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तीन तलाक़ पर मोहम्मद सलीम से बोलीं स्मृति इरानी- दम हो तो हनुमान चालीसा सुना दीजिएगा
एक झटके में दिए जाने वाले तीन तलाक़ पर लाया गया संशोधित विधेयक लोकसभा में पास हो गया है.
इस विधेयक के पक्ष में 245 और विपक्ष में 11 वोट पड़े. कांग्रेस और एआईएडीएमके ने वोटिंग के दौरान सदन से वॉकआउट किया. बिल पर वोटिंग से पहले लोकसभा में सांसदों के बीच बहस हुई.
इस बहस के दौरान स्मृति इरानी ने कहा, ''सभी महिलाओं का न्याय सुनिश्चित करेंगे. वो लोग जो इस विधेयक को इस नज़र से चर्चा में भाग ले रहे हैं कि इसको अपराध की नज़र से क्यों देखा जाए. ऐसे लोगों से मेरा निवेदन है कि अगर इस्लामिक इतिहास देखा जाए तो दूसरे ख़लीफ़ा के सामने पहली बार ऐसा केस आया. जब एक व्यक्ति से पूछा गया कि क्या आपने इस तरह से तलाक़ दिया है. जब व्यक्ति ने स्वीकार किया तो उस वक़्त उसे 40 कोड़ों की सज़ा सुनाई गई. इसका मतलब है कि इस्लाम में तलाक को एक औरत के ख़िलाफ़ अपराध माना गया है.''
सीपीआई (एम) सांसद मोहम्मद सलीम ने इस पर स्मृति को रोककर ख़लीफ़ा का नाम पूछते हुए कहते हैं- नाम बताइए मैडम नाम.
स्मृति सलीम को जवाब देती हैं, ''हज़रत साहेब का नाम मेरे मुंह से सुनना चाहते हैं तो मैं भी आपके मुंह से हनुमान चालीसा सुनना चाहूंगी. कभी दम हो तो सुना दीजिएगा.''
तीन तलाक़ बिल पर हुई बहस में बोलने वाले सांसदों में कई और नाम भी रहे.
तीन तलाक़ पर बहस: किसने क्या कहा?
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद: ये बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है. आज का बिल सिर्फ़ इंसान और इंसानियत के लिए है. ये बिल देश की औरतों को सम्मान देने के लिए है. मुस्लिम मर्दों के लिए सज़ा का प्रावधान करने वाला विधेयक राजनीति नहीं है. ये महिलाओं को इंसाफ दिलाने और मज़बूत करने वाला विधेयक है. 20 से ज़्यादा इस्लामिक देश भी तीन तलाक़ के मामलो को नियंत्रित कर चुके हैं. ऐसे में भारत जैसे सेक्युलर देश में ये क्यों नहीं हो सकता. इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए. हमने इस बिल में कहा है कि पीड़ित महिला या उसके रिश्तेदार ही एफआईआर कर सकेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि इस बिल को पास किया जाए.
कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव: अगर महिला के सम्मान और गरिमा का सवाल है तो कांग्रेस की तरफ से कोई ऐतराज़ नहीं है. मगर हमें मुंह मे राम और बगल में छुरी से दिक्कत है. जब इस बिल को लेकर पहले बहस हुई थी, तब भी हमने सवाल उठाए थे. हमारी मांगों को नए विधेयक में शामिल नहीं किया गया. सशक्तिकरण के नाम पर मुस्लिम महिलाओं को मुकदमेबाज़ी जैसी दिक्कतें दी जा रही हैं. इस बिल का मकसद मुस्लिम मर्दों को दंडित करने का ज़्यादा है न कि मुस्लिम महिलाओं को सशक्त करने का.
असदउद्दीन ओवैसी: इस बिल के कई प्रावधान असंवैधानिक हैं. इस बिल को संयुक्त चयन समिति को भेजना चाहिए. हमारे मुल्क़ में तलाक़ के कानून में अगर किसी हिंदू को एक साल की सज़ा का प्रावधान है तो मुसलमानों के लिए ये सज़ा तीन साल क्यों रखी गई है? क्योंकि इसका इस्तेमाल हमारे ख़िलाफ़ होगा. आपका कानून धर्म के ख़िलाफ़ है. आप मुस्लिम औरतों के लिए नहीं काम कर रहे हैं. पूरे मुल्क में मी-टू अभियान हुआ था. कहां गए वो मंत्री जो पिछली बार खड़े थे. कहां गए वो. आप उस आदमी को पार्टी में जगह देते हैं और आप लोग हमको आइना दिखा रहे हैं?
मल्लिकार्जुन खड़गे: ये एक महत्वपूर्ण बिल है. एक धर्म के अंदर दखल देकर सरकार का कानून बनाना सही नहीं है. मेरी गुजारिश है कि संयुक्त चयन समिति को भेजा जाए. कुछ वक्त दिया जाए ताकि आसानी से बिल आ सके. ये महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसका नाता करोड़ों महिलाओं से है.
बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी: जिस प्रधानसेवक की सेवाओं का लाभ हर किसी को मिल रहा है, क्या मुस्लिम महिलाओं को उससे वंचित रखा जाना चाहिए. आज सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण की बात कर रही है. कई योजनाएं सरकार ने शुरू की है. ऐसे ही समाज में एक कुरीति है- तीन तलाक़.
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