क्या राहुल गांधी जन आकांक्षा रैली से बिहार साधने में सफल होंगे

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- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार की राजधानी पटना की सड़कें पोस्टरों से पटी हैं.
एक पोस्टर जो बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय कुमार सिंह की ओर से बिहार कांग्रेस के मुख्यालय सदाकत आश्रम के मेन गेट पर लगाया गया है, उसमें राहुल गांधी को राम के रूप में दिखाते हुए लिखा गया है,
"वे राम नाम जपते रहे! तुम बनकर राम जियो रे!!
इसी तरह के एक और पोस्टर में "त्रिदेव" लिखकर राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव को भगवान के रूप में दिखाया गया है.
सोशल मीडिया पर एक और पोस्टर वायरल हुआ है जिसमें राहुल गांधी को शिव और प्रियंका गांधी को दुर्गा के रूप में पेश किया गया है. और नीचे लिखा है,
"राहुल प्रियंका का सपना, खुशहाल देश हो अपना".
ये सभी पोस्टर आगामी तीन फरवरी को गांधी मैदान में होने वाली कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की जन आकांक्षा रैली को लेकर लगाए गए हैं.
इन पोस्टरों के जरिए राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और बिहार में यूपीए महागठबंधन के शीर्ष नेताओं को हिन्दू देवी-देवताओं के रूप में पेश कर रैली में शामिल होने की अपील की जा रही है.
कांग्रेस नेताओं द्वारा लगाए गए इन पोस्टरों को देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि आगामी चुनावों में बिहार कांग्रेस इस बार सवर्ण हिन्दू वोटरों को अपनी ओर खींचना चाहती है.

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जाति और धर्म का सहारा क्यों
लेकिन सवाल ये है कि कांग्रेस इस तरह से जाति और धर्म का सहारा क्यों ले रही है?
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर इसके बारे में कहते हैं, "कांग्रेस की नीतियां उसके पतन का कारण बनीं. मंडल और मंदिर के मुद्दे पर कांग्रेस की नीतियां गलत रहीं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे नेताओं के पास मुद्दे थे. जवाहरलाल की छवि फ्रीडम फाइटर की थी, इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, राजीव गांधी की नीतियों की तारीफ़ आज भी लोग करते हैं. मगर आज की कांग्रेस के पास मुद्दों का नितांत अभाव हो गया है."
आंकड़े बताते हैं कि बिहार में कांग्रेस का जनाधार और मत प्रतिशत घटने का सिलसिला 1991 के बाद से शुरु हुआ था. 1991 में हुए दसवें लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को क़रीब 24 फीसदी मत मिले थे. लेकिन, उसके बाद वोट शेयर गिरता गया.
1998 में कांग्रेस को केवल 7.3 फीसदी वोट ही मिल सका जबकि 2004 में मतों का प्रतिशत और गिरकर 5.4 फीसदी पर आ गया. हालांकि, 2009 में जब कांग्रेस ने बिहार में अकेले चुनाव लड़ा तो वोट शेयर का ग्राफ़ चढ़कर 10 फीसदी पर आ गया.

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लालू यादव के साथ नुकसान
सुरेंद्र किशोर के मुताबिक 1991 के बाद से बिहार में कांग्रेस के घटते राजनीतिक कद का एक कारण लालू प्रसाद यादव का साथ भी रहा.
किशोर कहते हैं, "जब से कांग्रेस ने लालू से हाथ मिलाया है तभी से उसका पतन भी शुरु हो गया. लालू की छवि जमनानस में कैसी है, ये किसी से छुपा नहीं है. रही सही कसर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति और नेतृत्व के अभाव ने पूरा कर दी. नीतियों में आज भी कोई बदलाव नहीं आया है."
हालांकि, जिस तरह हाल ही में हुए तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान) के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की है, उससे पार्टी का मनोबल बढ़ा है.
इसका अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि 30 साल के बाद पटना के गांधी मैदान में कांग्रेस रैली कर रही है. बिहार में कांग्रेस द्वारा इतने बड़े स्तर पर रैली इसके पहले 1989 में हुई थी. हालांकि, 2015 की राजद की स्वाभिमान रैली में भी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपना संबोधन यहां दे चुकी हैं.

