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आने वाला 'चुनावी' बजट आख़िर कैसा होगा
- Author, देविना गुप्ता
- पदनाम, बीबीसी संवादाता
तारीख़ 26 नवंबर, साल 1947 आरके षणमुगम शेट्टी ने स्वतंत्र भारत का पहला बजट पेश किया था.
ये वो वक़्त था, जब देश की अर्थव्यवस्था अस्थिर थी, देश में ग़रीबी चरम पर थी. देश में उत्पादन बढ़ाना चुनौती थी और रक्षा के मोर्चे पर भी चुनौतियां थीं.
उस वक़्त शेट्टी ने अपने भाषण में कहा था, ''देश के विभाजन के दीर्धकालीन प्रभावों का अभी भी आकलन किया जाना बाक़ी है और हम घटनाओं का क़रीब से अध्ययन कर रहे हैं. जब देश एक बुरे दौर से बाहर आ चुका है, तो भविष्य के इतिहासकार ये तय करेंगे कि दुनिया की एक पांचवी आबादी वाले देश के लिए हमने क्या और कैसे क़दम उठाए.''
शेट्टी के ये शब्द आज 70 साल बाद भी प्रासंगिक हैं.
देश लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही इस वक़्त देश कई तरह की आर्थिक चुनौती और विवादों से घिरा हुआ है. शुक्रवार एक फरवरी को मौजूदा मोदी सरकार अपना अंतरिम बजट पेश करेगी.
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस बजट में किसानों के लिए बड़े राहत पैकेज का ऐलान हो सकता है, मध्यम वर्ग-नौकरी पेशा लोगों को लुभाने के लिए टैक्स में कटौती की जा सकती है. अगर सरकार ऐसा करती है तो ये उसकी ओर से आने वाले चुनाव के लिए एक अहम दांव होगा.
आंतरिम बजट और इसकी रिवायतें
आम तौर पर अंतरिम बजट (जो पिछले वर्ष के वित्तीय विवरण की जानकारी देती है) चुनावों तक के देश के बजट का विवरण देता है. इसके अलावा आने वाले साल राजस्व और भविष्य की सरकार के लिए ख़र्च का एक अनुमान देता है.
हाल ही में भारत महिला प्रेस कोर सत्र में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा था कि अंतरिम बजट में सरकार के पास नई योजनाओं के ऐलान करने का अधिकार नहीं होता.
''ऐसी स्थिति में सरकार बस तीन से चार महीने तक के ख़र्च की जानकारी ही देती है. अगर सरकार चुनावी साल में संपूर्ण बजट पेश करती हैं तो ये अप्रत्यक्ष रूप से संविधान का उल्लंघन है.''
कैसे रहे अब तक के अंतरिम बजट
बतौर वित्त मंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने साल 1996-97 में अंतरिम बजट पेश करते हुए बेहद सधा हुआ भाषण दिया था. उन्होंने चुनाव से पहले बेहद समझदारी के साथ अपनी सरकार के उदारीकरण वाले आर्थिक सुधारों को सदन के माध्यम से जनता के सामने रखा.
ठीक इसी तरह साल 2009 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए बताया था कि कैसे उनकी सरकार ने समाज के हर तबके के लिए नीतिया बनाई.
साल 2014 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी 80 तरह के ग्राफ़ के ज़रिए ये बताया था कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में देश की आर्थिक वृद्धि कैसी रही.
हालांकि, उन्होंने ऑटोमोबाइल सहित विभिन्न सामानों के लिए उत्पाद शुल्क घटा दिया था. उन्होंने कहा था, ''ये अंतरिम बजट हो या पूरे साल का बजट हो, कुछ चीज़ें नहीं बदलेंगी.''
इसके अलावा उन्होंने भविष्य की योजनाओं में रिटायर्ड कर्मियों के लिए 'वन रैंक वन पेंशन' की योजना और एजुकेशन लोन में सब्सिडी की योजना सदन के सामने रखी.
