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व्हाट्सऐप ने 20 साल से लापता को परिजनों से मिलवाया
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
"भगवान का धन्यवाद! सोशल मीडिया का धन्यवाद!" - बेंगलुरु के एक बड़े अस्पताल में हितेंद्र सिंह यह कहते हैं. और उनके पास यह कहने की एक बड़ी वजह है.
वो ये बात वहाँ इलाज के लिए लाए गए महावीर सिंह चौहान की कहानी पर कहते हैं जो व्हाट्सऐप की बदौलत राजस्थान में अपने घरवालों से 20 साल बाद मिल सके."
महावीर के चचेरे भाई हितेंद्र सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कई बार हम सोशल मीडिया के बुरे इस्तेमाल के बारे में सुनते हैं लेकिन हमारे परिवार और हमारे गांव ने इसका बेहद सकारात्मक प्रभाव देखा है."
राजस्थान के एक बड़े घराने से आने वाले महावीर सिंह धातु कारोबारी थे जिसमें उन्हें भारी घाटा हुआ और फिर 1998 में वो मुंबई से लापता हो गए.
घर के बड़े लोगों से अपमानित होने के डर से वो राजस्थान के झालौर ज़िले के झाब इलाक़े में अपने घरवालों को बिना कुछ बताए बेंगलुरु चले गए.
वहाँ गुलाबों की खेती के लिए भारत भर में मशहूर डोडाबल्लापुर में उन्होंने ड्राइवर, फ़ोटोग्राफ़र का काम किया और बाद में एक गुलाब फ़ार्म में सुपरवाइज़र के पद पर काम करने लगे.
पिछले सप्ताह शनिवार की सुबह उनके सहकर्मी रवि ने उन्हें ज़मीन पर गिरा पड़ा देखा. उनका दायाँ हाथ और पैर काम नहीं कर रहे थे.
रवि ने तत्काल महावीर सिंह के पुराने दोस्त किशोर सिंह दफ़्तरी से संपर्क किया जो एक फ़ोटोग्राफ़र हैं.
रवि महावीर को पास के एक अस्पताल ले गए जिसने उन्हें नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेन्टल हैल्थ एंड न्यूरो साइंसेज़ (निमहांस) रेफ़र कर दिया.
दफ़्तरी कहते हैं, "वह पिछले कुछ हफ़्तों से कमज़ोर हो गए थे और उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. उन्होंने पीठ दर्द की शिकायत की थी और शायद इस वजह से रात में वह गिर गए."
इस बीच किशोर सिंह दफ़्तरी को महावीर के एक और दोस्त से उनका ड्राइविंग लाइसेंस मिला जिस पर उनके पिता का नाम लिखा था और साथ ही यह जानकारी भी थी कि वो जालौर के रहने वाले हैं.
किशोर ने इसके बाद एक और दोस्त से संपर्क किया जो जालौर से थे.
उन्होंने कहा, "हमने राजस्थान समाज नाम के एक ग्रुप पर शनिवार शाम को मैसेज किया और दस मिनट के भीतर हमारे पास कॉल आने लगे और आख़िर में उनके बेटे प्रद्युम्न ने कॉल किया."
किशोर ने बताया कि इसके बाद रात भर महावीर के रिश्तेदारों के फ़ोन आते रहे.
और रविवार को प्रद्युम्न सिंह ने निमहांस में अपने पिता के पैर छुए. उन्होंने आख़िरी बार जब अपने पिता को देखा था तब वो मात्र चार साल के थे. पिता के लापता होने के समय उनका एक छोटा भाई भी था जो तब केवल एक साल का था.
प्रद्युमन का कहना है कि महावीर के भाव ऐसे थे जिनके बारे में वह कह नहीं सकते. वह अपने पिता को देखकर भावुक और निःशब्द हो गए थे.
प्रद्युम्न कहते हैं, "मैं बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं. हमने उनसे मिलने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ी थी. यह बहुत बड़ी बात है हमारे लिए. उन्होंने मुझे पहचाना है."
वह कहते हैं, "इन सारे वर्षों में मैंने कभी अपनी मां से कुछ नहीं कहा. हमें पता था कि क्या हुआ था."
महावीर सिंह फ़िलहाल बेंगलुरु के अपोलो अस्पताल के आईसीयू में हैं जहाँ उनका इलाज चल रहा है.
अस्पताल के एक डॉक्टर ने अपनी पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "हमें संदेह है कि रीड़ की हड्डी पर दबाव पड़ने से उनके हाथ-पैर में कमज़ोरी आ गई है."
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