बिहार: आख़िर क्या है नरकंकालों की तस्करी का सच

    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, छपरा से, बीबीसी हिंदी के लिए

"इंसान चाहे जिस भी जाति-धर्म का हो. सबके जीवन के अंत में एक संस्कार होता है, जिससे आत्मा को मुक्ति मिलती है. मानव शरीर को मिट्टी में ही मिल जाना है- चाहे वह किसी क़ब्र में दफ़न होकर मिट्टी बने या आग में ख़ाक हो जाए. इन लोगों ने वो भी नहीं होने दिया. इसलिए ये मामला ज़्यादा संवेदनशील है."

ये कहना है छपरा रेल जीआरपी थाने में डीएसपी तनवीर अहमद जो मोतिहारी के संजय प्रसाद और बलिया के अमर कुमार की तरफ़ इशारा कर रहे हैं.

संजय प्रसाद को छपरा रेलवे स्टेशन पर सोमवार को पूछताछ काउंटर के पास एक बैग में रखे 50 नरकंकालों (16 नरमुंड और 34 कंकाल) के साथ गिरफ़्तार किया गया है.

संजय की निशानदेही पर छापेमारी कर बलिया के अमर कुमार को गिरफ़्तार किया गया है. अमर के पास से संजय नरकंकालों को ख़रीद कर ले जा रहे थे.

संजय से पूछताछ में पुलिस को पता चला है कि इन नरकंकालों को सड़क मार्ग से नेपाल और भूटान ले जाने की योजना थी. संजय के पास से एक मोबाइल, 2400 रुपये, दो एटीएम कार्ड, तीन अलग-अलग पहचान पत्र और नेपाल तथा भूटान की मुद्रा मिली है.

अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन

पुलिस का कहना है कि संजय के मोबाइल की जांच से एक गिरोह के बारे में पता चला है और उसके अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन होने के भी सुराग मिले हैं.

मुज़फ़्फ़रपुर ज़ोन के रेल एसपी संजय कुमार ने बीबीसी को बताया, "जीआरपी की स्पेशल टीमें नेपाल और भूटान भी पड़ताल के लिए जाएंगी."

एक स्पेशल टीम मंगलवार को जलपाईगुड़ी के लिए रवाना हुई जहां संजय का परिवार रहता है. इसके अलावा मोतिहारी स्थित उसके पैतृक आवास पर भी रेल पुलिस ने छापेमारी की है. यहां से संजय के चाचा सत्यनारायण साव को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है.

कहां से लाता था नरकंकाल?

इससे पहले 19 अक्तूबर को भी मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर लावारिस हालत में रखे एक बैग में नरकंकाल मिले थे.

रेलवे पुलिस पहले ही इस मामले की जांच कर रही थी. इस बीच छपरा से नरकंकालों की बरामदगी ने सबको चौंका दिया. हालांकि, पुलिस ने इस बार बैग के साथ तस्कर संजय को भी गिरफ़्तार किया.

तनवीर अहमद के मुताबिक़, संजय के मोबाइल से मिले डिटेल के आधार पर इस तस्करी में पहला कनेक्शन बलिया का मिला. पूछताछ में संजय ने बताया कि वह बलिया-सियालदह एक्सप्रेस से छपरा तक आए थे.

पूछताछ के आधार पर पुलिस ने बलिया से अमर कुमार को भी मंगलवार को गिरफ़्तार किया. अमर शवों के अंतिम संस्कार का काम करते हैं.

तनवीर अहमद ने कहा, "पूछताछ में अमर ने माना है कि वह बलिया, बक्सर, छपरा में गंगा के किनारे से सड़े-गले या अधजले शवों से नरकंकाल निकालकर संजय को बेचता था."

एक नरमुंड की क़ीमत 200 रुपये

तनवीर ने कहा कि अमर और संजय से जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक़, "एक इंसानी खोपड़ी की क़ीमत 200 रुपये थी. इसी तरह कंकालों के अलग-अलग दाम तय थे. संजय जिस दाम पर अमर से नरकंकाल ख़रीदता था, उससे छह से सात गुना दरों पर बेचा करता था."

