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'आँधी' चली, पर गुलज़ार से कमलेश्वर का मन टूटाः विवेचना
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कमलेश्वर से मेरी पहली मुलाक़ात सन 2001 में हुई थी. वो बीबीसी हिंदी के 'लाइव' कार्यक्रम में भाग लेने बीबीसी के पुराने दफ़्तर 'आइफ़ैक्स' बिल्डिंग में आए हुए थे.
26 जनवरी का दिन था. अचानक बहुत ज़ोर से धरती हिली थी और दफ़्तर के सारे लोग सीढ़ियों से भागते हुए सड़क पर आ गए थे. एक अकेले कमलेश्वर थे जो हाथ में 'डनहिल' की सिगरेट लिए, कश लगाते वहीं 'पैंट्री' में खड़े रह गए थे.
मेरी तरफ़ देख कर बिना किसी घबराहट के बोले थे, 'बैठिए यहाँ कुछ नहीं होगा.'
उनसे दूसरी मुलाक़ात शायद दो साल बाद फिर बीबीसी स्टूडियो में हुई थी और मैंने उनसे पूछा था, 'आप कई शहरों में रहे हैं, मैनपुरी, इलाहाबाद, मुंबई और दिल्ली...इनमें से किस शहर को अपने सबसे नज़दीक पाते हैं?'
कमलेश्वर ने मुस्कराते हुए जवाब दिया था, 'इनमें से कोई ऐसा शहर नहीं हैं, जिसे मैं भूल सकूं. मेरी बहुत ख़ूबसूरत यादें मैनपुरी की है. एक हमारे यहाँ ईशान नदी हुआ करती थी, जिसे लोग 'ईसन' कहते थे. उसके किनारे घूमने जाना, शैतानियाँ करना, जंगलों में चले जाना, वहाँ से बेर तोड़ना, आम तोड़ना, खेतों से सब्ज़ियों की चोरी करना... ये सब चलता था और बहुत आनंद आता था.'
मैनपुरी में ही पहला इश्क
'सबसे बड़ी चीज़ थी कि मैनपुरी में ही मेरा पहला इश्क हुआ था. इश्क के बारे में कुछ मालूम तो था नहीं. कोई अच्छा लगने लगा तो इश्क हो गया. एक बंधी बंधाई रवायत सी थी कि मेरे और उसके बीच में बहुत ही घटिया समाज बीच में आ रहा था. उससे कहने की हिम्मत ही नहीं होती थी. न उसकी हिम्मत होती थी कि भर-आँख मुझे देख ले. ये समझ लीजिए कि करीब ढाई तीन फ़र्लांग से ये इश्क चला करता था.'
'जब उसकी शादी होने लगी तब मामला थोड़ा गंभीर हो गया. उस वक्त महसूस किया कि कुछ खो रहा है. उस ज़माने में मेरे बाल बहुत बड़े होते थे जो माँ को पसंद नहीं थे. उसकी शादी में जाना था लेकिन मन भीतर से रो रहा था. माँ ने घर पर नाई बुलवा कर बाल इतने छोटे करवा दिए जैसे आर्मी वालों के होते हैं. फिर मैं उस शादी में गया ही नहीं.'
इलाहाबाद में हुआ था कमलेश्वर का साहित्यिक 'बपतिस्मा'
इलाहाबाद के बारे में कमलेश्वर ने लिखा था, 'एक सोचता हुआ शहर था वो... कोई क्या खाता है, क्या पहनता है, कैसे रहता है, इस सबसे ऊपर इलाहाबाद के आदमी की पहचान ही यही थी कि वो क्या सोचता है...?'
कमलेश्वर ने बताया था, 'वो दौर इलाहाबाद का बहुत सुनहरा दौर था. बड़े से बड़े लेखक इलाहाबाद में मौजूद थे. मेरे अपने गुरु बच्चनजी विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, फ़िराक साहब थे. सुमित्रानंदन पंत थे, महादेवीजी थीं, निरालाजी थे...किस किस को याद करें. हम लोग सब थे नई पीढ़ी के, धर्मवीर भारती थे, मार्कंडेय थे, दुष्यंत थे, अजित थे यानि कितने ही लोग.. यानि 'इट वाज़ अ गैलेक्सी ऑफ़ पीपुल.' इसकी वजह ये है कि इलाहाबाद में इस तरह का बौद्धिक माहौल हुआ करता था.. चाहे वो हाईकोर्ट के जज या वकील हों या विश्वविद्यालय में जो हमारे प्राध्यापक होते थे, उनके लिए नवरत्न तो बहुत छोटा जुमला हो जाएगा. वो एक तरह से सैकड़ों रत्नों की एक मंजूषा थी.'
