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नोटबंदी की क़तार में जन्मे इस बच्चे से अख़िलेश यादव का प्रेम
- Author, गीता पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वो इस दुनिया में एक बड़े धमाके साथ पहुंचा. बैंक की क़तार में उसके जन्म की ख़बर दुनिया भर में गूंजी थी. लेकिन अपने सिलेब्रिटी स्टेटस की वजह से दो वर्षीय खजांची नाथ अब अपने परिवार के दोनों पक्षों और दोनों के गांवों के बीच एक कड़वी लड़ाई के केंद्र में है.
बीबीसी की गीता पांडे ने उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित खजांची के गांव का दौरा किया ताकि पूरी माजरे को समझा जा सके.
खजांची यानी बैंक का कैशियर. दो दिसंबर 2016 को खजांची तब पैदा हुआ था जब भारत में नोटबंदी के बाद बैंकों के बाहर 500 रुपए और 1000 रुपए जमा करने की लंबी-लंबी क़तारें लगा करती थीं.
पूरे देश में नक़दी की कमी की वजह से लंबी-लंबी क़तारें लगने की ख़बरें रोजाना आया करती थीं. इसी दौरान अपनी गर्भावस्था के अंतिम हफ़्तों के दौरान वो अपने सरदारपुर गांव से पैदल चल कर झिंझक शहर स्थित बैंक की शाखा के बाहर सैकड़ों अन्य लोगों के बीच अपनी सास शशि देवी और 10 वर्षीय बेटी प्रीति के साथ क़तार में खड़ी थीं. इसी दौरान उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई.
उनकी कहानी सुर्खियों में आई और देश की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ राज्य के चुनाव अभियान के दौरान नन्हा खजांची पोस्टर बॉय बन गया.
जब बच्चा दो महीने का हुआ तब मैं मां की कहानी जानने गांव पहुंची थी.
खजांची के जन्म से चार महीने पहले उनके पिता टीबी बीमारी के शिकार हो गए थे. बैंक की क़तार में बच्चे के जन्म देने की कहानी सुनाते हुए उस मां ने मुझे बताया था कि यदि उस दौरान उनकी सास नहीं होतीं तो वो मर जातीं.
लेकिन पिछले हफ़्ते जब मैंने उनसे मिलना चाहा तो इस बार मुझे एक दूसरे गांव अनंतपुर धौकल जाना पड़ा, जहां अपने ससुराल वालों के साथ कड़वाहट के बाद खजांची की मां बीते वर्ष चली गई हैं.
ये वही जगह है जहां सर्वेश देवी का मायके है, वो अब अपनी मां और अपने तीन भाइयों के साथ रहती हैं.
खजांची मुझे देख कर उत्सुक हुआ- वो अपनी आंखों से कभी मुझे देखता है तो कभी अपनी मां को और मेरा हाथ हिलाता है. मैंने पूछा कि उनके नाखूनों को गहरे गुलाबी रंग में किसने रंगा है. वो अपनी बहन प्रीति की ओर देख कर मुस्कुरा देता है.
कड़वी लड़ाई से बेख़बर वो मेरे चश्में में दिलचस्पी दिखाता है और जब मैं उसकी तस्वीर लेने उसके और क़रीब जाती हूं तो मुझसे मेरा फ़ोन लेने की कोशिश करता है.
सर्वेश देवी पड़ोस से दो प्लास्टिक की कुर्सियां ले आती हैं और हम आमने-सामने बैठ कर बातें करने लगते हैं. कुछ ही मिनटों में खजांची रोने लगता है. उसकी मां कहती हैं कि "उसे भूख लगी है" और वो दूध पिलाने लगती हैं.
अब तक मेरे आने की ख़बर फ़ैल चुकी है और जल्द ही उनकी मां, उनके भाई और कुछ पड़ोसी वहां जुट गए.
एक बार खजांची के शांत हो जाने के बाद मैंने सर्वेश से सास के साथ रिश्ते में आई खटास के बारे में पूछा. इस बार, शशि देवी के बारे में वो कोई प्रशंसा नहीं करती हैं. असल में, रिश्ते इतने तल्ख हो गए हैं कि वो उनसे अपने और खजांची के लिए ख़तरे की बात करती हैं.
जब खजांची का जन्म बैंक की क़तार में हुआ था तब उनकी मां सर्वेश देवी को सरकारी मुआवजे में दो लाख रुपए मिले थे.
पहले प्यार करने वाली सास और ससुराल को अब वो डरावनी राक्षसी सास के रूप में बताती हैं. अपनी सास पर वो नियमित रूप से मारने और मुआवजे के पैसे की मांग करने का आरोप लगाती हैं.
