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क्या विवादित बयानों से सवर्णों के करीब जाएगी कांग्रेस?
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राहुल गांधी के 'आदेश' के बाद नाथद्वार से पार्टी उम्मीदवार और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सीपी जोशी ने अपने जातिवादी बयान के लिए माफी मांग ली है.
लेकिन जो सवाल वीडियो के सामने आने के बाद शुरू हुए थे वो इतनी जल्दी थमेंगे नहीं, बल्कि उसने कई पुराने सवालों को फिर से बहस में ला दिया है.
दशकों तक धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले कांग्रेस को लेकर हाल में ये प्रश्न बार-बार उठते रहे हैं कि क्या वो सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति खेल रही है? और, क्यों?
लेकिन नया सवाल ये है कि 'ब्राह्मण ही ज्ञानी' वाला बयान कहीं किसी ख़ास मक़सद को ध्यान में रखकर तो नहीं दिया गया!
ऐसे बयान का मकसद
इस सवाल के पीछे कुछ अहम वजहें भी हैं, दरअसल ब्राह्मणवाद पर कांग्रेस पार्टी के किसी नेता का ये पहला बयान तो है नहीं - चंद दिनों पहले पूर्व कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर जारी एक बहस में ब्राह्मणों की तुलना यहूदियों से की - यहूदी जिनका दूसरे विश्व युद्ध के आसपास बड़े-पैमाने पर नरसंहार किया गया था.
कारवान पत्रिका के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल कहते हैं कि इन बयानों में धर्म की राजनीति के साथ-साथ सवर्णों को कांग्रेस की तरफ़ वापस खींचने की पालटिक्स भी शामिल है,
वे कहते हैं, "अगर आप 2014 चुनाव के रिज़ल्ट की तरफ़ ध्यान दें तो सबसे ज़्यादा जिस वोट बैंक में एकजुटता आई है, वो है सवर्णों का वोट जो बीजेपी के पक्ष में गया है."
सवर्ण वर्ग में शामिल ब्राह्मण और राजपूत वोटबैंक एक समय कांग्रेस के मज़बूत गढ़ माने जाते थे.
क्या कहा सीपी जोशी ने?
राहुल गांधी के क़रीबी माने जानेवाले सीपी जोशी ने एक चुनावी सभा में कहा, "इस देश में धर्म के बारे में कोई जानता है तो पंडित जानते हैं. विद्वान, पंडित, ... ब्राह्मण. ये अजीब देश हो गया है, यहां उमा भारती लोधी समाज की हैं वो हिंदू धर्म की बात कर रही हैं. साध्वी जी किसी धर्म की हैं वो हिंदू धर्म की बात कर रहे हैं, नरेंद्र मोदी जी किसी धर्म के हैं वो हिंदू धर्म की बात कर रहे हैं. ब्राह्मणों का काम नहीं है. ब्राह्मण तो समझते ही नहीं है. पचास साल में इनकी अक़्ल बाहर निकल गई."
सीपी जोशी के इस वीडियो को ट्वीट किया बीजेपी युवा मोर्चा नेता हर्ष सांघवी ने, साथ ही ये भी लिखा 'दरअसल संदेश ये दिया जा रहा है कि नीची जाति से तालुक्क़ रखनेवाले नरेंद्र मोदी को धर्म के बारे में क्या मालूम?'
हालांकि कांग्रेस जनरल सेक्रेटरी शकील अहमद इस बात से इंकार करते हैं कि जोशी का बयान किसी भी तरह पार्टी की राजनीति का हिस्सा था और कहते हैं कि अगर ऐसा होता तो राहुल गांधी सीपी जोशी से अपने बयान पर खेद प्रकट करने को नहीं कहते. मगर उनका कहना है कि मनीष तिवारी का बयान एक अलग संदर्भ में था.
शकील अहमद कहते हैं "किसी भी जाति को, किसी भी समुदाय को अगर टार्गेट किया जाएगा तो उसको बुरा लगेगा, इसका बुरा तो पूरे समाज को लगना चाहिए, ख़ासकर कोई अगर उस समाज का है तो उसको और बुरा लगता है,"
शकील अहमद कहते हैं कि सीपी जोशी और मनीष तिवारी के बयान को साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए.
शकील अहमद भले ही कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति से इंकार कर दें लेकिन लोग राहुल गांधी की शिव भक्ति पर कांग्रेस के बयानों का, कांग्रेस अध्यक्ष के उज्जैन, मानसरोवर और केदारनाथ की यात्राओं का जिसके प्रचार में पार्टी ने शायद ही कोई कसर छोड़ी हो उसके उदाहरण देते रहते हैं.