रेलवे पुलिस टीम ने मंगलवार को बलिया, बक्सर और छपरा के गंगा किनारे वाले इलाके के श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों को भी छाना.

तनवीर कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं कि ये लोग उन शवों को भी अपना निशाना बनाते होंगे जो कब्र में दफ़नाए जा चुके हैं. हालांकि, पुलिस को अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं मिला है.

पूछताछ में अमर ने कहा है कि वह उन शवों से कंकाल और नरमुंड निकाल कर लाता है जो नदी में फेंक दिए जाते हैं. लेकिन ऐसे शवों से सही-सलामत कंकाल निकालने की प्रक्रिया जटिल है.

पुश्तैनी काम

पुलिस के लिए इसका पता लगाना बेहद कठिन है कि कंकाल किन शवों से निकाले जाते हैं. क्योंकि पूछताछ में दोनों ने यही कहा है कि वो सड़े-गले शवों से कंकाल निकालते हैं.

रेलवे एसपी संजय कुमार कहते हैं कि "संजय और उसके पश्चिमी चंपारण वाले पैतृक गांव के लोगों से जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक ये उसका पुश्तैनी काम था. उसके पिता बाबूलाल साह और मौसा भी ये काम करते आए हैं."

संजय के चाचा सत्यनारायण साव बताते हैं, "बहुत पहले से इसके पिता ये काम करते आ रहे हैं. जब हम लोगों को पहली बार पता चला तो इतना घिनौना काम करने के कारण हमने उन्हें समाज से निकाल दिया था. इस बात को 14-15 साल हो गए. ये लोग तब से जलपाईगुड़ी में ही रहते हैं. साल भर में एक-आध बार आते हैं."

अधजली लाशों से कैसे निकालते हैं कंकाल?

ये पूछने पर कि क्या संजय ने कभी सत्यनारायण साह से इस मसले पर कभी कोई बात की है?

जवाब में सत्यनारायण कहते हैं, "हां, भतीजा ही है तो बातचीत क्यों नहीं होगी! कई बार हमने उसको समझाया है. उसके पिता को भी समझाया था कि ये सब काम मत करो. लेकिन ये लोग माने तब तो!"

वो कहते हैं, "उसकी पत्नी है. दो बाल-बच्चे हैं. छोटे भाई-बहन हैं, दोनों की शादी होनी अभी बाकी है. कई बार हम लोगों ने कहा कि ऐसे में कौन तुम लोगों से शादी करेगा."

सत्यानारायण बताते हैं, "संजय से एक बार मैंने पूछा था तो उसने बताया था कि नदी में फेंकी गई लाशों को कई दिनों तक पानी में ही बांध कर रखा जाता है. पानी के जीव-जंतु सारा मांस खा जाते हैं. फिर जेठ-बैशाख में नदी का पानी सूखने लगता है तो कंकाल निकाला जाता है. इसके बाद भी अगर किसी कंकाल से मांस ठीक से नहीं निकला हो तो उसे गर्म पानी से साफ़ किया जाता है."

इन नरकंकालों का क्या होता है?

पुलिस की पड़ताल में ये बात भी सामने आई है कि इन नरकंकालों को नेपाल और भूटान में ले जाकर बेचा जाता है और इसके पीछे किसी बड़े गिरोह का हाथ है.

संजय ने पुलिस को बताया है कि वह पूर्वोत्तर राज्यों और नेपाल-भूटान के तांत्रिक गिरोहों के संपर्क में था और वो पहले भी कई बार वहां नरकंकालों की सप्लाई कर चुका है.

तनवीर अहमद कहते हैं, "संजय ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि उसने अब तक हज़ारों नरमुंड और कंकाल बेचे होंगे. यहां तक कि हाल में मुज़फ़्फ़रपुर रेलवे स्टेशन पर मिले नरकंकाल भी उसी के थे. पुलिस की दबिश के कारण वह नरकंकालों को छोड़कर भाग गया था."

