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अयोध्या राम मंदिर मामला: केंद्र ने SC से कहा- जिस ज़मीन पर विवाद नहीं वो सरकार को लौटा दें
राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है.
सरकार ने अदालत में अर्ज़ी देते हुए कहा है कि वह ज़मीन के विवादित हिस्से को छोड़ कर बाकी ज़मीन रामजन्म भूमि न्यास (मंदिर ट्रस्ट) को दे दें, ताकि राम मंदिर की य़ोजना पर काम किया जा सके.
विवादित ज़मीन के आस-पास की 67 एकड़ ज़मीन सरकार की है. जिसमें से 2.7 एकड़ ज़मीन पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2010 में फ़ैसला सुनाया था और केवल 0.313 एकड़ ज़मीन पर विवाद है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी ज़मीन पर यथास्थिति बनाए रखने को कहा है. लेकिन अब सरकार ने कोर्ट में अर्जी दी है कि जिस ज़मीन पर विवाद नहीं है उस पर बनी यथास्थिति हटा दी जाए.
आज सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर-बाबरी विवाद पर सुनवाई होनी थी. लेकिन नयी संवैधानिक बेंच के जस्टिस एस. ए. बोबडे के मौजूद नहीं होंने के कारण आज की सुनवाई टाल दी गई.
राम मंदिर को लेकर शिवसेना और विश्व हिंदू परिषद मोदी सरकार को लागातार घेर रही हैं ऐसे में सरकार का ये कदम चुनावी साल में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
क्या है साल 2010 का फ़ैसला
साल 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई हैं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने 2010 के फ़ैसले में अयोध्या की 2.77 एकड़ ज़मीन सुन्नी वक़्फ बोर्ड, र्निमोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर बांटने का फ़ैसला दिया था.
अयोध्या में क्या हुआ था?
अयोध्या विवाद भारत में एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है. कई हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी थी.
भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद सहित कई हिंदू संगठनों का दावा है कि हिंदुओं के आराध्यदेव राम का जन्म ठीक वहीं हुआ जहां बाबरी मस्जिद थी. उनका दावा है कि बाबरी मस्जिद दरअसल, एक मंदिर को तोड़कर बनवाई गई थी.
बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देश में दंगे भड़के और सर्वोच्च न्यायालय में मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की ज़ोर शोर से मांग उठाई गई.
विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ का ये मामला देश की अदालतों में 1949 से ही चला आ रहा है.
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