मेघालयः तीन हफ़्ते से खदान में फँसे मज़दूर, घरवालों को चमत्कार का इंतज़ारः ग्राउंड रिपोर्ट

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, लुमथरी गांव (मेघालय) से, बीबीसी हिंदी के लिए

"मैं बीते दो हफ्तों से अपने भांजों के इंतज़ार में यहां कोयला खदान के बाहर बैठा हुआ हूं. लेकिन पता नहीं वो ज़िंदा हैं भी या नहीं...."

22 साल के प्रेसमेकी दखार कोयले की खदान में फंसे अपने भांजों को याद कर भावुक हो जाते हैं.

"एनडीआरएफ़ के लोग इतने दिनों से यहां काम कर रहें है लेकिन किसी ने हमें नहीं बताया कि डिमोंमे और मेलामबोक को कब तक बाहर निकाला जाएगा."

मेघालय की अंधेरी, पानी से भरी और बेहद संकरी एक खदान में बीते 13 दिसंबर से 15 मज़दूर फंसे हुए हुए हैं.

उन मज़दूरों में 20 साल के डिमोंमे दखार और 21 वर्षीय मेलामबोक दखार भी हैं.

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इमेज कैप्शन, प्रेसमेकी दखार

ईश्वर कोई चमत्कार कर दे...

दरअसल, ईसाई बहुल मेघालय में क्रिसमस से ठीक पहले लुमथरी गांव के ये दोनों युवक इस खदान में काम करने गए थे.

लेकिन 370 फ़ीट से भी ज़्यादा गहरी इस खदान में अचानक पानी भर आने से अंदर काम कर रहे सभी मज़दूर खदान में ही फंस गए.

हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा और बादलों का घर कहा जाने वाला मेघालय एक ख़ूबसूरत राज्य है, मगर अवैज्ञानिक और ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से जारी कोयला खनन और मज़दूरों की मौत की घटनाएं मेघालय को बदनाम कर रही हैं.

इस हादसे को लेकर परेशान प्रेसमेकी कहते हैं, "इलाके में बेरोज़गार युवकों की एक बड़ी आबादी है. जिनके पास कोयले की खदान में काम करने के अलावा और दूसरा विकल्प नहीं है क्योंकि खेती के काम में न इतनी कमाई है और न ही सबके पास उतनी ज़मीन है."

क्या उनको या फिर परिवार के लोगों को डिमोंमे और मेलामबोक के ज़िंदा बचने की उम्मीद है - ये पूछने पर वे कहते हैं, "इस घटना के 15 दिनों के बाद भी हमें लग रहा था कि मेरे दोनों भांजे जीवित बाहर आ जाएंगे. लेकिन जब भारतीय नौ सेना के गोताखोर पानी के अंदर जाकर कुछ भी तलाश नही सके तो हमारी उम्मीदें टूटने लगी हैं. कोई भला 20 दिन तक ऐसी ख़तरनाक अंधेरी खदान में कैसे ज़िंदा रह सकेगा. अगर ईश्वर कोई चमत्कार कर दे तो ही ये संभव होगा."

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कोयला खदानों पर प्रतिबंध

मेघालय के ईस्ट जयंतिया हिल्स ज़िले के जिस कोयला खदान में ये हादसा हुआ है, वहां तक पहुंचना आसान नहीं है.

जोवाई-बदरपुर नेशनल हाइवे से होते हुए मैं खलिरियाट तक तो पहुंच गया था लेकिन इसके आगे का सफर बेहद मुश्किल था.

दरअसल खलिरियाट से आगे क़रीब 35 किलो मीटर गाड़ी से पहुंचने के बाद लुमथरी गांव के पास खलो रिंगसन नामक इलाक़े में इस कोयला खदान तक पहुंचने के लिए टूटे फूटे पहाड़ी रास्ते और तीन छोटी-छोटी नदियों को पार करना पड़ता है.

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खलिरियाट से इस इलाक़े में प्रवेश करते ही सड़क की दोनों तरफ़ कोयले के ढेर लगे हुए दिख जाते है जहां शनिवार को भी मज़दूर आम दिनों की तरह ही ट्रकों में कोयला लाद रहे थे.

ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि यहां अवैज्ञानिक तरिक़े से चल रही कोयला खदानों पर 2014 से नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का प्रतिबंध है.

