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ख़तों में छिपे यादों के बेशकीमती ख़ज़ाने
- Author, फिओना मैकडोनल्ड्स
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
तकनीक ने हमारी ज़िंदगी को बहुत आसान बनाया है. लेकिन इसी तकनीक ने हम से हमारी बहुत सी कलाएं छीन ली हैं जिनमें से एक कला है लेखनी की.
एक दौर था जब लेखनी कला की प्रतियोगिताएं आयोजित होती थीं. दिग्गज किसी का लिखा देखकर उसके पूरे मिज़ाज और किरदार का अंदाज़ा लगा लेते थे. लेकिन आज लोगों ने क़लम तक साथ रखना छोड़ दिया है. क्योंकि तकनीक ने इसकी ज़रूरत ही ख़त्म कर दी है.
दुनिया के कई फ़नकारों ने अपने हाथों से क़लमबद्ध वाक्यों पर अपने दस्तख़त किए. आज भी जब उनकी पांडुलिपियों, ख़तों और लिखे हुए नस्र-नज़्म को छूते हैं, तो लगता है हमने उस शख़्स को छू लिया.
काग़ज़ के इन टुकड़ों पर किसी की ज़िंदगी के कुछ लम्हे आज भी ठहरे हुए हैं. लेकिन वक़्त के साथ ये नायाब चीज़ें खोती चली गईं. हम ये भूल गए कि इन्हीं लाइनों में पूरा इतिहास सिमटा है जो हमारी लापरवाही से तबाह हो रहा है.
ब्राज़ील के पेड्रो कोर्रे डो लागो कला के शैदाई हैं और इसके इतिहासकार भी. उन्होंने दुनिया भर से इन हस्तलिपियों और ख़तों का सबसे बड़ा निजी ख़ज़ाना जमा किया है. उन्हें हाथ से लिखी इन पांडुलिपियों में भरे जज़्बात का अच्छे से एहसास है. लागो इनके महत्व को समझते हैं. इसीलिए उन्होंने दुनिया भर से लगभग तमाम बड़े कलाकारों और फ़नकारों के हाथ से लिखे खतों का संग्रह किया है.
1153 ईस्वी से लेकर मौजूदा दौर तक की कला, साहित्य, इतिहास, विज्ञान, संगीत और मनोरंजन जगत की कई बड़ी हस्तियों के लिखे क़रीब पांच हज़ार ख़त उनके पास मौजूद हैं और इन्होंने इसे एक किताब की शक्ल दी है जिसका नाम है 'द मैजिक ऑफ़ हैंडराइटिंग'.
क्या है ख़तों में
ख़तों के इस संग्रह में माइकल एंजेलो, हेनरी दी टॉलूस लॉटरे का पहला और आखिऱी ख़त शामिल है.
साथ ही इंग्लैंड के कवि पी बी शेली की पत्नी मेरी शेली का वो ख़त भी है जो उन्होंने अपने पति की मौत के कुछ दिन बाद लिखा था. इस ख़त में वो इटली के प्रशासन से उस नाव के लिए फ़रियाद कर रही हैं जिसमें वो डूबे थे.
इसके अलावा मशहूर संगीतकार मोज़ार्ट का वो ख़त भी है जिसमें उन्होंने अपने पिता को लिखा था कि वो अपने से छोटी उम्र की एक गायिका के साथ इश्क़ फ़रमा रहे हैं. ये ख़त उनके पिता के लिए चिंता पैदा करने वाला था क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि वो सिर्फ़ संगीत पर ही ध्यान दें.
पेड्रो कोर्रे डो लागो का कहना है कि इतिहास की किताबों में हम जो कुछ पढ़ते हैं वो एक तीसरे शख़्स का नज़रिया होता है लेकिन जब इन ख़तों को पढ़ते हैं तो लगता है हम उसी दौर में पहुंच गए हैं. और इन ख़तों से जो इतिहास हमें पता चलता है उसमें कोई लाग लपेट नहीं होती. चंद शब्दों में हमें उस शख़्स की वो बातें पता चल जाती हैं जो किसी और को पता नहीं होतीं.
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(यह लेख बीबीसी कल्चर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी कल्चरके दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)
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