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नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री के कश्मीर दौरे से उठी उम्मीदें
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर, जम्मू कश्मीर से
पिछले हफ़्ते नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री जेल मेग्ने बोंडविक भारत प्रशासित कश्मीर घाटी और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के दौरे पर गए थे.
उनके इस अचानक दौरे से जहाँ कई लोग आश्चर्य में हैं वहीं उनका उत्साह भी बढ़ा है. लेकिन उनके दौरे के बाद सवाल भी उठ रहे हैं.
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला इसे एक महत्वपूर्ण घटना मानते हैं.
ये बात और है कि उन्हें इस दौरे की ख़बर अख़बारों से मिली है. उन्होंने बीते मंगलवार को ट्विटर पर भारत सरकार से इस दौरे के बारे में पूरी जानकारी मांगी. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने इस पहल का स्वागत भी किया.
बाद में बीबीसी से एक ख़ास मुलाक़ात में अब्दुल्ला ने कहा, "हम पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं (कि उन्हें यहाँ किसने भेजा) लेकिन खिचड़ी तो पकनी चाहिए."
"केंद्रीय सरकार हुर्रियत कांफ्रेंस से बात नहीं कर रही, उन्होंने उसे अलग-थलग कर रखा है. अगर इससे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बातचीत के लिए मेज़ पर लाने में कामयाबी मिलती है तो सभी को इसका स्वागत करना चाहिए."
'केंद्र की मर्ज़ी के बग़ैर दौरा मुमकिन नहीं'
बोंडविक का दौरा अचानक ज़रूर था लेकिन ख़ुफ़िया नहीं था क्योंकि इस दौरे के बाद हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने इस पर एक बयान जारी किया और बोंडविक के साथ हुर्रियत के नेताओं की एक तस्वीर भी सार्वजनिक की गई.
सियासी गलियारों में ये भी सवाल किए जा रहे हैं कि नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री को निमंत्रण किसने दिया? ये पहल किसकी है? मीरवाइज़ के अनुसार, उन्हें बोंडविक के यहाँ आने से केवल एक दिन पहले मुलाक़ात की दावत दी गई.
उमर अब्दुल्ला के मुताबिक़ केंद्र की मर्ज़ी के बग़ैर ये दौरा मुमकिन नहीं. वह कहते हैं, "हमें तो मान के चलना चाहिए कि केंद्रीय सरकार की इजाज़त के बग़ैर नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री यहाँ नहीं आ सकते."
उधर भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता अशोक कौल कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि ये केंद्र या बीजेपी की पहल है.
यहाँ के सियासी हलक़ों में खबर ये है कि 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' के गुरु श्री श्री रविशंकर इस दौरे के पीछे हैं. अशोक कौल ने इस संभावना से इनकार नहीं किया.
उनके अनुसार श्री श्री रविशंकर पहले भी कश्मीर में मध्यस्थता की कोशिश कर चुके हैं. साथ में उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि उनकी सरकार विदेशी मध्यस्थता स्वीकार करेगी.
वे कहते हैं, "लेकिन देखिये क्या निकल कर आता है? अभी कुछ भी कहना मुश्किल है"
उम्मीद की किरण
नॉर्वे के पूर्व मुख्यमंत्री से अपनी मुलाक़ात के बाद अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री से क्या कहा.
उन्होंने बोंडविक से कहा, "आपका सबसे बड़ा योगदान ये होगा कि आप भारत और पाकिस्तान को बातचीत के लिए एक टेबल पर ले कर आएं. कश्मीर के लोग शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में पूरा साथ देंगे."
मीरवाइज़ ने उन्हें बताया कि भारत बातचीत के लिए बिलकुल तैयार नहीं नज़र आता.
वे बताते हैं, "इसलिए हम ने उनसे कहा कि कोई तीसरा पक्ष आए, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता हो तो हम इसका स्वागत करेंगे."
भारत सरकार अब तक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के पक्ष में नहीं रही है. केंद्र ने अलगावादी नेताओं से आख़िरी बार बातचीत 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासनकाल में की थी लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकल पाया.
2016 में एक मुठभेड़ में हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से कश्मीर घाटी में हिंसा की वारदातें कई गुना बढ़ी हैं. सुरक्षा कर्मियों और चरमंथियों के बीच पिछले दो हफ़्तों से कई मुठभेड़ हुई हैं, जिन में 20 से अधिक चरमपंथी और कई सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं.
उमर अब्दुल्ला कहते हैं कि कश्मीर में हालात गंभीर हैं.
ऐसे बिगड़ते माहौल में सभी पक्ष बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने का समर्थन में नज़र आते हैं. इसलिए नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री के दौरे से यहाँ के लोगों में उम्मीद की एक नई किरण जागी है.
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