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कांग्रेस का दावा
लेकिन इस रैली से कांग्रेस को क्या कुछ मिलेगा, इस बारे में बिहार कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान समिति के प्रभारी अखिलेश प्रसाद सिंह बताते हैं, "जो लोग अभी ये कह रहे हैं कि कांग्रेस अपना जानाधार खो चुकी है, ये रैली उन्हें हमारा अहसास दिलाएगी."
"मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि आज तक जितनी भी पार्टियों की रैली गांधी मैदान में हुई है, उनसे अधिक भीड़ हमारी रैली में होगी. करीब सवा दो लाख कुर्सियां वहां सिर्फ़ बैठने के लिए लगवाई हैं."
हालांकि, सिंह भी इस बात से सहमत दिखते हैं कि हाल के दिनों में बिहार में जो कांग्रेस की जो स्थिति हुई वो गलत नीतियों का परिणाम थी.
बकौल अखिलेश, "बिहार सेंट्रिक नीतियां नहीं बनीं. सबसे बुरा हाल फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी (freight equalization policy) ने किया. इसकी नीतियां ऐसी थीं कि बिहार जैसे प्रदेश में नए उद्योग नहीं आए. बिहार पिछड़ गया और जब राज्य पिछड़ गया तब यहां की सरकार भी जो काफ़ी लंबे समय से कांग्रेस की ही थी, वो भी पिछड़ गई."
बिहार कांग्रेस का कुनबा इन दिनों में बढ़ा है. टिकट की आस लिए नए-नए नेता शामिल हो रहे हैं. इस वक्त सबसे अधिक चर्चा लवली आनंद और अनंत सिंह की है, क्योंकि ये दोनों तब कांग्रेस से जुड़ने के लिए आगे आए जब दूसरी पार्टियों ने इनके नाम पर अपने हाथ पीछे कर लिए.
यदि बात महागठबंधन की हो तो उसमें भी पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी "हम", उपेंन्द्र कुशवाहा की रालोसपा और मुकेश सहनी की वीआईपी जैसी पार्टियां शामिल हुई हैं.
यहां सवाल अब सीट शेयरिंग का खड़ा होता है. क्योंकि अभी तक राजद-कांग्रेस महागठबंधन के बीच सीटों को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है.

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पुराने कांग्रेसियों में डर
महागठबंधन में नई पार्टियों के शामिल होने और कांग्रेस में नए नेताओं के आने से पुराने कांग्रेसियों में डर बन गया है.
नाम ना छापने की शर्त पर कुछ पुराने नेता कहते हैं, "संगठन के अंदर फिर एक असंतोष पैदा होगा. पिछली बार जब सीटों की बात आई थी तो शीर्ष नेतृत्व की ओर से यह कहा गया था कि जो कम से कम तीन साल तक संगठन के लिए काम करेगा, उसी को उम्मीदवार बनाने पर विचार किया जाएगा. ऐसे में वो लोग जो टिकट की आस में पिछले आठ-दस साल से पार्टी के लिए पसीना बहा रहे हैं, उनके लिए इन नए पैराशूट कैंडिडेटों के आने से नाइंसाफी होगी."
बिहार प्रदेश कांग्रेस में इसके पहले भी गुटबाजी की खबरें आती रही हैं. गुटबाजी में कई बार पार्टी टूट भी चुकी है और अखिलेश सिंह इन सारी बातों को समझते भी हैं. लेकिन फिर भी कहते हैं, "जो नेता हमारे साथ आ रहे हैं वो एक समय में हमारे विपक्षियों के लिए तुरुप के इक्के थे. फिर चाहे वह अनंत सिंह हों या लवली आनंद. अगर वैसे नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं तो इसमें गलत क्या है. इन नेताओं की छवि को लेकर जो लोग सवाल उठा रहे हैं, आप उनसे क्यों नहीं पूछते कि जब उनकी पार्टी के खेवनहार बने थे तब वो अच्छे कैसे थे."
सीटों को लेकर संगठन के अंदर पनप रहे असंतोष पर अखिलेश कहते हैं, "मुझसे अभी तक किसी ने ऐसी शिकायत नहीं की है. और असंतोष किस बात का! हमारी तो यही कोशिश है कि हम लोकसभा में अधिक से अधिक सांसद चुनकर भेजें. कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता टिकट के लिए नहीं, संगठन और नेतृत्व के लिए काम करता है."
मतलब साफ़ है कि कांग्रेस इस बार के लोकसभा चुनावों में अधिक से अधिक सीटें जीतना चाहती हैं. लेकिन, वो तो तभी हो पाएगा जब उसे सीट शेयरिंग में अधिक से अधिक सीटें मिलेंगी.