पुलिस को संजय के पास से भूटान और नेपाल के बने वोटर आई कार्ड मिले हैं.

संजय के मोबाइल के कॉल डीटेल रिकॉर्ड्स (सीडीआर) के आधार पर अब पुलिस ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि संजय किन लोगों को नरकंकाल सप्लाई करता था और इसका क्या इस्तेमाल होता है.

नरकंकालों की सप्लाई

मामले की तफ़्तीश कर रही रेलवे पुलिस का कहना है कि नरकंकालों की सप्लाई सड़क मार्ग से नेपाल और भूटान में की जाती है. गिरफ़्तार तस्कर ने भी पूछताछ में इसी बात को स्वीकारा है. उसके सीडीआर के बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंक भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं.

इसके पहले गोरखपुर से साल 2015 में और बक्सर से इसी साल फरवरी में भारी मात्रा में नरंककालों की बरामदगी हो चुकी है. इसके अलावा दिघवारा और मुज़फ़्फ़रपुर में भी नरकंकाल मिले हैं. पुलिस को संदेह है कि इन सभी मामलों में संजय और उसके गिरोह के लोगों की संलिप्तता हो सकती हैं.

छपरा रेल पुलिस का कहना है कि संजय बिहार और उत्तर प्रदेश से नर कंकाल उठाता था. ट्रेन के जरिए जलपाईगुड़ी स्थित अपने घर ले जाता था. फिर वहीं से सड़क मार्ग के जरिए नेपाल और भूटान में सप्लाई किया करता था.

तस्कर संजय के पास से बरामद आधार कार्ड पर जलपाईगुड़ी का ही पता लिखा हुआ है. रेल पुलिस की एक टीम जांच के लिए जलपाईगुड़ी पहुंच भी चुकी है.

लेकिन वहां के एसपी अमिताभ मैती बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि, "ऐसा मामला इससे पहले कभी नहीं आया है. यदि वाकई छपरा रेल पुलिस को ऐसे लीड्स मिले हैं तो इसकी जांच होनी चाहिए. मुझे अभी तक इस मामले की जानकारी नहीं थी. छपरा रेल पुलिस से अपडेट लेकर हम इसका पता लगाएंगे."

उधर जलपाईगुड़ी पहुंची रेल पुलिस की एक टीम ने पता लगाया है कि वहां भी पिछले साल जयगांव थाने में नरंककालों के मिलने का मामला दर्ज हुआ था. मगर तब पुलिस की उतनी दबिश नहीं बन पायी थी और आगे पड़ताल नहीं हुई.

मुज़फ़्फ़रपुर के रेल एसपी संजय कहते हैं, "तस्कर ने खुद ही सबकुछ स्वीकार किया है. हमनें भी पता लगा लिया है कि वहां जयगांव में ऐसा मामला आया था, हालांकि, पुलिस ने उतनी तफ़्तीश नहीं की और मामला दब गया. हमारी पड़ताल में संजय से उसके तार भी जुड़े हुए मिले हैं."

नर कंकालों का होता क्या था?

इसके जवाब में रेलवे एसपी कहते हैं, "हमारी पड़ताल में ये बात सामने निकल कर आयी है कि नर कंकालों का इस्तेमाल उन देशों में धार्मिक कार्यों/मान्यताओं में किया जाता था. नेपाल और भूटान जैसे देशों में शवों को पूरी तरह से जला देने की प्रथा है. वहां अस्थियों और कंकाल जैसा कुछ भी शेष नहीं बचता. इसलिए वहां के रिचुअल्स में ये नरकंकाल काफी महत्वपूर्ण है."

वो कहते हैं, "वहां के लोगों के लिए यह पूजनीय है. तस्कर के सीडीआर लिंक से भी जो भी कनेक्शन मिले हैं वो यही कहते हैं कि इन नरमुंडों और कंकालों की सप्लाई तांत्रिक क्रियाओं के लिए होनी थी."

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