क्या एक बार फिर भारत की ओर हाथ बढ़ा रहा है मालदीव?: नज़रिया

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- Author, प्रोफ़ेसर एसडी मुनि
- पदनाम, दक्षिण एशिया मामलों के जानकार
हाल ही में मालदीव में एक बेहद महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन हुआ है. 23 सितंबर 2018 को हुए चुनाव में प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़ मालदीव (पीपीएम) के तात्कालिक राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन हार गए जबकि लोगों ने चार विपक्षी पार्टियों के साझे उम्मीदवार मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) के इब्राहीम मोहम्मद सोलिह को अपना जनादेश दिया.
चीन, रूस और पाकिस्तान को छोड़ कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस जीत की सराहना की. वहीं भारत को स्पष्ट रूप से इस बदलाव से राहत मिली क्योंकि मालदीव की पूर्ववर्ती यामीन सरकार के साथ पिछले कुछ दिनों से इसके संबंध तनावग्रस्त थे.
'पहले पड़ोसी' की नीति लॉन्च करने के बाद से मालदीव की यात्रा करते रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बदलाव के बाद 17 नवंबर को राष्ट्रपति इब्राहीम सोलिह के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए मालदीव गए.

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उन्होंने सोलिह को बधाई देते हुए कहा कि "हम मालदीव में एक स्थिर, लोकतांत्रिक, समृद्ध और शांतिपूर्ण गणराज्य को देखना चाहते हैं."
यह भी वादा किया गया कि भारत उनकी (मालदीव) विकास प्राथमिकताओं, विशेष रूप से बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं, कनेक्टिविटी और मानव संसाधन विकास के क्षेत्रों में उनका साथ देगा."
राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले संबोधन में सोलिह ने कहा, "हम भारत के साथ मौजूदा संबंधों को मजबूत बनाने का प्रयास करेंगे."
उन्होंने कहा कि मालदीव हिंद महासागर में स्थायी शांति और सद्भाव कायम रखने की अपनी साझा भूमिका को बढ़ावा देने का काम करेगा.
इसके लिए उन्होंने अपनी पहली राजकीय विदेश यात्रा पर भारत जाने का फ़ैसला किया है. और सोलिह 17 दिसंबर को भारत आ रहे हैं.

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मालदीव को लेकर क्या हैं भारत की चिंताएं?
पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन भी 'पहले भारत' की नीति का जोर शोर से दावा करते थे लेकिन उनके निरंकुश शासन को जब भारत से समर्थन नहीं मिला तो वह चीन और पाकिस्तान के क़रीब जाने लगे.
इससे खासतौर पर तीन वजहों से भारत की चिंताएं बढ़ी हैं.
- मालदीव में चीन की आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति,
- भारतीय परियोजनाओं और विकास गतिविधियों में रुकावट, जिसकी वजह से भारत के तकनीकी कामगारों को वीज़ा देने से इनकार करना, और
- इस्लामी कट्टरपंथियों का बढ़ता डर
मालदीव रणनीतिक रूप से भारत के क़रीब और हिंद महासागर में संपर्क के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर स्थित है और यह भारत के सुरक्षा हितों में नहीं है कि चीन जैसी कोई प्रतिकूल या प्रतिस्पर्धी ताक़त वहां मौजूद हो या अपनी उपस्थिति को मज़बूत बनाए.

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मालदीव में चीनी परियोजनाएं
मालदीव ने चीन के 'बेल्ट ऐंड रोड' पहल का समर्थन किया है और साथ ही उसकी एक बिलियन डॉलर से अधिक की बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं का भी स्वागत किया है. कुछ महत्वपूर्ण चीनी परियोजनाओं में माले बंदरगाह, माले और उससे 10 किलोमीटर दूर समुद्र में स्थित द्वीप हुलहुले के बीच एक पुल और बड़े स्तर पर जनता आवास का निर्माण शामिल है.
अपनी नौसेना की सुविधाओं के विकास के लिए चीन की नज़र सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मालदीव के द्वीपों पर है. चीन ने मालदीव के साथ दिसंबर 2017 में एक फ़्री ट्रेड समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके लिए पूर्व राष्ट्रपति यामीन संसद को बिना जानकारी दिए और बगैर उसकी सहमति लिए ही पहुंचे थे.

