्यादा किसी भी देश का प्रभाव है तो वो है सऊदी अरब.
सऊदी में पाकिस्तान के क़रीब 27 लाख लोग काम करते हैं. ये पाकिस्तानी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री और छोटी-मोटी नौकरियों में हैं. ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान सऊदी के क़रीब रहा है और इसे अमरीका, ब्रिटेन ने बढ़ावा दिया है.
पाकिस्तान को भी इस बात का अहसास है कि उसे सऊदी से सबसे ज़्यादा आर्थिक मदद मिलती है. यहां तक कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार प्रोजेक्ट में भी सऊदी ने निवेश किया है.
पाकिस्तान मीडिया में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान की संभावित यात्रा को लेकर काफ़ी अटकलबाजी है.
अख़बारों में अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि क्राउन प्रिंस कितनी बड़ी रक़म के निवेश की घोषणा करेंगे. कहा जा रहा है कि प्रिंस सलमान इस महीने ही पाकिस्तान पहुंचने वाले हैं.
डॉन समेत कई अहम अख़बारों का कहना है कि सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ 10 अरब डॉलर के एमओयू पर हस्ताक्षर कर सकता है.
पाकिस्तान के वित्त मंत्री असद उमर का कहना है कि पाकिस्तान के इतिहास में विदेशी निवेश के रूप में यह अब तक की सबसे बड़ी रक़म होगी. हालांकि सऊदी अरब की तरफ़ से इस पर कोई बयान सामने नहीं आया है.
पाकिस्तान को क़रीब 30 अरब डॉलर की विदेशी वित्तीय मदद की ज़रूरत है. पाकिस्तान आर्थिक मोर्चे पर इतिहास की सबसे गंभीर समस्या से जूझ रहा है. इमरान ख़ान ने पाकिस्तान की सत्ता संभालने के बाद पहले विदेशी दौरे के लिए सऊदी अरब को ही चुना था.
इमरान ने इस दौरे पर कहा था कि पाकिस्तान सऊदी पर किसी बाहरी देश को आक्रमण नहीं करने देगा. इमरान के इस बयान से उसका पड़ोसी देश ईरान ख़ुश नहीं हुआ होगा क्योंकि ईरान और सऊदी अरब में शत्रुता चरम पर है. सऊदी के बाद इमरान ख़ान संयुक्त अरब अमीरात पहुंचे थे.
सऊदी अरब में पाकिस्तान के लाखों लोग काम करते हैं और इनका पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है. ख़लीज टाइम्स के अनुसार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दो ऐसे देश हैं जहां पाकिस्तानी सबसे ज़्यादा काम करते हैं. 2015-16 के वित्तीय वर्ष में दोनों देशों में काम करने वाले पाकिस्तानियों ने रिकॉर्ड 19 अरब डॉलर भेजे थे.
ज़ाहिर है पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए यह रक़म लाइफ लाइन की तरह होती थी.
सऊदी अरब और पाकिस्तान के रिश्ते हमेशा से अच्छे रहे हैं. दोनों देशों के बीच रक्षा और आर्थिक संबंध 1960 के दशक से ही हैं. इसी दौर में दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते हुए थे. पाकिस्तान सऊदी को सैन्य मदद लंबे समय से देता रहा है. बदले में सऊदी पाकिस्तान को कश्मीर मसले पर साथ देता रहा है.
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए भी सऊदी हमेशा से साथ रहा है.
कूटनीतिक रिश्तों के बारे में अक्सर एक बात कही जाती है कि कोई किसी का स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता है, स्थायी सिर्फ़ अपना हित होता है. पाकिस्तान और सऊदी के संबंध भी अब इसी धारणा के तहत करवट ले रहे हैं. भारत ने 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप का समर्थन किया था और सऊदी अरब भी भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुता में हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है.
2015 में पाकिस्तानी संसद ने सऊदी के नेतृत्व में यमन के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई में अपनी सेना भेजने के ख़िलाफ़ एक प्रस्ताव पास किया था. पाकिस्तान नहीं चाहता है कि वो ईरान के ख़िलाफ़ सऊदी का मोहरा बने लेकिन अब पाकिस्तान के पास सऊदी से बड़ा कोई विकल्प नहीं है.
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