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ट्रिपल तलाक़ क़ानून: सुधार की दिशा में ये पहला क़दम है- नज़रिया
- Author, यूसुफ़ अंसारी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
अपने वादे के मुताबिक़ मोदी सरकार ने मुस्लिम समाज में सैकड़ों साल से चली आ रही ट्रिपल तलाक़ जैसी ग़लत प्रथा को रोकने के लिए एक सख्त क़ानून का विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित करा दिया है.
हालांकि लोकसभा में सरकार ने इसे आसानी से पास करा लिया था. लेकिन राज्यसभा में इसे पास कराने में सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ी.
सरकारी से एक बेहद क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कदम बता रही है वहीं इसका विरोध करने वाले इसे मुसलमानों को परेशान करने वाला कानून बता रहे हैं.
असदुद्दीन ओवैसी से लेकर कांग्रेस के ग़ुलाम नबी आज़ाद और अन्य मुस्लिम सांसद इस मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ खड़े हैं.
ट्रिपल तलाक का दंश झेल चुकी महिलाएं जल्द ही वजूद में आने वाले इस क़ानून को लेकर बेहद खुश हैं.
उनकी खुशी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्यसभा में विधेयक पारित होने के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के घर उन्हें बधाई दी.
मुसलमानों का पर्सनल लॉ
मुस्लिम समाज में महिलाओं का एक बड़ा तबक़ा निजी कानूनों में सुधार चाहता है. लेकिन मज़हबी रहनुमा और मुस्लिम नेता इसके हक़ में नहीं है.
निजी कानूनों को लेकर समाज में बेचैनी का या तो इन्हें अंदाज़ा नहीं है या जानबूझकर अपनी आंखें बंद किए हुए हैं.
मुस्लिम महिला (विवाह संरक्षण) अधिनियम-2019 यानी ट्रिपल तलाक रोकने के लिए बनाया गया ये क़ानून मुसलमानों के निजी क़ानूनों यानी पर्सनल लॉ में सुधार की दिशा में एक क़दम है.
इन क़ानूनों में समाज हित में व्यापक सुधार लाने में बहुत आगे तक जाना होगा. इसमें काफी वक्त लग सकता है.
संसद के दोनों सदनों में पास होने वाला ये विधायक ठीक उस इंजेक्शन की तरह है जो किसी अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड में बेहद नाजुक हालत में लाए गए किसी मरीज को फौरी राहत देने के लिए लगाया जाता है.
ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून
इलाज की प्रक्रिया तो बाद में शुरू होती है इसी तरह मोदी सरकार ने इस विधेयक के जरिए फौरी तौर पर ट्रिपल तलाक को रोकने की कोशिश की है.
लेकिन मुस्लिम समाज के में प्रचलित निजी कानूनों में व्यापक सुधारों के लिए कुछ और कड़े फैसले करने होंगे.
ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने में सरकार को लगभग 50 साल लग गए.
साल 1972 में पहली बार केरल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पी ख़ालिद ट्रिपल तलाक़ को इस्लाम और भारतीय संविधान दोनों की मूल भावना के खिलाफ क़रार दिया था.
उसके बाद 1981 में गुवाहाटी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बहरुल इस्लाम ने बेहद महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी थी कि बग़ैर सुलह सफाई की कोशिशों के दिए गए तलाक़ से निकाह नहीं टूट सकता.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
जस्टिस बहरुल इस्लाम ने क़ुरआन की सूरह निसा की आयत नंबर 35 को आधार बनाया था.
इसमें साफ कहा गया है कि अगर शौहर बीवी के बीच संबंध ठीक नहीं हो और मामला शादी टूटने के कगार पर पहुंच जाएं तो दोनों की तरफ से एक वकील तय करके सुलह सफाई की कोशिश करनी चाहिए. अगर दोनों के बीच साथ रहने की सहमति नहीं बनती है तभी तलाक़ होगा.
बाद 1986 में शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया.
उसके बाद 2002 में शमीम आरा के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक़ को भारतीय संविधान और इस्लाम की मूल भावना के ख़िलाफ़ बताते हुए अमान्य क़रार दिया था.
इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए 2018 में शायरा बानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक़ को अमान्य करार दिया और केंद्र सरकार के से इसकी रोकथाम के लिए क़ानून बनाने को कहा.
शरीयत इंप्लीकेशन एक्ट
शाहबानो ने 1980 के दशक में ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ जो जंग शुरू की थी उसे अब जाकर शायरा बानो ने जीता है.
ग़ौरतलब है कि 1937 में संसद में शरीयत इंप्लीकेशन एक्ट पारित हुआ था.
इसी के तहत मुसलमानों को शादी, तलाक़, उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे मामलों में अपनी मज़हबी मान्यता के अनुसार चलने की छूट मिली हुई है.
शरीयत इंप्लीकेशन एक्ट मुसलमानों को इन मामलों में अपने हिसाब से क़ानून बनाने की छूट तो देता है लेकिन क़ानून क्या होंगे यह तय नहीं है.
इन्हें संसद में पारित कराके बाक़ायदा संवैधानिक दर्जा नहीं दिया गया.
इस बारे में न तो पहले की सरकारों की तरफ से कोई कोशिश हुई और न ही मुस्लिम संगठनों ने कोई पहल की.
इस्लाम की मूल भावना
साल 1939 में मुस्लिम विवाह (विच्छेदन) अधिनियम बनाकर मुस्लिम महिलाओं को 9 आधार पर अपने पति से ख़ुला यानी तलाक़ लेने का अधिकार दिया गया.
ये क़ानून भी अधूरा है. ये किसी महिला को अपने पति से तलाक़ लेने के लिए ज़रूरी शर्तें लगाता है लेकिन ये नहीं बताता कि मुस्लिम पुरुष किस आधार पर अपनी पत्नी को तलाक़ दे सकता है.
इस कानून के मुताबिक़ महिला को ख़ुला लेने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा. लेकिन पुरुष बगैर अदालत जाए ही तलाक़ दे सकता है.
मुस्लिम समाज में आम धारणा यह है कि शौहर को कभी भी अपनी पत्नी को तलाक देने का अधिकार है. ये धारणा क़ुरआन और इस्लाम की मूल भावना के ख़िलाफ़ है.
क़ुरआन में महिला और पुरुषों को बराबर अधिकार दिए गए हैं.
शाहबानो मामला
जिस तरह एक महिला बग़ैर ठोस वजह के अपने पति से ख़ुला नहीं ले सकती ठीक उसी तरह बग़ैर ठोस वजह के कोई शहर भी अपनी पत्नी को तलाक़ नहीं दे सकता.
लेकिन ठोस क़ानून न होने की वजह से मुस्लिम समाज में तलाक़ का ग़लत इस्तेमाल किया जाता है.
मुसलमानों के निजी मामलों से जुड़ा दूसरा क़ानून 1986 में जब वजूद में आया. ये क़ानून शाहबानो मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए बनाया गया था.
इसके तहत राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत तलाक़ के बाद अपने पूर्व पति से भरण पोषण की मांग करने पर रोक लगाई थी.
मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ लेने के लिए अलग क़ानून है. ट्रिपल तलाक़ से निजात दिलाने के लिए अलग क़ानून बनने जा रहा है.
हिंदू समाज के लिए क़ानून
ताज्जुब की बात ये है कि मुसलमानों के लिए विवाह से संबंधित कोई कानून नहीं है. उसे तोड़ने और उसके संरक्षण के लिए क़ानून ज़रूर बन गए हैं.
होना ये चाहिए कि सरकार को हिंदू विवाह अधिनियम की तरह ही मुस्लिम विवाह अधिनियम बनाना चाहिए.
इसी एक कानून में विवाह या तलाक की स्थिति में महिला और उसके बच्चों के भरण पोषण और ग़लत तरीके से एक तीन तलाक देकर पत्नी को छोड़ने की सज़ा के साथ साथ बहु विवाह की रोकथाम के लिए भी प्रावधान हों.
