उर्जित पटेल के इस्तीफ़े की टाइमिंग क्यों ख़ास है

    • Author, दिनेश उप्रेती
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. मोदी सरकार के साथ कई मसलों पर लंबी तनातनी के बाद उनके इस्तीफ़े की अटकलें लगाई जा रही थी.

उर्जित पटेल का कार्यकाल सितंबर 2019 तक था. यानी उन्होंने अपने निर्धारित कार्यकाल से नौ महीने पहले पद से हटने का फ़ैसला किया.

लगभग चार साल तक आरबीआई के डिप्टी गवर्नर रहने के बाद उर्जित ने 4 सितंबर 2016 को गवर्नर का पद संभाला था.

पटेल ने अपने इस्तीफ़े की वजह निजी बताई है, लेकिन कहा जा रहा है कि रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता, कैश फ्लो और ब्याज दरों में कमी नहीं करने को लेकर उनका सरकार के साथ टकराव था.

पटेल की इस्तीफ़े की टाइमिंग भी अहम है. पटेल का इस्तीफ़ा ऐसे समय पर आया है, जब मंगलवार को पाँच राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम की विधानसभा चुनावों के नतीजे आने वाले हैं. संसद का शीतकालीन सत्र भी मंगलवार से ही शुरू हो रहा है, और चार दिन बाद यानी 14 दिसंबर को रिज़र्व बैंक की बोर्ड बैठक निर्धारित है.

सोमवार को ही विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए बैठक भी की. रफ़ाल रक्षा सौदा, बेरोज़गारी, किसान समेत कई मसलों को लेकर पहले से ही केंद्र सरकार पर हमलावर विपक्ष अब आरबीआई के मुद्दे पर भी मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करेगा.

रिज़र्व बैंक और मोदी सरकार के बीच तनातनी पहली बार तब उभर कर सामने आई थी जब डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 26 अक्टूबर को एक कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता की वक़ालत की थी. विरल आचार्य ने मुंबई में देश के बड़े उद्योगपतियों के एक इवेंट में कहा था, 'केंद्रीय बैंक की आज़ादी को कमज़ोर करना त्रासदी जैसा हो सकता है. जो सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की अनदेखी करती हैं, उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.'

हालाँकि इसके बाद 19 नवंबर को रिज़र्व बैंक बोर्ड की बैठक में आरबीआई के पास सरप्लस राशि के आवंटन के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था.

ऐसा लग रहा था कि आरबीआई गवर्नर और सरकार के बीच अब सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है, लेकिन उर्जित के इस्तीफ़े से लगता है कि ये द्वंद्व अभी खत्म नहीं हुआ था.

कुछ दिन पहले ही उर्जित पटेल ने बैंकों में धोखाधड़ी पर गहरा दुख जताते हुए कहा था कि केंद्रीय बैंक नीलकंठ की तरह विषपान करेगा और अपने ऊपर फेंके जा रहे पत्थरों का सामना करेगा, लेकिन हर बार पहले से बेहतर होने की उम्मीद के साथ आगे बढ़ेगा.

इसी महीने की शुरुआत में जब आरबीआई ने ब्याज़ दरों की समीक्षा की थी और इनमें किसी तरह का बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया था, तब मोदी सरकार के साथ चल रहे गतिरोध से संबंधित सवाल पूछे जाने पर उर्जित पटेल ने इस पर कोई भी जवाब देने से मना कर दिया था.

किन बातों को लेकर था टकराव

कुछ ख़बरों में कहा गया था कि सरकार आरबीआई के खज़ाने में पड़ी जमा राशि में बड़ा हिस्सा चाहती थी. हालाँकि सरकार की तरफ से स्पष्ट किया गया था कि उसे अभी किसी तरह की रकम की ज़रूरत नहीं है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरोप लगाया था कि रिज़र्व बैंक ने कर्ज़ बांटने के काम में लापरवाही बरती. साथ ही पीएनबी घोटाले में भी सरकार ने आरबीआई को कठघरे में खड़ा किया था. सरकार का आरोप था कि आरबीआई की ढिलाई के कारण एनपीए की समस्या बढ़ी.

