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पंजाब : अमृतसर हमले से उठे 5 सवाल और उनके जवाब
- Author, खुशहाल लाली/ अरविंद छाबड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पंजाब में सिखों के सबसे प्रमुख धार्मिक शहर अमृतसर से क़रीब दस किलोमीटर दूर एक गांव में स्थित निरंकारी भवन पर हुए संदिग्ध चरमपंथी हमले में तीन लोग मारे गए हैं और कम से कम 19 घायल हुए हैं.
ये हमला रविवार को सत्संग के दौरान हुआ. हमले के दौरान वहां सैंकड़ों लोग मौजूद थे. अभी तक किसी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है.
पढ़िए इस हमले के बाद उठे पांच सवाल और उनके जबाव
अमृतसर हमले के पीछे कौन?
चश्मदीदों के मुताबिक दो नकाबपोश हमलावर मोटरसाइकिल पर आए. उनमें से एक ने निरंकारी मिशन भवन के गेट पर तैनात सेवादार पर पिस्तौल तानी और दूसरा भवन के अंदर चला गया.
भवन में साप्ताहिक सत्संग चल रहा था. हमलावर ने मंच की ओर ग्रेनेड फेंका जिसके धमाके में तीन लोग मारे गए और 19 घायल हो गए.
चश्मदीदों के मुताबिक हमलावर ने चेहरे पर नक़ाब और सिर पर कपड़ा बांधा हुआ था. वो पंजाबी भाषा बोल रहे थे.
पंजाब पुलिस के डीजीपी का कहना है कि हमले की जांच 'आतंकवादी घटना के तौर पर की जा रही है'.
पुलिस ने किसी संगठन या समूह का नाम नहीं लिया है. अभी तक किसी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी भी नहीं ली है.
क्या पंजाब में बढ़ रही है हिंसा?
पिछले हफ़्ते ही पंजाब पुलिस ने चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े 6-7 संदिग्धों के प्रदेश में दाखिल होने की अफ़वाह के बाद अलर्ट जारी किया था.
ये अलर्ट जारी किए जाने के बाद से प्रदेश भर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी और हर नाके पर जांच की जा रही थी.
हाल ही में जालंधर के मकसूदां पुलिस थाने पर भी हमला हुआ था. पुलिस का कहना है कि इस हैंड ग्रेनेड हमले में चार लोग शामिल थे.
इस संबंध में पुलिस ने कुछ कश्मीरी छात्रों को हिरासत में भी लिया है.
इसके पहले पंजाब में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई कार्यकर्ताओं और एक ईसाई पादरी की भी हत्या की जा चुकी है.
इन मामलों की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) कर रही है. इन मामलों में प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन खालिस्तान लिब्रेशन फ़ोर्स से जुड़े लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है.
इसके अलावा 2016 में पठानकोट एयरबेस और 2015 में गुरुदासपुर के दीनानगर पुलिस थाने पर भी चरमपंथी हमले हो चुके हैं.
2017 में पंजाब में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बठिंडा ज़िले के क़स्बा मोड़ में हुए बम धमाके में पांच लोगों की मौत हुई थी.
हाल ही में भारतीय सेना के प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि पंजाब में 'चरमपंथ का तुरंत कोई ख़तरा नहीं है लेकिन चौकस रहने की ज़रूरत है'.
विदेश में रह रहे पंजाबी मूल के खालिस्तानी विचारधारा से जुड़े लोगों ने 2020 में पृथक खालिस्तान राष्ट्र के मुद्दे पर जनमतसंग्रह कराने के लिए अभियान चलाया हुआ है.
जनरल रावत का कहना था कि पंजाब और केंद्र सरकार इसे लेकर चिंतित हैं और किसी भी तरह की हिंसा को रोकने के लिए हर समय तैयार हैं.
क्या है सिख निरंकारी विवाद?
मौजूदा निरंकारी मिशन की शुरुआत 1929 में सिख धर्म के भीतर एक पंथ के तौर पर हुई थी लेकिन बाद इस मिशन ने सिख धर्म की गुरुग्रंथ साहिब को गुरू मानने की परंपरा को तिलांजलि देते हुए व्यक्ति को गुरू मानने की परंपरा पर ज़ोर दिया.