कॉफ़ी हाउस होता था बुद्धिजीवियों का अड्डा
कमलेश्वर ने आगे बताया था, 'जब हम लोग अकेले दो तीन दोस्त बैठते थे तो 'रामाज़' हुआ करता था. कॉफ़ी हाउस था और वहाँ की ख़ासियत ये थी कि जो भी ताज़ा किताब आई हो, या कोई ताज़ा विचार आया हो और अगर आप उससे परिचित नहीं थे तो आप उस महफ़िल में मंज़ूर नहीं किए जाते थे उस शाम. वहाँ से लौट कर हमारा बहुत बड़ा अड्डा था 'युनिवर्सल बुक डिपो'. वहाँ से हम किराए पर किताबें लेते थे, उन्हें पढ़ते थे और फिर तैयार हो कर जाते थे.'
मोहन राकेश थे कमलेश्वर के जिगरी दोस्त
कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव ने स्थापित किया था 'नई कहानी' का त्रिकोण. उस ज़माने में मोहन राकेश उनके सबसे करीबी दोस्त हुआ करते थे.
कमलेश्वर लिखते हैं कि जब राकेश अपनी पहली शादी के लिए इलाहाबाद पहुंचे थे, तो उनके साथ कोई बारात नहीं थी. लड़की वालों को आश्चर्य भी हुआ था कि दूल्हा अकेले आया है, पर यही तो थे मोहन राकेश.
कमलेश्वर ने एक किस्सा सुनाया था, 'नौ सालों तक मैं और राकेश एक ही घर में ऊपर नीचे रहे. वो ज़माना वो था कि जो लोग विभाजन के बाद यहाँ आए थे, उनको लोग अपना घर किराए पर नहीं देते थे. तब मैंने राकेश की माँ को अपनी माँ बनाया और मेरे नाम पर मकान लिया गया और राकेश मेरे साथ रहने लगे. क्योंकि हम लोग दिन भर मस्ती में बातें करने, गप्पें लड़ाने और नई कहानी की बातें सोचने में लगे रहे थे, जब भी कोई आता था तो हमें काफ़ी हाउस या टी हाउस में पाता था. एक दिन किसी ने पूछ लिया राकेश भाई आपकी दिनचर्या क्या होती है? राकेश ने कहा हम यही कोई साढ़े ग्यारह- बारह बजे घर पहुंचते हैं, एक दो घंटे पढ़ कर सो जाते हैं. उन्होंने कहा फिर? फिर हम उठते हैं ग्यारह बजे दिन में. फिर? फिर सुबह की चाय पीते पीते बारह-एक बज जाते हैं. उन्होंने कहा फिर? फिर ज़रा सा नाश्ता किया, शेव किया, नहाए-धोए. इसी में चार साढ़े चार बज जाते हैं. फिर? फिर हम कॉफ़ी हाउस आ जाते हैं. वो कहने लगे तब आप लिखते कब हैं ? राकेश ने कहा लिखना? लिखते हम कल हैं.'
दुष्यंत कुमार से दोस्ती
कमलेश्वर के एक और करीबी दोस्त थे दुष्यंत कुमार. बाद में उनके पुत्र आलोक से उनकी बेटी मानो की शादी हुई.
आलोक त्यागी याद करते हैं, 'जब पापा का निधन हुआ, उससे तीन दिन पहले ये लोग मिले थे उज्जैन के एक सम्मेलन में. पापा ने उनसे बहुत कहा तू चल मेरे यहाँ, मैंने कुछ ग़ज़लें लिखी हैं. कमलेश्वर ने कहा कि यहीं सुनते हैं. मेरे प्रोग्राम 'टाइड अप' हैं बंबई में. तब पापा ने कहा था यार अब नहीं चलेगा तो क्या मेरी मौत पर आएगा ? ये 1975 की बात है. तीन दिन बाद ही पापा का निधन हो गया. उनके निधन के बाद हमारे यहाँ सबसे पहले पहुंचने वाले शख़्स थे कमलेश्वर. मैं उनके बारे में सालों से पापा से सुनता आ रहा था. होता ये था कि मैं कोई ढंग का काम करूँ और कोई अच्छी बात करूँ तो वो मेरी माँ से कहते थे राजो, ये मुझे कमलेश्वर की याद दिलाता है. मेरे लिए कमलेश्वर की छवि हमेशा 'लार्जर दैन लाइफ़' रही है. मैं उनको एकदम रूबरू देख रहा था. घर में इतना बड़ा संकट... घर में दुख के बादल और यदि हमें आश्वस्त करने के लिए और हमारे दुख में साथ खड़े होने के लिए कोई व्यक्ति सामने है, तो वो कमलेश्वरजी हैं.'
