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किसानों के लिए संकट से बड़ा जाति और धर्म क्यों: नज़रिया
- Author, अरविन्द मोहन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दिल्ली में इस बार किसानों का जमावड़ा वैसा नहीं था जैसा महेंद्र सिंह टिकैत के दिनों में हुआ करता था. उसके बाद के जमावड़े छोटे और अप्रभावी हुआ करते थे और मीडिया सिर्फ़ शहर में गंदगी फैलाने और ट्रैफ़िक जाम की शिकायत करता था.
इस बार का जमावड़ा पहले से कम होकर भी बड़ा दिखता है, क्योंकि मीडिया अचानक किसान समर्थक होने लगता है. सारा विपक्ष किसानों का हितैषी दिखता है.
सरकार का किसान हितैषी का दावा भी कमज़ोर नहीं है. बजट में ही लागत का डेढ़ गुना दिए जाने की घोषणा हो चुकी है. न्यूनतम समर्थन मूल्य भी ठीक-ठाक बढ़ा है, इतना कि स्वामीनाथन अय्यर जैसे अर्थशास्त्री उसे सरकार के गले का फांस मानते हैं.
फिर क्यों इस बार ज़्यादा चर्चा है, ज़्यादा सहानुभूति दिखती है?
एक कारण विपक्षी जमावड़े का है. लगभग पूरा विपक्ष किसानों के समर्थन में रामलीला मैदान में उपस्थित था. आयोजन में किसी की भागीदारी नहीं थी.
पर सीताराम येचुरी, डी. राजा, शरद यादव, शरद पवार का आना जितनी चर्चा न पा सका, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल का आना एक दम से न्यूज़ बन गया.
केजरीवाल योगेंद्र यादव के मुख्य आयोजन में अतिथि बनकर आए. यह सिर्फ़ नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा को कोसने का अवसर भर नहीं होगा, सबको इसमें कोई और राजनीति दिखी.
राहुल का आना भी जितना चौंकाने वाला था उतना ही वहाँ आकर अपनी सरकार आने पर किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने का वायदा करना था.
ये दोनों संयोग थे या किसी सोची रणनीति का हिस्सा.
केजरीवाल ने भाजपा सरकार के दावे और सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू न करना स्वीकार करने के दोमुंहेपन को उजागर किया तो राहुल गांधी ने उद्योगपतियों के क़र्ज़ माफी और किसानों के क़र्ज़दार होने का सवाल उठाया.
दो सौ से ज्यादा किसान संगठन दिल्ली में जुटे थे. वे इन्हीं दो मांगों-क़र्ज़ माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने की मांग लेकर जमा थे.
राहुल-केजरीवाल का आना कितना सही
किसानों ने इस बार संसद का तीन हफ़्ते का सत्र सिर्फ़ खेती-किसानी पर चर्चा के लिए बुलाने की मांग की है. किसानों ने डॉक्टर, इंजीनियर, वकीलों जैसे एलिट जमातों का समर्थन हासिल किया है.
फ़सल बीमा योजना के नाम पर लूट के नए तरीके पर सवाल उठाए गए और राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा दो साल से किसानों की आत्महत्याओं से जुड़े आंकड़े जारी न करने का सवाल उठाया. ये चीजें हैरान करती हैं, पर सच हैं.
ज़ाहिर है कि राहुल और केजरीवाल के आने की ख़बर ने इन सबको पीछे धकेल दिया. पर उनके आ जाने से किसानों का सवाल कितना आगे बढा? यह सवाल महत्वपूर्ण है.
स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव, जो आयोजकों में प्रमुख थे, का मानना है कि इससे कुछ हासिल नहीं हुआ और न इन नेताओं का नजरिया बदलने वाला है.
लेकिन कल को जब ये सत्ता में आएंगे तो हमारे हाथ में इनसे लड़ने के लिए एक अतिरिक्त हथियार ज़रूर होगा.
योगेंद्र मानें, न मानें पर इन नेताओं के जमावड़े ने ही इस बार के किसान रैली को चर्चा में ला दिया.
किसान परेशान, फिर भी सत्तासीन मग्न, क्यों?
दिल्ली में ही इस साल कई किसान आंदोलन हुए. कोलकाता में तो दिल्ली वाले दिन ही आयोजन हुआ.
मुंबई में हफ़्ते भर पहले किसान जुटे थे और महाराष्ट्र सरकार ने सारी मांगें मानकर उन्हें उसी दिन वापस कर दिया. ऐसा ही वो फ़रवरी में भी कर चुके थे.
दूसरी ओर किसानों का ग़ुस्सा अव्यवस्थित ढंग से भी फूट रहा है. जगह-जगह दूध-सब्ज़ी-अनाज फेंकना, हंगामा करना आम है, क्योंकि किसान ज़्यादा पैदावार से भी परेशान हैं, उसका लागत खर्च भी वापस नहीं आ रहा है.
खेती अलाभकर बन गई है. मंदसौर जैसे कई स्थानों पर तो किसानों पर गोलियाँ चली हैं. क़र्ज़ से किसान आत्महत्या कर रहे हैं, क़ीमत मांगते हुए मर रहे हैं.
किसान सचमुच इतना परेशान हैं कि कई लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली है.
दूसरी ओर यह भी हो रहा है कि सबसे बड़े जमात की इस हालत के बावजूद पार्टियाँ और नेता दोबारा चुनाव जीत कर आ रहे हैं. अर्थात किसान अपनी दुर्गति भूलकर नेताओं के कहे से जाति-धर्म के आधार पर वोट दे रहे हैं.
इस बार कुछ स्थिति बदलती लग रही है. भारी लोकप्रियता से सत्ता में आई नरेंद्र मोदी की सरकार भी किसानों और बेकार नौजवानों से डर रही है. हर कहीं से यही रिपोर्ट है.
शायद यही कारण है कि 200 संगठनों की भागीदारी के बावजूद कुछ हज़ार ही किसान जमा हुए पर सारे विपक्षी नेता लाइन लगाकर हाज़िर हो गए.
योगेन्द्र से केजरीवाल और राहुल के रिश्तों में कोई बदलाव हुआ हो या नहीं, विपक्ष को अगर किसानों के माध्यम से अपने लिए कोई अवसर दिखता है तो यह भी एक बदलाव है.
योगेन्द्र और उनके साथी अगर इतना ही कर सकें तो यह भी उनकी एक बड़ी सफलता है.
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(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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