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ग़रीब और बेरोज़गार

खदान में फंसे अपने चचेरे भाई का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे 28 साल के फाइहुनलांग सुबा अब अपने किसी भी रिश्तेदार और दोस्त को इन कोयला खदानों में काम करने के लिए नहीं भेजेंगे.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "इस कोयले की खदान में फंसा मेलाम दकार मेरा चचेरा भाई है. वो पहली बार कोयले की खदान में काम करने गया था."

"उसे रैट होल माइनिंग में काम करने का कोई अनुभव नहीं है. मैं जब इस गहरी खाई को देखता हूं तो डर के मारे कलेजा बैठ जाता है. पता नहीं उसका क्या हाल हुआ होगा."

"मैं कभी कोयले की खदान में काम नहीं करूंगा. भले ही भूखा मर जाउंगा."

एक सवाल का जवाब देते हुए फाइहुनलांग ने कहा, "हम काफ़ी ग़रीब और बेरोज़गार हैं. इस इलाक़े में अगर ज़िंदा रहने के लिए कई लोग अपनी जान का जोखिम उठाते हैं."

"मेलाम क्रिसमस से पहले थोड़ी ज्यादा कमाई करना चाहता था. इसलिए वो कोयले की खदान में काम करने चला गया. पता नहीं मैं दोबारा उससे कभी मिल पाऊंगा या नहीं."

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नौसेना की मदद

दरअसल, हादसे के बाद शुरू में एनडीआरएफ़ की टीम पानी से भरी इस कोयला खदान में मज़दूरों को तलाशने के लिए अभियान चलाया.

लेकिन गंभीर आपदाओं से निपटने का अनुभव रखने वाले एनडीआरएफ के गोताखोर 15 दिनों तक एक भी मज़दूर का सुराग नहीं ढूंढ पाए.

एनडीआरएफ़ ने 15 दिनों तक अन्य बचाव एजेंसियों की मदद क्यों नहीं ली यह भी एक बड़ा सवाल है.

इसके बाद बीते शनिवार को विशाखापत्तनम से भारतीय नौसेना के उन गोताखोरों की टीम को बुलाया गया जिन्हें कई जटिल बचाव अभियान का अनुभव है.

लेकिन लगातार दो दिन तक खदान के भीतर अपने अनुभवी गोताखोरों को भेजने के बाद भी नौसेना की टीम वहां फंसे मज़दूरों का पता नहीं लगा पाई.

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बचाव अभियान की दिक्कतें

एनडीआरएफ की टीम शुरू में खदान के भीतर 70 फुट पानी भरे होने का अनुमान लगा रही थी और उसके गोताखोर 30 फ़ीट तक पानी के भीतर जाने का दावा कर रहे थे.

लेकिन 15 दिनों तक खदान का पानी निकालने के लिए हाई पावर पंप की कोई व्यवस्था नहीं की गई.

इस बचाव अभियान में एनडीआरएफ टीम का नेतृत्व कर रहे सहायक कमांडेट संतोष कुमार सिंह कहते हैं, "एनडीआरएफ़ के लिए इस बचाव अभियान में जो मुख्य समस्याएं थीं, वो हमारे लिए पानी की सतह और उसकी गहराई का अनुमान लगाना बहुत बड़ी बाधा थी."

"इसलिए हम ज्यादा सफल नहीं हो सके. इसके अलावा पानी को बाहर निकालने के लिए हाई प्रेशर पंप नहीं थे. हमारे पास केवल 25 हॉर्सपावर के पंप थे."

"अब इस बचाव अभियान में नौसेना के गोताखोर समेत ओडिशा से हाई पावर पंप लेकर पहुंचे फायर ब्रिगेड के जवान तथा कोल इंडिया जैसी कई एजेंसियां शामिल हो गई हैं. जल्द ही हम एक नतीजे पर पहुंचेंगे."

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इमेज कैप्शन, इंजीनियर जसवंत सिंह गिल कहते है, "अगर पानी का लेवल पता था तो हाई पावर पंप शुरू में ही लगाने चाहिए थे."

तालमेल की कमी

आखिर इन एजेंसियों की मदद 15 दिन पहले क्यों नहीं ली गई?

इस सवाल के जवाब में सहायक कमांडेट सिंह कहते हैं, "दरअसल, ये बचाव अभियान ज़िला उपायुक्त के नेतृत्व में चलाया जा रहा है तो जो कुछ भी ज़रूरी होता है, उसकी जानकारी ज़िला उपायुक्त को दे दी जाती है."

एनडीआरएफ़ के अधिकारी और घटना स्थल पर मौजूद बाकी एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी को लेकर सवाल उठते रहे हैं.