बंबई फ़िल्म जगत ने हाथों-हाथ लिया
हिंदी साहित्य में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जो कहानी, उपन्यास, मीडिया और टेलीविज़न के साथ साथ उतनी ही शिद्दत से फ़िल्मों से भी जुड़े हों.
मैंने कमलेश्वर से पूछा कि हर घाट का पानी पीने के बाद जब आपने फ़िल्म लेखन के क्षेत्र में प्रवेश किया तो क्या अपनेआप को 'मिस-फ़िट' पाया?
कमलेश्वर का जवाब था, 'मैंने अपने-आप को वहाँ मिसफ़िट नहीं पाया. उसकी वजह एक तो ये थी कि हमारी फ़िल्मों की मिली जुली संस्कृति है, वो मुझे बहुत रास आती थी. हम लोगों के बीच एक 'कॉम्पीटीशन' ज़रूर होता था, लेकिन वो तब होता था, जब फ़िल्में सफल होती थीं. मेरे पास वही ज़ुबान थी, जिसकी ज़रूरत वहाँ होती है. ये राही मासूम रज़ा के पास भी बहुत शिद्दत से मौजूद थी. राही को कुछ लोगों ने अलीगढ़ से तैयार किया था कि वो बंबई आएं और हमने और भारतीजी ने उनका स्वागत किया था . ये इसी हिंदुस्तान में मुमकिन है कि भारतीय दूरदर्शन का सफलतम सीरियल 'महाभारत' डॉक्टर राही मासूम रज़ा लिखते हैं. इससे बड़ी मिसाल मैं नहीं समझता कि दुनिया में किसी के पास है. फ़िल्मों में एक चीज़ ज़रूर थी कि ऐशो-आराम बहुत था. फ़िल्म इंडस्ट्री एक बार आपको मंज़ूर कर ले, उसके बाद तो सब कुछ आपके लिए है. कहीं कोई दिक्कत नहीं होती थी.'
आँधी की नकल हुई थी पाकिस्तान में
इस दौरान उनकी फ़िल्म 'आँधी' काफ़ी चर्चित हुई जो उनके उपन्यास 'काली आँधी' पर आधारित थी और जिसे गुलज़ार ने निर्देशित किया था. कमलेश्वर ने उससे जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा सुनाया था,'आँधी के रिलीज़ होने के 15-17 साल बाद एक प्रोड्यूसर मेरे पास एक कैसेट ले कर आए. कहने लगे ये एक पाकिस्तानी फ़िल्म है. इसको देख लें और इसका स्क्रीन-प्ले थोड़ा बदल कर हमारे लिए फ़िल्म लिख दें. जब मैंने वो फ़िल्म देखी तो पाया कि मेरी फ़िल्म 'आँधी' का जो नकल किया हुआ संस्करण पाकिस्तान में बना था, वही मेरे पास लौट कर आ गया था.'
गुलज़ार से बदमज़गी
'आँधी' फ़िल्म बहुत चली लेकिन फ़िल्म का नाम देते समय लिखने का सारा श्रेय गुलज़ार ने ले लिया. कमलेश्वर की पत्नी गायत्री कमलेश्वर अपनी किताब, 'कमलेश्वर मेरे हमसफ़र' में लिखती हैं, 'गुलज़ार ने फ़िल्म के 'क्रेडिट्स' में 'रिटेन एंड डायरेक्टेड बाई गुलज़ार' लिख कर सिर्फ़ 'स्टोरी' में कमलेश्वरजी की नाम दिया, जबकि सारी फ़िल्म कमलेश्वर ने जे ओम प्रकाश से सब कुछ तय हो जाने के बाद भोपाल के 'जहाँनुमा' और दिल्ली के 'अकबर होटल' में लिखी थी. कमलेश्वरजी को इसका बहुत दुख हुआ. एक बार घर पर ही इन्होंने गुलज़ार से पूछा तो उन्होंने गोलमोल सा उत्तर दिया, 'भाई साहब फ़िल्म तो 'सेल्योलाइड' पर ही लिखी जाती है, उसे 'डायरेक्टर' ही लिखता है.' गुलज़ार ये बात कह कर ख़ुद ख़ुश नहीं हुए थे. ये बात उनके चेहरे से भी झलक रही थी.'
