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क़र्ज़माफ़ीः क्या ये किसानों की समस्या का हल है?: नज़रिया
- Author, आशुतोष सिन्हा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
तीन राज्यों की विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने के बाद कांग्रेस ने यहां किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने की घोषणा कर दी है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसके बाद ट्वीट किया है, "हमने जो कहा, वो करके दिखाया है. प्रधानमंत्री को इससे सीख लेनी चाहिए. प्रधानमंत्री ये जान लें, जब तक वो पूरे देश में किसानों का क़र्ज़ माफ़ नहीं कर देते, उन्हें हम चैन से सोने नहीं देंगे."
कांग्रेस के ऐलान के बाद सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कहा है कि वह किसानों का कर्ज़ माफ़ किए जाने के समर्थन में हैं.
इसके बाद बीजेपी ने भी असम में किसानों के कर्ज़ का 25 फ़ीसदी (अधिकतम 25 हज़ार रुपये तक) माफ़ करने का ऐलान किया है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या साल 2019 में सत्ता का रास्ता क़र्ज़माफ़ी के द्वार से होकर गुजरेगा.
कर्ज़माफ़ी एक राजनीतिक हथियार
पांच राज्यों के चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियों के बीच सोशल मीडिया से लेकर चुनावी मंचों से हुई बयानबाज़ी बताती है कि चुनाव के लिहाज़ से किसानों की कर्ज़ माफ़ी का मुद्दा काफ़ी अहम था.
एक बात तो तय थी कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जिस पार्टी का परचम लहराएगा, वही पार्टी आगे का एजेंडा तय करेगी. ये स्थिति काफ़ी दिनों से बहुत साफ़ थी.
राहुल गांधी ने जिन मुद्दों पर सत्ता पक्ष को घेरना शुरू किया है उनमें किसानों का मुद्दा काफ़ी अहम है.
लेकिन आज तक कोई भी सरकार किसानों की मूल समस्या को सुलझा नहीं पाई है.
इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. किसान को अपनी पैदावार की कीमत बाज़ार में उस वस्तु के उठते-गिरते भाव के अनुसार मिलती है.
जब किसानों को प्याज की कीमत प्रति किलो दो रुपये से तीन रुपये के बीच मिलती है तो आम लोगों को वही प्याज 20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिलता है.
लेकिन अगर खेती के दूसरे उत्पादों को ठीक ढंग से उपभोक्ता तक पहुंचाया जाए तो उसके लिए इन्फ़्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत है.
अगर कहीं पर संतरे का उत्पादन ज़्यादा होता है वहां पर संतरे का जूस निकालने के लिए यूनिट लगाए जाने की ज़रूरत है जिससे किसान अपनी फ़सल को सरल तरीके से उपभोक्ता तक पहुंचा सकें.
साफ तौर पर ये नहीं कहा जा सकता है कि सरकारों ने आज तक ये काम किया है.
कई राजनेताओं को कर्ज़माफ़ी एक आसान समाधान जैसा लगता है.
ऐसे में पिछले कुछ सालों में कर्जमाफ़ी के वादे सुनाई देने लगे हैं. पहले लोन मेले लगा करते थे.
साल 2009 के चुनाव के पहले यूपीए सरकार ने किसानों का 65 हज़ार करोड़ का कर्ज़ माफ़ कर दिया.
इसके बाद हुए आम चुनावों में यूपीए सरकार पहले से ज़्यादा मजबूत होकर सत्ता में आई.
इस मुद्दे से किसानों का मन जीतने में मदद मिलती है. चुनाव के समय ये वादे सुनाई देते हैं और किसान इन वादों को बड़े ध्यान से सुनते हैं.
ऐसे में जब लोग मतदान करने जाते हैं तो उनके दिमाग़ में यही वादे रहते हैं.
क्या किसानों को फ़ायदा होता है?
अर्थशास्त्र की नज़र से अगर देखें तो ये तरीका ठीक नहीं है.
सरकारें इस स्थिति में नहीं हैं कि वे लगातार किसानों का कर्ज़ माफ़ करती रहें.
आप चाहें किसी भी वित्तमंत्री के बजट को पढ़ लें, हर साल बजट में किसानों को कर्ज़ देने के लिए फंड दिया जाता है.
अब ये आंकड़ा सालाना दस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा हो चुका है.
हर वित्त मंत्री अपनी सरकार की पीठ थपथपाते हुए सरकार के इस कदम की सराहना करते हैं.
लेकिन ये नहीं देखा जाता है कि क्या ये पैसा वापस आ रहा है.
अगर ये पैसा वापस नहीं आएगा तो बैंक कमजोर होंगे और शायद कुछ साल वे कर्ज़ देने के लायक ही नहीं रहेंगे.