ग़रीबी से घिरे परिवार के लिए आय का कोई निश्चित स्रोत नहीं है. मुआवजा मिलने के बाद से ही पारिवारिक संबंधों में खटास आने लगी थी.
आख़िर ऐसा क्या हुआ कि यह परिवार अलग हो गया? यह सवाल मैंने सर्वेश देवी और जब मैं सरदारपुर गई तो उनकी सास, परिवार के अन्य सदस्यों और गांव वालों से भी पूछा.
इन दावों में कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ यह निकाल पाना मुश्किल होता है.
खजांची के परिवार का ताल्लुक बैगा जनजाति से है, जो भारत के सबसे ग़रीब और सबसे वंचित समुदायों में से एक है. उनके पास शिक्षा का अभाव है, कोई ज़मीन भी नहीं है और ज़्यादातर भीख मांग कर अपना जीवनयापन करते हैं.
परंपरागत रूप से बैगा संपेरा थे. सांपों को पकड़ना बहुत पहले ही ग़ैर-क़ानूनी हो गया है. जब भी मैंने उनसे मुलाक़ात की उन्होंने बड़े गर्व से अपने पास मुझे इसे (सांप को) दिखाया है.
इस बार फिर मुझसे एक गांव वाला पूछता है कि क्या मैं उनके नए पकड़े गए सांप को देखना चाहती हूं, इससे पहले कि मैं जवाब दे सकूं, एक टोकरी से कोबरा सांप का एक बच्चा निकाल कर ले आता है.
वो उसे दबाकर ज़मीन पर रखता है और मुझसे महज़ एक मीटर की दूरी पर वो सांप वहां चलना शुरू कर देता है. वो मुझे आश्वस्त करता है कि वो नुक़सान नहीं पहुंचाएगा.
टोकरी में रखने से पहले वो बताता है कि बड़ा होकर ये तीन मीटर लंबा हो जाएगा. जब मैं बातें करना शुरू करती हूं तो मेरी सावधान नज़र उधर ही लगी रहती है.
देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में खजांची के जन्म के बाद जो उसे शोहरत मिली उसे वहां के चुनावों में भुनाने की कोशिश की गई.
तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ''बैंक की क़तार में जन्म'' को चुनाव के दौरान नोटबंदी के दुर्भाग्यपूर्ण असर को दिखाने के लिए इस्तेमाल किया.
वो अपनी सभी राजनीतिक रैलियों के दौरान नवजात शिशु को बुलाया करते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी से ग़रीबों को पहुंचे नुक़सान को दिखाने के लिए उनके परिवार का इस्तेमाल किया करते थे.
खजांची के जन्म के कुछ महीनों बाद अखिलेश यादव ने उनकी मां को मुआवजे का पैसा दिया.
यह मामला इसी महीने की शुरुआत में तुल पकड़ने लगा. सर्वेश देवी बताती हैं कि एक दिसंबर को खजांची के जन्मदिन से एक दिन पहले दो गाड़ियों में भर कर देर रात कई अधिकारी उनके घर पहुंचे.
"मैं रात के खाने के लिए बैठी ही थी, खजांची सो चुका था. उन्होंने जोर देकर कहा कि हम उनके साथ खजांची का जन्मदिन मनाने सरदारपुर चलें. मैंने साफ़ इनकार कर दिया, इसलिए उन्होंने खजांची को उठा लिया और अपनी गोद में लेकर कार तक ले गए. वो जाग गया और रोने लगा. हमने हल्ला करते हुए उनका पीछा किया. पड़ोसी उसे बचाने हमारी मदद करने पहुंचे."
वो जोर देकर कहती हैं "वो उसका अपहरण करने की कोशिश कर रहे थे."
हालांकि अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव नहीं जीत सके लेकिन उन्होंने खजांची के साथ संपर्क बनाए रखा था. स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि वो उसे आगामी लोकसभा चुनावों में अपने पोस्टर बॉय के रूप में दोबारा इस्तेमाल करना चाहते हैं और उन्होने यह घोषणा कर रखी है कि उनके जन्मदिन पर दो घर तोहफे में देंगे- एक सरदारपुर में तो दूसरा अनंतपुर में.
उसके जन्मदिन के अवसर पर अखिलेश ने सरदारपुर का दौरा करने की योजना बनाई थी, उन्हें घर की चाबियां सौंपने के लिए. स्थानीय पत्रकारों को यह समारोह कवर करने लिए आमंत्रित किया गया था.
लेकिन जब यादव सरदारपुर पहुंचे तो खजांची वहां नहीं मौजूद था इसलिए घर की चाबी उनकी दादी शशि देवी को सौंप दी गई.