बैंकिंग सेक्टर में सुधार के लिए आरबीआई ने इस साल की शुरुआत में कई कड़े नियम बनाए थे. इसके लिए ग़ैर बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियों पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई थी. सरकार को आशंका थी कि इस तरह की सख्ती से छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज़ मिलने में दिक्कत हो सकती है.

केन्द्र सरकार और आरबीआई के बीच एक और विवाद का विषय बना आरबीआई एक्ट का सेक्शन 7. इस सेक्शन के तहत केन्द्र सरकार जनहित में अहम मुद्दों पर आरबीआई को निर्देश दे सकती है. हालांकि केन्द्र सरकार ने कहा था कि उसने इस सेक्शन का इस्तेमाल नहीं किया है.

क्या होगा असर?

विश्लेषकों का कहना है कि इस ख़बर का बेहद नकारात्मक असर आने वाले दिनों में देखने को मिल सकता है. इलारा कैपिटल की वाइस प्रेसिडेंट गरिमा कपूर कहती हैं, "भारत के लिए ये बेहद नकारात्मक ख़बर है. भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़राब होगी. विदेशी संस्थागत निवेशक भी इसे सकारात्मक रूप से नहीं लेंगे. आखिरकार केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता का सवाल है. अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिहाज से ये नकारात्मक होगा."

वैसे भी पिछले कुछ समय से शेयर बाज़ारों में अस्थिरता का माहौल चल रहा है और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भी भारत को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं हैं. फ़िच ने इस साल भारत का जीडीपी ग्रोथ अनुमान घटाकर 7.2 फ़ीसदी कर दिया है, जबकि सितंबर में ही इसी एजेंसी ने अनुमान लगाया था कि इस वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.8 फ़ीसदी रहेगी. क्रिसिल ने भी जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7.5 फ़ीसदी से घटाकर 7.4 फ़ीसदी कर दिया है.

यही नहीं, ऑर्गनाइजेशन फोर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी ओईसीडी ने 2019 के लिए भारत का जीडीपी ग्रोथ अनुमान 7.3 फ़ीसदी रखा है.

आर्थिक मामलों के जानकार सुदीप बंद्योपाध्याय का कहना है कि ग्रोथ रेट घटाने की ख़बरों के बीच गवर्नर का पूरा कार्यकाल किए बगैर बीच में पद छोड़ देना रेटिंग एजेंसियों को और चौकन्ना कर देगा.

बंद्योपाध्याय कहते हैं, "सबसे बड़ी मुश्किल ये होगी कि भारत की ग्रोथ स्टोरी से विदेशी निवेशकों का डिग सकता है. वैसे भी रेटिंग एजेंसियां भारत को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं हैं और इस घटनाक्रम के बाद हालत और बदतर होंगे."

उन्होंने कहा, "सरकार के सामने दूसरी सबसे बड़ी समस्या ये आने वाली है कि वो इस पद पर किसे बिठाते हैं. पहले रघुराम राजन और फिर उर्जित पटेल, दोनों ही गवर्नरों के कार्यकाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिससे ये लगा कि सरकार रिज़र्व बैंक पर दबाव बनाना चाहती है. निश्चित तौर पर भारत में निवेश कर मुनाफ़ा कमाने की इच्छा रखने वाले विदेशी निवेशकों का सेंटिमेंट बिगड़ेगा."

इसके अलावा इसका असर करेंसी और बॉन्ड मार्केट पर भी पड़ना तय माना जा रहा है. करेंसी एक्सपर्ट सौम्य दत्ता कहते हैं, "आरबीआई की कोशिशों के बाद रुपया डॉलर के मुकाबले संभल पाया था, लेकिन अब इस कदम से करेंसी और बॉन्ड मार्केट पर दबाव आएगा. ब्रेक्सिट के कारण भी डॉलर मजबूत होता जा रहा है और ऊपर से भारत में जो घटनाक्रम हो रहे हैं, उससे अगले एक महीने में डॉलर के मुकाबले रुपया फिर 72 से साढ़े 72 रुपये तक के स्तर पर पहुँच सकता है."

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