एनपीए की समस्या
ये कहने के साथ ही एक तर्क दिया जाता है कि बड़े उद्योगपतियों की वजह से भी बैंकों को एनपीए की समस्या का सामना करना पड़ता है.
ये बात सही भी है. लेकिन इस सरकार की दाद देनी होगी कि ये सरकार दिवालिया कानून लेकर आई जिससे उद्योगपतियों के मन में एक डर समाया है.
इससे उद्योगपतियों को ये संदेश गया है कि लोन लेने के बाद पैसे वापस करने पड़ेंगे और ये कहने से काम नहीं चलेगा कि लोन के पैसे को जिस उद्योग में लगाया गया था वह फेल हो गया.
अर्थशास्त्रियों के बीच में एक कहावत होती है...सिक कंपनी - हेल्दी प्रमोटर. इसका मतलब होता है कि कंपनी तो बीमार है लेकिन प्रमोटर मालामाल है.
अब उम्मीद जताई जा सकती है कि जब ऋणशोधन व दिवाला संहिता का ठीक ढंग से पालन किया जाएगा और वो प्रक्रिया तैयार हो जाएगी जिससे किसी भी लोन न चुकाने वाली कंपनी की नीलामी हो सके.
इसके बाद बैंकों से लोन लेकर वापस न करने की आदतें बदल जाएंगी. और बैंकों को अपना दिया हुआ कर्जा डूबने का डर भी कम रहेगा.
किसानों की समस्या कैसे सुलझे?
नेताओं के लिए किसानों से जुड़ी समस्याओं के लिए कर्ज़माफ़ी एक ब्रह्मास्त्र जैसा है.
इस तरीके से लगता है कि ये समस्याएं फिलहाल के लिए टल गई हैं और अगले चुनाव में देखा जाएगा कि क्या करना है.
लेकिन इसके साथ दिक्कत है कि आप इसे दोबारा इस्तेमाल नहीं कर सकते. अगले चुनाव में दोबारा यही हथियार निकाला जाएगा.
लेकिन एक बार की कर्ज़माफ़ी में जो पैसा खर्च होता है वो कभी भी वापस नहीं आता.
ऐसे में ज़रूरी है कि सरकार किसानों के लिए वो आधारभूत ढांचा तैयार करे जिसकी मदद से किसान अपनी फ़सल को मंडियों तक ले जाए और फिर वह उपभोक्ता तक पहुंच सके.
भारत में खेती के आंकड़ों को देखें तो कुछ साल पहले हमारे देश में गेंहू और चावल से ज़्यादा फल और सब्जियों का उत्पादन शुरू हो गया.
सब्जी और फल का उत्पादन तीन सौ मिलियन टन तक पहुंच गया है. वहीं, खाद्यान्न यानी गेंहूं और चावल का उत्पादन 270 टन तक हो गया है.
ये आंकड़ा बताता है कि किसान अब खाद्यान्न पर ध्यान नहीं दे रहा है.
अगर हम गन्ने का उदाहरण लें तो गन्ने की फ़सल में किसान को काफ़ी समय बाद पैसा मिलता है.
इसकी जगह अगर वह संतरा या सेब उगाता है तो उसे पैसा जल्दी मिल जाता है.
हालांकि, गन्ना भी एक कैश क्रॉप है लेकिन उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से किसान को पैसा मिलने में समय लगता है.
ऐसे में सरकार को ये सोचना चाहिए कि फल और सब्जियों के उत्पादन को ध्यान में रखते हुए, वे सभी उपाय किए जाएं, जिससे किसानों को एक बाज़ार मिल सके.
फिर कैसे हो समस्या का समाधान
किसान की समस्या के सुधार के लिए गुजरात की अमूल डेयरी के मॉडल से मदद मिल सकती है.
गुजरात में अमूल ने सहकारी फर्म बनाई जिसके तहत सभी लोग अपना दूध इकट्ठा करते हैं और उसका फायदा सबको मिलता है.
इस मॉडल पर काम करते हुए अमूल इतना बड़ा ब्रांड हो गया है कि देश की किसी दूसरी कंपनी को उससे टक्कर लेने से पहले एक बार सोचना पड़ेगा.
अमूल दूध के अलावा कई वैल्यू एडेड उत्पाद भी बना रही है.
अब इसी मॉडल को अगर आप खेती में इस्तेमाल करने की कोशिश करें तो जहां जिस चीज की पैदावार ज़्यादा होती है वहां उसकी प्रोसेसिंग के लिए ज़रूरी आधारभूत ढांचा तैयार किया जाए जिससे सभी को इसका फायदा मिले.
लेकिन जब तक सरकारें किसानों की समस्या को हल करने के लिए दृढ़ संकल्प नहीं कर लेतीं तब तक ये कोशिश करना बहुत मुश्किल होगा.
(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश के साथ बातचीत पर आधारित)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)
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