बच्चे की अनुपस्थिति से निराश अखिलेश को तब खजांची के घर में चल रही इस कड़वाहट की जानकारी नहीं थी और उन्होंने शर्मसार करने के लिए अपनी पार्टी के दो वरिष्ठ सदस्यों को बर्खास्त कर दिया.
जब कुछ दिनों के बाद मैंने सरदारपुर का दौरा किया तो मुझे सड़क के किनारे एक नया घर मिला. शशि देवी बाज़ार गई हुई थीं, इसलिए उनका इंतज़ार करने के दौरान मैंने उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों से बात की.
उनके बड़े चाचा अशर्फी नाथ ने बताया, "अखिलेश यादव बहुत से तोहफ़े लाए थे. खजांची को देखने बहुत से लोग जुटे थे लेकिन उनकी मां उसे लेकर नहीं आईं. सर्वेश देवी एक घंटे के लिए आ सकती थीं लेकिन उन्होंने समारोह में भाग लेने से इनकार करते हुए अखिलेश यादव को अपमानित किया."
गांववालों ने बताया कि खजांची के जन्म के वक़्त तो सब कुछ सही चल रहा था लेकिन उनकी मां के परिवार और उनके गांव वालों के लालच ने सब कुछ बदल दिया.
वो आरोप लगाते हैं कि उनके परिवार वाले उनका पैसा चाहते हैं और गांववालों को यह लालच है कि यदि ये लड़का उनके गांव में रहा तो उनके गांव का विकास होगा.
गांववाले इसमें राजनीतिक षड्यंत्र की ओर भी इशारा करते हैं- सरदारपुर अखिलेश यादव की पार्टी का समर्थन करती है जबकि अनंतपुर पर नरेंद्र मोदी की भाजपा का समर्थन करने वाली ऊपरी जाति ठाकुरों का प्रभुत्व है.
एक गांववाले मुलायम नाथ कहते हैं कि अगर सर्वेश देवी वापस नहीं आती हैं तो वो अपने माता-पिता के गांव में रह सकती हैं लेकिन उन्हें खजांची को वापस भेजना चाहिए क्योंकि वो हमारा बच्चा है, वो हमारे गांव से जुड़ा है. विकास और लाभकारी योजनाओं की घोषणा जो अधिकारियों ने की है वो हमारे गांव में आनी चाहिए.
जब तक शशि देवी बाज़ार से लौटती हैं, अंधेरा घिर आता है. वो नए बने घर के बाहर ज़मीन पर बैठती हैं.
मैंने जब उनसे यही सवाल दोहराया तो उन्होंने कहा, "यह सब झूठ है. मैंने कभी भी अपनी बहू से किसी भी पैसे के लिए नहीं पूछा. जो कुछ भी वो कह रही है, उसे सिखाया गया है."
शशि देवी बताती हैं कि जब उनका बेटा (खजांची के पिता) बीमार था तब उनके खाने और कपड़े की व्यवस्था वो और उनका परिवार ही किया करता था.
जब उसकी मौत हो गई तब जो कुछ भी वो और उनके बेटे कमा कर लाते थे उनसे साझा किया करते थे जबकि ऐसा करने के लिए वो बाध्य नहीं थे.
इन आरोपों को साफ़ ख़ारिज कर दिया कि कभी उन्होंने सर्वेश देवी को मारा है. वो कहती हैं, "मेरी चार बहुएं हैं और 16 पोते. क्या ये संभव है कि उनकी पिटाई की गई और बाकियों के साथ कभी ऐसा सलूक नहीं किया गया."
वो कहती हैं कि सर्वेश के पास उनके साथ किए गए दुर्व्यवहार की अपनी कहानी है, "मैं उन्हें और बच्चों को लाने दो बार उनके गांव गई. हर बार उन्होंने खजांची को छुपा लिया और महिलाओं ने मुझ पर हमले किए."
शशि देवी पूछती हैं कि क्या वो और उनके परिवार वाले कभी सर्वेश देवी या खजांची को चोट पहुंचा सकती हैं. वो बोलती हैं, "हम अपनी बहू और पोते को कैसे मार सकते हैं?"
जब मैं वहां से निकलने लगती हूं तो मैंने उनसे पूछा कि क्या सुलह की कोई उम्मीद है, इस पर वो बहुत सकारात्मक नहीं दिखीं.
वो कहती हैं, "मैंने हाल ही में उनसे तीन बार मुलाक़ात की है और वापस आकर अपने नए घर में रहने के लिए कहा."
अपनी साड़ी के पल्लू से आंख के आंसू पोंछते हुए वो कहती हैं, "लेकिन उसने इनकार कर दिया."
वो कहती हैं, "पहले मैंने अपना बेटा खो दिया. अब मैंने अपने पोते को भी खो दिया है."