सिर्फ़ चार या पाँच घंटे की नींद
मुंबई प्रवास के दिनों में कमलेश्वर बहुत व्यस्त रहा करते थे. वो टेलीविज़न पर उस समय का बहुत लोकप्रिय कार्यक्रम 'परिक्रमा' कर रहे थे.
'सारिका' के संपादन की ज़िम्मेदारी उनके ऊपर थी और फ़िल्म लेखन तो जारी था ही.
कमलेश्वर की बेटी मानो याद करती हैं, 'उस ज़माने में वो इतने व्यस्त होते थे कि सिर्फ़ चार या पांच घंटे की नींद ही ले पाते थे. लेकिन हमारे यहाँ एक नियम रहता था कि रात का खाना हम तीनों साथ खाते थे... मम्मी, पापा और मैं. कई बार रात हो जाती थी. दस बज जाते थे. मम्मी कहती थी, तुम सो जाओ. पापा पता नहीं कब तक आएंगे. फिर लिखेंगे. अक्सर देर रात पापा ही खुद मुझे उठा कर कहते थे बेटा खाना खाने चलें. मैं भी उठ जाती थी. मुझे लगता था कि यही तो टाइम है पापा से मिलने का.'
बच्चनजी का जन्मदिन
उसी दौरान उनके दोस्त धर्मवीर भारती धर्मयुग के संपादक हुआ करते थे और उनके गुरु हरिवंशराय बच्चन भी मुंबई में रहा करते थे.
मानो बताती हैं, 'एक बार बच्चनजी का जन्मदिन था. हम तीनों गए थे उस पार्टी में. अमिताभ बच्चन ने ढोलक पर एक गीत सुनाया था. उनके पास जावेद अख़्तर भी बैठे हुए थे. उस समय अभिषेक बच्चन दस साल के थे. वो सबके ऊपर गुलाब जल छिड़क रहे थे. सबके आग्रह पर बच्चनजी कविता-पाठ करने वाले थे. उसी समय कमलेश्वरजी उठ कर 'वॉशरूम' की तरफ़ चले गए थे. लोगों ने कहा बच्चनजी आप अपना कविता पाठ शुरू करिए. वो बोले, पहले कमलेश्वर को आ जाने दो. पापा जब 'वॉशरूम' से वापस आए, तभी उन्होंने अपना कविता-पाठ अपनी बुलंद आवाज़ में शुरू किया. तब मुझे लगा कि वो पापा को कितना प्यार करते हैं और कितना मानते हैं.'
ग़ज़ब की आवाज़
ग़ज़ब की आवाज़ थी कमलेश्वर के पास. उसमें उनका विनोद और वाक्पटुता चार चांद लगा देती थी.
आलोक त्यागी बताते हैं, 'वो बेहद 'शार्प', 'विटी' और पढ़े-लिखे इंसान तो थे, साथ ही वो बेइंतहां सहृदय आदमी भी थे, जो दूसरों की भावनाओं का बहुत ख्याल करते थे. उनके दुश्मनों को माफ़ करने के इतने किस्से मैंने सुने हैं और खुद अपनी आँखों से देखा भी है, जब हम दिल्ली में उनके साथ रहा करते थे. मैंने देखा कि जिन लोगों ने उन्हें अपना निशाना बनाया, उन्हीं लोगों की ज़रूरत पड़ने पर उन्होंने उनकी मदद की.'
'वो दूरदर्शन के पहले 'स्क्रिप्ट राइटर' बनते हैं, पहले 'न्यूज़ रीडर' बनते हैं, फिर वो 'सारिका' संपादन के लिए बंबई जाते हैं. फ़िल्म लेखन भी वहाँ चल रहा रहा है. टेलीविज़न का जो पहला बहुचर्चित प्रोग्राम है 'परिक्रमा', जो आम आदमी की ज़िंदगी के इर्द-गिर्द घूमता है, उसे बना रहे है. उन में नई नई चुनौतियों को स्वीकार करने का जज़्बा था. जितनी भी विधाओं में उन्होंने काम किया, वो 'अल्टीमेटली' उनके 'मैग्नम-ओपस' 'कितने पाकिस्तान' में दिखाई देता है.'
खाना बनाने के शौकीन
खाना खाने के शौकीन कमलेश्वर को ख़ुद खाना बनाने का भी शौक था.
