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क्या राजस्थान का स्वास्थ्य सुधार पाई राजे सरकार की भामाशाह योजना?
- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, जयपुर से बीबीसी संवाददाता
राजस्थान में बीजेपी सरकार की भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना इन चुनावों में प्रमुख मुद्दा बनी हुई है. इस योजना के तहत मुफ़्त इलाज का प्रावधान किया गया है.
सरकार का दावा है कि यह योजना लाखों परिवारों के लिए जीवनदायी साबित हुई है. लेकिन ऐसे मामले सामने आते रहे है जब लोगों ने इलाज न मिलने की शिकायतें की हैं. अधिकारी कहते हैं शिकायतों की जाँच की जा रही है. वहीं, विपक्ष भी इस योजना पर सवाल उठाता रहा है.
राज्य में चुनाव प्रचार परवान चढ़ा तो सियासी दलों ने इसे मुद्दा बना लिया.
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे विपक्ष की आलोचना का अपनी सभाओं में हमलावर मुद्रा में जवाब देती हैं.
अपनी एक चुनावी सभा में राजे ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की मुफ़्त दवा योजना को फिज़ूल बताकर निशाने पर लिया.
राजे ने भीड़ से कहा 'याद करो वो दिन जब मुफ़्त दवा के नाम पर झुनझुना पकड़ा देते थे. दो एस्प्रिन गोलियां हाथ में पकड़ा कर कह देते थे कि मुफ़्त दवा मिल गई."
वो अपनी स्वास्थ्य योजना का हवाला देकर कहती हैं, "आज तीस हज़ार से लेकर तीन लाख रुपए तक मुफ़्त इलाज होता है.अच्छे से अच्छे हॉस्पिटल में मुफ़्त इलाज उपलब्ध है. यह सब पिछले पांच साल में हुआ है."
वो जिन्हें झेलनी पड़ी दुश्वारियां
सरकारी दावों के उलट हनुमानगढ़ में लीलावाली के दिलीप मेघवाल को इलाज के दौरान बहुत मुश्किलों से गुजरना पड़ा.
करीब छह माह पहले दिलीप अपने खेत में काम कर रहे थे जब ट्रांसफार्मर से निकली आग से वे झुलस गए और उनकी जान पर बन आई.
गीता मेघवाल जब दर्द में तड़पते अपने पति को लेकर हॉस्पिटल पहुंची तो उनसे इलाज के लिए पैसे मांगे गए और पैसे न होने पर जबरन छुट्टी दे दी गई.
गीता ने बीबीसी से कहा, "मेरे पति की हालत बहुत गंभीर थी. मगर हॉस्पिटल ने छुट्टी दे दी. मैंने मिन्नते की और कहा कि उनके हाथ-पैर और कई हिस्से जले हुए हैं, घर कैसे ले जाऊं. हॉस्पिटल वालों ने कहा कि अगर इलाज कराना है तो पैसा लगेगा. भामाशाह में इतना ही होगा."
गीता कहती हैं कि उनकी स्थिति घर ले जाने जैसे नहीं थी. लिहाज़ा पांच हज़ार रुपये जमा करवाए और दवा ख़ुद ख़रीद कर लानी पड़ी. जब पैसे खत्म हो गए तो मैंने उन्हें छुट्टी दिलवा दी. लेकिन उनके शरीर से ख़ून बहने लगा. मैंने फिर फरियाद की मगर उन्होंने रहम नहीं किया."
"इसके बाद दोबारा दो हज़ार रुपये जमा करवाए. इससे कुछ इलाज हुआ. लेकिन कुछ दिन बाद दोबारा ख़ून बहने लगा, इसके बावजूद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया. उनका एक हाथ कट गया. दूसरे हाथ से भी खाना नहीं खा सकते. दो छोटे बच्चे हैं. हम इस अस्पताल से उस अस्पताल के बीच चक्कर काटते रहे."
स्वास्थ्य निदेशालय के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि इस बारे में हॉस्पिटल से जवाब तलब किया गया है और मामले की जाँच की जा रही है.
क्या कह रहे हैं अधिकारी?
अधिकरियों के अनुसार यह बेहद कामयाब योजना है. इसमें अब तक इलाज के मद में दो हजार करोड़ का भुगतान किया गया है.
योजना में 1400 हॉस्पिटल सूचीबद्ध है. इन बड़े अस्पतालों में मरीज इलाज करा सकते हैं.
गीता कहती हैं, "वो छह माह तक बीकानेर और जयपुर के बीच चक्कर लगाती रहीं. बच्चों को मांग-मांग कर खाना पड़ रहा है. पैसे उधार लेने पड़े हैं. कुछ रिश्तेदारों से और कुछ आढ़तियों से. कुछ सोना बेचा. मेरे पति बढ़ई का काम करते थे, वो मशीन बेचनी पड़ी. तीन चार लाख रुपये खर्च हो गए."
राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए काम कर रह डॉ नरेंद्र गुप्ता ने बीबीसी से कहा, "इस योजना के बाद सरकारी हॉस्पिटल अपनी बला टालने की कोशिश करते हैं और लोगों को प्राइवेट हॉस्पिटल जाने के लिए कह देते है. पीड़ित को प्राइवेट हॉस्पिटल खोजने पड़ते हैं. क्योंकि सारे हॉस्पिटल योजना में अधिकृत नहीं हैं. लोग भटकते रहते हैं. बीच में बीमा कम्पनी और सरकार में भी विवाद हुआ. इसके बाद प्रति परिवार प्रीमियम राशि 375 से बढ़ा कर 1225 कर दी गई."
कांग्रेस प्रवक्ता अर्चना शर्मा कहती हैं कि यह योजना बीजेपी सरकार का बड़ा घोटाला है. इसे जनता को समर्पित बताकर जनता का शोषण किया गया है.
वह कहती हैं, "हर दिन अस्पतालों में इलाज के लिए भीड़ जमा होती है. उनमें किसी की जेब फटी होती है तो किसी का जिस्म बीमारी से जर्ज़र होता है. किसी का कोई पैरोकार नहीं होता तो किसी के पास रोज़गार नहीं होता. उन्हें दवा की ज़रूरत है और दुआ की भी. शायद सरकार कोई रास्ता निकाले."
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