अगर खदान में से पानी को बाहर निकालना सबसे पहला काम था तो हाई पावर पंप की व्यवस्था 15 दिन पहले क्यों नहीं की गई?

इस तरह के कई जटिल रेस्क्यू ऑपरेशन में अपना योगदान दे चुके इंजीनियर जसवंत सिंह गिल कहते है, "अगर पानी का लेवल पता था तो हाई पावर पंप शुरू में ही लगाने चाहिए थे."

"यहां शुरू मे बचाव अभियान से जुड़ी सामग्री ही उपलब्ध नहीं कराई गई. इनके पास ऐसा कोई प्रशिक्षित आदमी नहीं था जो ऐसे जटिल अभियान को अंजाम तक ले जा सके."

"इतना अंदर इलाक़ा है. यहां बिजली नहीं है, सड़क नहीं है. ऐसे में बचाव कार्य शुरू करने में काफ़ी देर हुई है."

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जोखिम का काम

थाईलैंड की गुफा में फंसे बच्चों को बाहर निकालने वाले अभियान से ये बचाव अभियान कितना मुश्किल है?

इस सवाल का जवाब देते हुए गिल कहते हैं, "थाईलैंड में एक ही समस्या थी कि बच्चों का पता कैसे लगाया जाए. लेकिन यहां की खदान में संकरी गुफाए हैं."

"वो भी पानी से भरी हुईं. कोई भी गोताखोर कितना भी अनुभवी हो उसके लिए समुद्र में गोता लगाना और इन संकरी खदानों के भीतर गोता लगाकर प्रवेश करना बहुत जोखिम का काम है."

"गोताखोर डाइविंग सूट के साथ पीठ पर ऑक्सीजन सिलिंडर समेत कई उपकरण लेकर पानी के नीचे जाते है."

"इन रैट होल्स में इतने सामान के साथ घुसना और वहां इधर-उधर मज़दूरों को तलाशना आसान काम नहीं है. कई बार ऐसे अभियान में जान गंवानी पड़ जाती है."

"इस जोखिम भरी कोयला खदान में सबसे पहला काम पानी को बाहर निकालना होगा. तभी बाक़ी बचाव कार्य किए जा सकेंगे."

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इमेज कैप्शन, एनडीआरएफ टीम का नेतृत्व कर रहे सहायक कमांडेट संतोष कुमार सिंह

फ़ायर सर्विस के पंप

फिलहाल कोयले की खदान से पानी निकालने का काम चल रहा है.

कोयले की इस खदान में चलाए जा रहे बचाव अभियान के लिए मेघालय सरकार की तरफ़ से नियुक्त किए गए प्रवक्ता आर सुसंगी ने बुधवार तक की जानकारी देते हुए कहा, "फ़ायर सर्विस के पंप पानी निकालने के लिए सुबह साढ़े दस बजे से दोपहर ढाई बजे तक चलाए गए थे जिसमें क़रीब 1 लाख 20 हजार लिटर पानी बाहर फेंका गया है."

"इस बीच कोल इंडिया के 100 हॉर्स पावर वाले सबमर्सिबल पंप भी लगाने की तैयारी चल रही है जो 500 गैलन प्रति मिनट पानी बाहर निकालेगें."

खदान में पानी कम होने का एक हिसाब देते हुए सुसंगी कहते है कि बुधवार को 6 इंच पानी कम हुआ है.

इस संदर्भ में ईस्ट जयंतिया हिल्स ज़िले के ज़िला उपायुक्त एफएम डोफ्त कोई बात नहीं करना चाहते. वो मीडिया से बात करने में फिलहाल समय की बर्बादी मानते हैं.

उनका कहना है कि इस समय बचाव अभियान किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा है, लिहाज़ा बात करने का कोई मतलब नही है.

लेकिन वो इस बात का भी जवाब नहीं देते कि आख़िर नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल के प्रतिबंध के बाद भी उनके ज़िले में ग़ैर क़ानूनी तौर पर कोयले की खदानों में 'खनन' का काम क्यों चल रहा है.

कोल माफिया

कोयला खनन को लेकर यहां कोल माफ़िया का आतंक कुछ इस क़दर है कि कोई भी इस बारे में मीडिया से बात करना नहीं चाहता.

एक स्थानीय पत्रकार ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया, "जयंतिया हिल्स के दोनों ज़िलों में 5 हज़ार से ज्यादा कोयले की खदाने हैं जिनपर स्थानीय प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है. कोल माफ़िया की पहुंच ऊपर तक है."