शुक्रवार को 'अंतरिम वित्त मंत्री' पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि वे एक फरवरी को 'अंतरिम बजट' पेश करेंगे. लेकिन सवाल ये है कि क्या वो लोकलुभावन नीतियों को लागू करने का ऐलान करेंगे या नहीं?
मोदी सरकार के अंतरिम बजट से उम्मीदें
2018 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने कई बुनियादी सामानों के जीएसटी दर में बदलाव कर उन्हें सस्ता किया और छोटे कारोबारियों को टैक्स से छूट दी. लेकिन अर्थशास्त्रियों को इससे कहीं अधिक की उम्मीद है.
2014 लोकसभा चुनाव के चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 67 फ़ीसदी के साथ 2014 में ग्रामीण मतदाताओं का वोट प्रतिशत अधिक था. इन आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में बीजेपी का वोट प्रतिशत 18 फ़ीसदी से बढ़कर 30 प्रतिशत जा पहुंचा.
यह इस बात की ओर इशारा करती है कि अब तक शहरी उच्चवर्ग मतदाताओं की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी किस तरह ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहुंच बना रही है.
लेकिन अब किसान परेशान हैं और अर्थशास्त्रियों को मानना है कि उन्हें लुभाने के लिए मोदी सरकार बड़ी घोषणाएं कर सकती है.
इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च (फिच ग्रुप) के प्रमुख अर्थशास्त्री डॉक्टर डीके पंत ने कहा, "किसानों का कर्ज़ माफ़ करना या न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने से छोटे किसानों को कोई लाभ नहीं मिला है. केंद्र सरकार तेलंगाना के मॉडल के अनुसार 4,000 रुपए प्रति एकड़ देने का विकल्प चुन सकती है. लेकिन इससे केंद्र और राज्यों की जीडीपी पर 0.7 फ़ीसदी का असर पड़ेगा साथ ही अर्थव्यवस्था पर दबाव भी."
फिर ऐसे कारोबारी हैं, जिनपर नोटबंदी और जीएसटी की मार पड़ी है और राहत की उम्मीद कर रहे हैं.
भारत के उद्योग समूह भारतीय उद्योग परिसंघ ने सुझाव दिया है कि सभी कॉरपोरेट करदाताओं पर लग रहे वर्तमान 30% टैक्स को घटाकर 25% किया जाना चाहिए. लेकिन इस बजट में किसी भी तरह की टैक्स कटौती का मतलब होगा कि 'अंतरिम बजट' के स्वरूप पर फिर बहस शुरू हो जाएगी.
बीजेपी के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा युवा हैं और उन्होंने 2014 में रोज़गार की आस में वोट डाले थे. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार पिछले साल लगभग एक करोड़ 10 लाख नौकरियां गई हैं. ऐसे में सरकार युवाओं को तसल्ली देने के लिए कौन सी जादू की छड़ी का इस्तेमाल करेगी?
कहां हैं पैसे?
टैक्स संग्रह पहले ही कम है, ऐसे में सामाजिक योजनाओं पर चुनाव से पहले ख़र्च से राजकोषीय घाटा के बढ़ने की स्थिति पैदा हो जाएगी.
मूडीज जैसी ग्लोबल रेटिंग एजेंसी ने इसे लेकर चेतावनी दी है.
मूडीज ने कहा है कि, "मार्च 2019 में समाप्त हो रहे वित्त वर्ष में हमें केंद्र के राजकोषीय घाटे का जीडीपी के 3.4 फ़ीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है, जो जीडीपी के 3.3 फ़ीसदी के लक्ष्य से कुछ अधिक है."
अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक मदद के लिए आगे आ सकता है.
सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक पर उसके कैश रिजर्व के पैसों को लेकर दबाव बनाया था, पिछले महीने रिजर्व बैंक के गर्वनर उर्जित पटेल के इस्तीफ़े को भी इसी से जोड़ कर देखा गया था.
लेकिन इससे बैंक की स्वायत्तता को लेकर विदेशी निवेशकों के पास ग़लत संदेश जाएगा, साथ ही अर्थव्यवस्था पर भी इसका दीर्घकालिक असर पड़ सकता है.
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