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ज़्यादा से ज़्यादा सीटों की कोशिश
सीट शेयरिंग के सवाल पर अखिलेश कहते हैं, "पिछली बार हमें 12 सीटें मिली थीं. लेकिन इस बार हमें उससे अधिक सीटें चाहिए. वजह साफ़ है कि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद से हमें एक कुशल नेतृत्व तो मिला ही है साथ ही हमने ज़मीनी स्तर पर भी संगठन का विस्तार किया है. आपको यकीन नहीं होगा, इस रैली के लिए अकेले मैंने 250 करीब छोटी बड़ी सभाएं की हैं. हालांकि, मैं सीटों को लेकर अभी कुछ नहीं कहूंगा. रैली के बाद सब कुछ क्लियर हो जाएगा"
वैसे तो तीन फरवरी की राहुल गांधी की रैली को कांग्रेस सिर्फ़ अपनी पार्टी की रैली कह रही है, लेकिन उसने महागठबंधन के सभी नेताओं को भी न्योता भेजा है.
एक तरफ बिहार में लोकसभा चुनाव की सीटों को लेकर खींचतान जारी है और कांग्रेस की ओर से लागातार ये बात कही जा रही है कि वो अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ वह अपनी रैली में महागठबंधन के नेताओं को आमंत्रित कर रही है. आखिर वजह क्या है?
सुरेंद्र किशोर कहते हैं, "जिस तरह से कांग्रेस ने इस रैली की तैयारियां की हैं और इसे प्रचारित किया जा रहा है, उससे यही लगता है कि पार्टी अपने सहयोगियों को अहसास कराना चाहती है. उनकी हैसियत दिखाना चाहती है और फिर उस आधार पर वह अपने लिए सीटों की मांग करेगी"

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क्या सहयोगियों के लिए कोई संदेश
जन आकांक्षा रैली के जरिए कांग्रेस अपने सहयोगियों को संदेश भी देना चाहती है. अखिलेश प्रसाद सिंह कहते हैं, "हम जन आकांक्षा रैली के जरिए अपने सहयोगियों को यह अहसास दिलाना चाहते हैं कि वे हमें कमतर ना आंके."
क्या कांग्रेस की बिहार में सहयोगी राजद उसे सच में कमतर आंक रही है?
जवाब में राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवल किशोर यादव बीबीसी से कहते हैं, "यहां सवाल कम और अधिक आंकने का है ही नहीं. हमारे लिए मुद्दा है भाजपा को शासन से उखाड़ फेंकना. कांग्रेस हमारी सबसे विश्वस्त सहयोगी पार्टी रही है और हमेशा रहेगी. शीर्ष नेताओं के बीच सीट शेयरिंग पर बात चल रही है. बिना झंझट के सब क्लियर हो जाएगा."
बहरहाल, कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां पूरे दम खम के साथ जन आकांक्षा रैली को सफल बनाने में लगी हुई हैं.
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