मानो बताती हैं, 'वो बहुत ही स्वादिष्ट खाना बनाते थे. 'नॉन- वेजेटेरियन' थे. बहुत अच्छे कबाब बनाया करते थे. मेरी मम्मी का तो रोज़ 'टेस्ट' होता था. अगर खाने में कोई कमी रह जाती थी, तो वो कहा करते थे, तुमने ये नहीं डाला या वो नहीं डाला. वो सब्ज़ियाँ ख़रीदने ख़ुद ही जाते थे. वो सारी सब्ज़ियों को तोड़कर, अलग कर, पैकेट में रख कर मम्मी को देते थे. उनको ये सब करने में बहुत सुकून मिलता था.'
'जब वो बहुत बीमार हुए, तो डाक्टरों ने उनके बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी थी. तब उन्होंने आलोक से ये अनुरोध किया था कि वो उन्हें एक बार सब्ज़ी मंडी ले चलें. आलोक उन्हें वहाँ ले कर गए और आप को यकीन नहीं होगा कि वहाँ जा कर उनमें इतनी ताज़गी आ गई और वो अच्छे होने लग गए.'
अहमद फ़राज़ के मुरीद
100 से अधिक फिल्में लिखने वाले कमलेश्वर को खुद फ़िल्में देखने का शौक नहीं था. हाँ अच्छा संगीत और अच्छी ग़ज़लें सुनना उनका शग़ल हुआ करता था. उन्होंने मुझे बताया था कि उन्हें दुष्यंत कुमार की ये ग़ज़ल बहुत प्रिय है-
तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
तेरी आँखों में एक जंगल है, जहाँ मैं राह भूल जाता हूँ.
दुष्यंत की 'इमर्जेंसी' के दौर में लिखी एक ग़ज़ल भी उन्हें बहुत अच्छी लगती थी -
कहाँ तो तय था चिरांगा हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
उन्होंने मुझे बताया था उन्हें अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल 'रंजिश ही सही' भी बहुत पसंद है. एक बार जब वो दिल्ली आए थे, तो उन्होंने उनके इसरार पर उनके सामने बैठ कर बग़ैर तरन्नुम के वो ग़ज़ल उन्हें सुनाई थी.
आख़िरी मुलाक़ात
अपनी 75 साल की ज़िंदगी में कमलेश्वर ने 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह और 100 से ऊपर फ़िल्मी पटकथाएं लिखीं. 27 जनवरी 2007 को कमलेश्वर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.
मशहूर रंगकर्मी और कमलेश्वर को नज़दीक से जानने वाले शरद दत्त बताते हैं, 'हमारे एक 'कॉमन' दोस्त थे राजेंदरनाथ. वो अमरीका में बस गए थे. कई सालों बाद जब वो भारत आए तो उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वो अपने दौर के लोगों से मिलना चाहेंगे. मैं, शिव शर्मा और दूरदर्शन के कुछ पुराने दोस्त एक जगह पर शाम को मिले. वहाँ कमलेश्वर भी अपनी पत्नी गायत्री के साथ आए हुए थे. कमलेश्वर 'चेन- स्मोकर' थे. उनको उस समय दिल और फेफड़ों की समस्या थी. वो बहुत देर तक हमारे साथ रहे.'
'उन्होंने कहा कि अगले सप्ताह शनिवार को आप सब मेरे घर आइए. उनका वो जुमला मुझे अभी तक याद है, 'मैं दूर ज़रूर रहता हूँ, लेकिन आपके दिल से दूर नहीं हूँ.' इसके बाद मैंने उनको कार पर बैठा कर 'सी-ऑफ़' किया था. उसी रात देर रात मेरे पास किसी का फ़ोन आया कि आपने कमलेश्वरजी के बारे में समाचार सुना...वो नहीं रहे. मेरे लिए वो बहुत बड़ा झटका था. मुझे उस शख़्स की जो चीज़ सबसे अच्छी लगी कि वो बहुत अच्छे 'फ़्रेंड', 'फ़िलॉसोफ़र' और 'गाइड' थे. आप उनके सामने किसी समस्या को ले कर जाएं. वो आपको बराबरी के स्तर पर 'ट्रीट' करते थे. उनमें भरपूर ऊर्जा थी. वो बहुत 'सोशल' थे और हर कार्यक्रम में नज़र आते थे. आप उनको कनॉट प्लेस के एक ढाबे में खाना खाते हुए देख सकते थे, जबकि वो कभी भी किसी पाँच- सितारा होटल में जा सकते थे. उनमें एक कशिश थी. जो उनसे पहली बार मिलता था, उन्हीं का हो कर रह जाता था.'
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