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मालदीव की अर्थव्यवस्था पर असर
मालदीव में नई सरकार को चीनी निवेश पर सैद्धांतिक रूप से कोई आपत्ति नहीं हो सकती है लेकिन उन्होंने एफटीए का विरोध किया है और उनका मानना है कि चीन की कुछ मेगा परियोजनाओं की लागत बढ़ रही है.
कर्ज़ को चुकाने की वजह से मालदीव की अर्थव्यवस्था पर काफ़ी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. वो इन परियोजनाओं पर फिर से बातचीत के बारे में सोच रही है, जो अब शायद संभव नहीं हो सके.
यही वजह है कि नई सरकार को अब चीनी निवेश के विस्तार पर रोक लगाकर भारत जैसे मित्र देशों के साथ दोस्ती और बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि वो अपने कर्ज़ चुकाने के बोझ को कम कर सकें.
मालदीव पर चीन के कर्ज़ का बोझ इसके सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 40 से 70 फ़ीसदी के बीच बैठता है. चीन अपनी परियोजनाओं पर मालदीव की तरफ से किसी भी तरह के पुर्नविचार का विरोध करेगा, इनमें से कुछ परियोजनाएं, जैसे कि माले-हुलहुले पुल, तो लगभग पूरी हो चुकी हैं.
चीन की फटकार
25 सितंबर 2018 को चीन के विदेश विभाग के प्रवक्ता गांग शुआंग से मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद (जो राष्ट्रपति सोहिल के भी नेता थे) को मिले फटकार को याद किया गया. नशीद ने चीनी परियोजनाओं की पारदर्शिता, व्यापारिक क्षमता और लोकतांत्रिक परिचालन प्रक्रिया में कमी को लेकर आलोचना की थी.
चीनी प्रवक्ता ने नशीद का नाम लिए बगैर कहा था, "हम गहरी उलझन में है और कुछ लोगों की गैरज़िम्मेदाराना बयानों पर हमें खेद है. साथ ही यह दोहराना चाहते हैं कि बाज़ार के कायदे क़ानूनों का पालन करते हुए समान और पारस्परिक लाभ के लिए हम अपना सहयोग जारी रखेंगे. यदि कुछ लोग चीन के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं तो हम इसका विरोध करेंगे."
नवंबर 2018 में, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विशेष दूत लुओ शुगांग माले पहुंचे ताकि नए राष्ट्रपति को बधाई दे सकें और साथ ही यह भी आश्वासन मिले कि मालदीव 'बेल्ड ऐंड रोड' परियोजना में सहयोग जारी रखेगा.

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भारत से क्या हैं उम्मीदें?
मालदीव बुनियादी ढांचों, सॉफ्ट लोन और बजटीय घाटे को पाटने के मक़सद से भारत से एक बिलियन डॉलर के मदद की उम्मीद कर रहा है. मालदीव की मदद के लिए मुद्रा विनिमय की संभावनाओं का भी पता लगाया जा रहा है.
यामीन सरकार के दौरान भी भारत के साथ इसी तरह के समझौते की योजना बनाई गई थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राष्ट्रपति सोलिह की बातचीत के बाद मालदीव को भारत से क्या पैकेज मिल रहा है इसकी वास्तविक स्थिति साफ़ होगी.
नवंबर में इसी चर्चा की ज़मीन तैयार करने के लिए मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद ने अपनी एक मजबूत आर्थिक टीम के साथ भारत का दौरा किया था.

भारत को क्या करना चाहिए?
मालदीव के नए शासन की उम्मीदों पर भारत को समझदारी दिखानी होगी. चाहे जो भी हो भारत, मालदीव में चीन की उपस्थिति नहीं चाहेगा.
चीन किसी भी परियोजना पर श्रीलंका की तरह ही 99 साल के लीज के साथ समान हिस्सा चाहेगा. इन परियोजनाओं से चीन की कंपनियों को बाहर करने पर एक बड़ा आर्थिक हर्जाना देना पड़ेगा, जिसे मालदीव नहीं दे सकेगा.
अपनी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए भारत को मालदीव का साथ देना चाहिए, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ताकि वहां चीन की उपस्थिति को सीमित किया जा सके और यह भी सुनिश्चित हो कि हिंद महासागर में रणनीतिक और सामरिक अतिक्रमण न हो.
बदले में भारत, मालदीव से यह उम्मीद करेगा कि भारतीय परियोजनाओं और वीज़ा पर पिछली सरकार के लगाए प्रतिबंधों को हटाया जाए.
चीन न केवल मालदीव में बल्कि समूचे एशिया और भारत के पड़ोसी देशों में इसके लिए एक राजनयिक और सामरिक चुनौती बन गया है. लिहाजा भारत को उसे एक व्यापक और बड़ा जवाब देने की ज़रूरत है, टुकड़े टुकड़े में दिया गया जवाब लंबे वक़्त तक असरदार नहीं होंगे.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
