राजनीतिक विश्लेषक भारत भूषण कहते हैं कि इसे पार्टी द्वारा अपनी छवि बदलने की कोशिश के तौर पर देखा जाना चाहिए, "बीजेपी ने जो भ्रांति फैलाई है कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है, जिसे कुछ लोग सच मानने लगे हैं, कांग्रेस ने उसको तोड़ने के लिए इस सॉफ्ट हिंदूत्व की रणनीति अपनाई है."
गुजरात चुनाव के दौरान भी कांग्रेस ने कुछ यही रणनीति अपनाई, हालांकि वो बीजेपी को वहां हरा नहीं पाई, लेकिन मोदी के व्यक्तित्व के बावजूद पार्टी को वहां भारी क्षति हुई.
कर्णाटक में भी कांग्रेस अध्यक्ष ने मठों और मंदिरों के चक्कर काटने में कसर नहीं छोड़ी.
'कांग्रेस जाल में फंस रही'
भारत भूषण कहते हैं, "बीजेपी जाल बिछा रही है और कांग्रेस उसमें फंसती जा रही है क्योंकि वो इस गेम की माहिर नहीं. उसे ये खेल बीजेपी के पाले में खेलना होगा जिसके नियम बीजेपी/आरएसएस तय करेंगे."
वहीं हरतोष बल कहते हैं कि कांग्रेस शायद आश्वस्त है कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुसलमानों का वोट उसी के खाते में जाएगा तो अब अधिक से अधिक वोट को अपने पक्ष में किया जाए.
बल का कहना है कि कांग्रेस बहुत ख़तरनाक रास्ते पर चल रही है, "कांग्रेस को ये समझ में नहीं आ रहा है कि इसी कारण उसे आदिवासियों ने छोड़ा है, दलितों ने छोड़ा है, या तो उनकी अपनी अलग जमायतें बन गई हैं या वो बीजेपी की तरफ़ बढ़ गए हैं. मुसलमानों को भी जहां मौक़ा मिल रहा है जैसे यूपी, बिहार में, वहां वो कांग्रेस को छोड़कर कहीं और वोट दे रहे हैं."
हिंदू वोटरों की तरफ़ कांग्रेस का झुकाव हालांकि बहुत नया हो ऐसी बात नहीं है. चाहे इंदिरा गांधी का वो भाषण हो जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की भावनाओं का आदर करने की बात कही थी.
या, फिर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के शासनकाल में ही रातोंरात बाबरी मस्जिद में राम लला की मूर्ति का होना. या फिर, नरसिंह राव के कार्यकाल में बाबरी मस्जिद का विध्वंस और उनका साधू-संतों को बातचीत के लिए विमान द्वारा अयोध्या से दिल्ली बुलवाना.
1984 के सिख दंगे और फिर कांग्रेस की जीत को भी जानकारों ने बहुसंख्यकों के मन में एक अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति डर की भावना जगाने से जोड़कर देखा है.
हरतोष बल कहते हैं कि चुनाव से महीने भर पहले हुए प्रचार में तो यहां तक कहा गया कि जब आप अपने टैक्सी ड्राइवर पर भरोसा नहीं कर सकते तो किसपर करेंगे? बस इस बार टार्गेट मुसलमान नहीं सिख थे और आरएसएस द्वारा कांग्रेस को समर्थन की बात तो कई जगह कही गई है.
लेकिन गांधीवादी समाजवाद को ध्यान में रखकर 1980 में अटल बिहारी द्वारा बनाई गई बीजेपी में फिर ज़बरदस्त बदलाव आया और फिर राम मंदिर आंदोलन के बलबूते पार्टी आगे को बढ़ गई.
कई जगह ख़बरे हैं कि कभी राहुल गांधी के क़रीबी बताये जाने वाले सीपी जोशी ने ये भी कहा है कि वो राजीव गांधी ही थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया और वहां पूजा-अर्चना किए जाने की छूट दी इसलिए राम मंदिर का निर्माण भी कांग्रेस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में ही होगा.
यानी राजनीति राम के नाम की.
पर शायद कांग्रेस को याद नहीं कि 1984 में जो बीजेपी महज़ दो सीटों पर थी, वो राममंदिर आंदोलन के बाद 1989 में 88 पर पहुंच गई और 2014 के बाद से अपने दम-ख़म पर केंद्र में सत्ता में मौजूद है और देश के कम से कम 11 राज्यों उसकी अपनी सरकारें हैं और कई अन्य में वो सत्ता में साझीदार है.
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