कोयला खदानों के मालिकों की सरकार के लोगों के साथ कथित तौर पर अच्छे संपर्क होने के कारण छोटे-मोटे हादसे तो पुलिस में रिपोर्ट ही नहीं होते.

आमतौर पर इन रैट होल माइंस में काम करने वाले मजदूरों के असली नाम और पता केवल खदान के मालिकों के पास ही होते है.

कई ग़ैर सरकारी संगठनों की शिकायतों में ये मुद्दे उठाए गए लेकिन सरकार के स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं की गई.

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इमेज कैप्शन, मेघालय प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष सिबुन लिंगदोह

क्या कहती है राज्य सरकार

रैट होल में कोयला निकालने के लिए बाल मज़दूरों को नेपाल और अन्य राज्यों से तस्करी के तहत यहाँ लाया जाता है.

इन्हीं शिकायतों के आधार पर और पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को देखते हुए ग़ैरसरकारी संगठनों ने मेघालय में कोयला खनन पर प्रतिबंध लगाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी जिसके बाद अप्रेल 2014 में कोयला खनन और इसके ट्रांसपोर्टेशन पर रोक लगा दी गई.

हालांकि ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से कोयला निकालने का काम चलता रहा.

मेघालय प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष सिबुन लिंगदोह कहते हैं, "ये घटना जहां हुई है वहां ग़ैर क़ानूनी खनन चल रहा था. इसलिए सरकार तक इस हादसे की जानकारी थोड़ी देर से पहुंची."

"यही वजह है कि बचाव कार्य भी देर से शुरू हुआ लेकिन हमारी सरकार मज़दूरों को बाहर निकालने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. इसके साथ ही ग़ैरक़ानूनी तौर पर खनन का काम चलाने वाले इस कोयला खदान के मालिक को गिरफ्तार कर लिया गया है."

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इमेज कैप्शन, खदान में फंसे मजदूरों के बाहर निकलने का इंतज़ार करता एक रिश्तेदार

कोयला खदान मालिकों के साथ

लिंगदोह खुद स्वीकार करते हैं कि इस इलाक़े में उनके पास भी कोयले की कई खदानें हैं लेकिन कोर्ट की पाबंदी के चलते अभी काम बंद कर रखा है.

वो कहते हैं, "केवल जयंतिया हिल्स ही नहीं मेघालय में जहां-जहां कोयले की खदाने हैं, वहां अब भी ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से खनन का काम चल रहा है."

"कई बार पता चलने पर सरकार कार्रवाई भी करती है लेकिन इसमें कई बड़े सरकारी अधिकारी भी कोयला खदान मालिकों के साथ मिले हुए हैं."

"दरअसल, कोयला खनन पर पाबंदी से इलाक़े के लोगों की आर्थिक हालत काफ़ी ख़राब हो गई है, इसके कारण कुछ लोग ग़ैर क़ानूनी तौर पर कोयला खनन कर रहे हैं."

पिछले साल फरवरी में मेघालय में विधानसभा चुनाव से पहले, बीजेपी ने वादा किया था कि अगर वो सत्ता में आती है तो "क़ानूनी प्रक्रिया" के ज़रिए इस प्रतिबंध को उठाने के लिए एक व्यापक समाधान निकालने का प्रयास करेगी.

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हादसे वाली जगह

बीजेपी के साथ मेघालय में एक ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा कोयले पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे का समाधान खोजने में लगे हुए हैं.

दरअसल, मेघालय सरकार को केवल कोयले से क़रीब 700 करोड़ रूपए का सालाना राजस्व मिलता है.

हालांकि वैज्ञानिक तरीक़े से कोयला निकालने की बात पर कोई चर्चा नहीं करता.

इस बीच कोयले की खदान में फंसे 15 मज़दूरों की सरकार ने एक सूची जारी की है जिसमें अधिकतर मज़दूर निचले असम के मुसलमान हैं.

मुख्यमंत्री संगमा प्रदेश में कोयला खनन पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए नई दिल्ली में कई मंत्रालयों का चक्कर काट रहे हैं लेकिन इस हादसे के 20 दिन बीत जाने के बाद भी वो वहां अबतक नहीं गए है.

ऐसी जानकारी है कि बीते शुक्रवार को मुख्यमंत्री हादसे वाली जगह से महज़ 35 किलो मीटर दूर खलिरियाट में एक परिचित की शादी में शामिल हुए थे लेकिन वो लुमथरी गांव में पीड़ित परिवार से अबतक नहीं मिले है.

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