पंजाब यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर और विश्व पंजाबी केंद्र के निदेशक डॉक्टर बलकार सिंह बताते हैं, "सिख गुरू ग्रंथ साहिब को अपना गुरू मानते हैं और किसी व्यक्ति को अपना गुरू नहीं मानते हैं. सिखों की तरह ही निरंकारी भी गुरू ग्रंथ साहिब की शिक्षा में विश्वास रखते हैं लेकिन उनका मानना है कि इसे समझाने के लिए उन्हें किसी व्यक्ति की ज़रूरत है और ये ही उनके प्रमुख या गुरू होते हैं.."
इस मिशन के गुरू बाबा अवतार सिंह द्वारा रचित वाणी को अवतारवाणी का नाम दिया गया. सिख विद्वानों का आरोप है कि इसमें सिख संकल्प के साथ छेड़छाड़ की गई है.
विचारधारा का यही मतभेद 1978 में हिंसक हो गया और अमृतसर में निरंकारी मिशन के कार्यक्रम का विरोध कर रहे सिखों पर हुई गोलीबारी के दौरान 16 लोग मारे गए.इनमें से तीन निरंकारी थे और 13 सिख संगठनों के कार्यकर्ता.
सिखों ने इस पूरे घटनाक्रम का दोष तत्कालीन निरंकारी मिशन के प्रमुख गुरबचन सिंह को माना और सिख कार्यकर्ता रणजीत सिंह और उसके साथियों ने 24 अप्रैल 1980 में गुरबचन सिंह की हत्या कर दी.
इस घटना के बाद पंजाब आतंकवाद के दौर में ऐसा दाख़िल हुआ कि अगले डेढ़ दशक तक पंजाब के लोग हिंसा का निशाना बनते रहे.
इस हाई प्रोफ़ाइल मामले में दमदमी टकसाल के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाला की भी गिरफ़्तारी हुई थी. लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया.
इस मामले में रणजीत सिंह को उम्रक़ैद की सज़ा हुई जिसे बाद में राष्ट्रपति ने माफ़ किया और कई वर्षों की सज़ा भुगतने के बाद रणजीत सिंह रिहा हुए और अकाल तख़्त के जत्थेदार बने.
निरंकारी अपने आप को सिख धर्म से अलग मानते हैं और सिखों की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था अकाल तख़्त द्वारा निरंकारियों का बहिष्कार किया गया है.
क्या ये हमला निरंकारियों-सिखों का टकराव है?
अभी तक इसके कोई संकेत नहीं मिले हैं और न ही पुलिस ने अब तक की जांच के हवाले से ऐसा कोई दावा किया है.
1978 के बाद से कभी भी निरंकारियों और सिखों के बीच कोई हिंसक घटना नहीं हुई है. दोनों ही संप्रदायों की ओर से आपसी मतभेद को पाटने की कोशिशें होती रही हैं.
पंजाब की राजनीति पर क्या होगा असर?
इस हमले से सत्ताधारी कांग्रेस की प्रशासनिक क्षमताओं पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह पर विपक्ष पहले ही पंजाब में अकाली दल के प्रभाव को ख़त्म करने के लिए गरमदलीय नेताओं को उत्साहित करने का आरोप लगाता रहा है.
पंजाब में सिख मुद्दों पर सियासत करने वाली मुख्य पार्टी अकाली दल अब हाशिए पर चली गई है. भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करके जो अकाली दल पंजाबी पार्टी कहला रहा था उसने दोबारा सिख मुद्दों को ज़ोर शोर से उठाना शुरू कर दिया है. इस हमले के बाद अकाली दल को कांग्रेस पर सवाल उठाने का भी मुद्दा मिल गया है.
आंतरिक सुरक्षा का सवाल अब और गंभीर हो गया है. ऐसे में आम आदमी से जुड़े अन्य मुद्दों के दबने की संभावना है. पंजाब के लोग पहले ही हिंसा का निशाना बन चुके हैं और वो अब हिंसा के उस दौर में दोबारा नहीं लौटना चाहेंगे जो 1990 के दशक में ख़त्म हो गया है. लेकिन पंजाब में गरम मुद्दों को उठाने की सियासत भी चल रही है.
हमले के बाद ट्वीट करते हुए पंजाब में विपक्ष की नेता और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने ट्वीट किया, "पहले बम और अब अमृतसर में ग्रेनेड हमला. आगे क्या होगा राजा साब? आप और आपके मंत्री मुश्किल से हासिल की गई शांति में खलल डालने वाले को प्रोत्साहित करना कब बंद करेंगे? राजनीति छोड़िए और सुशासन के लिए गंभीर हो जाइए. पंजाबी फिर से काले दौर में वापस लौटना नहीं चाहते हैं."
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