ग़ौरतलब है कि हिंदू समाज में निजी मामलों से जुड़े मोटे तौर पर तीन क़ानून हैं.
हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1955, हिंदू अल्पसंख्यक एवं अभिभावक अधिनियम 1956, हिंदू एडॉप्शन और भरण पोषण अधिनियम 1956.
मुस्लिम समाज
ये सभी कानून हिंदू समाज में हजारों साल से चली आ रही वैदिक परंपराओं को आधुनिक बनाने के मक़सद से लागू किए गए थे.
ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 13 के मुताबिक संविधान लागू होने से पहले देश में चले आ रहे सभी कायदे कानूनों को संविधान के साथ तालमेल बैठाना जरूरी है.
संविधान से सीधे तौर पर टकराने वाले पुराने कानूनों को ये अनुच्छेद अमान्य करार देता है.
इस हिसाब से देखें तो मुस्लिम समाज में के लिए भी मुस्लिम विवाह अधिनियम, मुस्लिम उत्तराधिकार अधिनियम, मुस्लिम एडॉप्शन एवं भरण पोषण अधिनियम जैसे क़ानून बनाए जाने चाहिए.
मौजूदा व्यवस्था के हिसाब से मुस्लिम पर्सनल लॉ मैं इन मामलों से संबंधित जो भी क़ानून हैं वो फिक़ह पर आधारित हैं.
इन्हें बनाने में क़ुरआन और हदीस के मुक़ाबले इज़मा यानी उलेमा के बीच आम सहमति और क़यास को तरजीह दी गई है.
बेटे-बेटी का हक़
मुस्लिम समाज के अलग-अलग मसलकों और फिरक़ों में प्रचलित प्रथाओं के हिसाब से इन्हें क़ानूनी मान्यता दी गई है.
यही वजह है कि इन क़ानूनों के कई प्रावधान क़ुरआन की मूल भावना के ख़िलाफ़ हैं. इनकी वजह से महिलाओं और यतीम बच्चों के साथ बड़ी नाइंसाफी हो रही है.
इस्लाम ने बाप की विरासत में बेटे और बेटियों दोनों को का हिस्सा तय किया है. बीवी को तलाक देने से बच्चों का ये हक़ ख़त्म नहीं होता.
ठोस कानून न होने की वजह से तलाक़ पाई और महिलाओं के बच्चों को उनका हक़ नहीं मिल पाता.
मुस्लिम समाज में बड़े पैमाने पर ऐसी महिलाएं भी मौजूद हैं जिनके शौहर के देहांत के बाद उन्हें और उनके यतीम बच्चों को ससुराल से बेदखल कर दिया गया है.
क़ुरआन में है हर मसले का हल
यतीम बच्चों को दादा की विरासत में कोई हिस्सा नहीं दिया गया.
ठोस क़ानून न होने की वजह से ऐसी महिलाएं अपने मरहूम शौहर की जायदाद में अपने और अपने बच्चों के हक़ के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं.
इन्हें कहीं इंसाफ नहीं मिल पाता. मुस्लिम समाज कई मसलकों और फिरक़ों में बंटा हुआ है.
लेकिन सभी क़ुरआन को आसमानी किताब और इसी पर ईमान को लेकर एकमत हैं. क़ुरआन में जिंदगी से जुड़े हर मसले का समाधान मौजूद है.
शादी और तलाक़ से जुड़े सभी मसलों के साथ ही संपत्ति के बंटवारे पर कुरान में बारीकी से आदेश और हिदायत दी गई है.
इन्हीं को को क़ानूनी जामा पहनाकर आसानी से संवैधानिक दर्जा दिया जा सकता है. इसके लिए मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम बुद्धिजीवियों को आगे आना होगा.
सरकार को भी मुस्लिम समाज के बीच क़ानूनी समझ रखने वाले लोगों की कमेटी बनाकर व्यापक विचार-विमर्श के साथ मुसलमानों से जुड़े सभी निजी कानूनों को संवैधानिक दर्जा देने की पहल करनी चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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