क्या नोटबंदी ने वाक़ई माओवादियों की कमर तोड़ दी: ग्राउंड रिपोर्ट

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, छत्तीसगढ़ से

ऑपरेशन 'ग्रीन हंट' संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के शासनकाल में शुरू किया गया था, जब पी चिदंबरम गृहमंत्री थे.

इस अभियान के तहत नक्सल प्रभावित राज्यों में बड़े पैमाने पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती हुई. सुदूर इलाक़ों में कैंप लगाए गए.

फिर भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद सुरक्षा बलों की संख्या में बढ़ोतरी कर दी गई.

इस साल अप्रैल माह में केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा ने दावा किया कि पूरे भारत में माओवाद या नक्सलवाद से 'पूरी तरह प्रभावित' सिर्फ 30 ज़िले बचे हैं, जबकि नक्सल प्रभावित 44 ऐसे ज़िले हैं जहां से नक्सलवाद पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया है.

उनका ये भी दावा था कि ऐसा इसलिए संभव हो पाया क्योंकि सरकार ने इन इलाकों के लिए नई योजना शुरू की है जिसे 'सिक्योरिटी रिलेटेड एक्स्पेंडीचर' यानी एसआरई योजना कहा जाता है.

माओवादी हिंसा में 20 फीसदी गिरावट: सरकार

इस योजना के तहत नक्सल विरोधी अभियान और नक्सल प्रभावित इलाक़ों के लिए संचार माध्यमों को विकसित करने और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए भत्ते का प्रयोजन किया गया है. यह भत्ता केंद्र सरकार राज्यों को देती है. इसके तहत नक्सल प्रभावित इलाक़ों में तैनात सुरक्षा बलों और थानों के लिए भी धन का आवंटन किया जाता है.

इससे पहले यूपीए शासनकाल में भी जो योजना शुरू की गई थी उसका नाम था 'इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान' (आईएपी) जिसे ख़त्म करके नई योजना लाई गई है.

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, अब सिर्फ़ 90 ज़िले हैं जहां माओवादी सक्रिय हैं. मंत्रालय के मुताबिक, पिछले चार साल में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है जबकि हिंसा की वजह से हुई मौतों में भी 2013 के मुक़ाबले 2017 में 34 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है.

भारतीय जनता पार्टी दावा करती रही है कि माओवादी गतिविधियों में आई कमी का बड़ा कारण नोटबंदी है.

प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और भारतीय जनता पार्ट के नेता विभिन्न मंचों से इसे लेकर बोलते रहे हैं और दावा करते रहे हैं कि नोटबंदी ने माओवादियों की कमर तोड़कर रख दी है.

तो क्या नोटबंदी ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है? क्या माओवादी वाक़ई कमज़ोर हुए हैं? क्या माओवादी हिंसा में कमी आई है? क्या माओवादी हिंसा में मरने वालों की संख्या भी घटी है?

नोटबंदी का कितना असर?

माओवादियों ने अपनी ओर से कभी ऐसा संकेत नहीं दिया कि नोटबंदी से उनके लिए धन की उपलब्धता घटी है, बल्कि उन्होंने कई तरीक़ों से इसे ख़ारिज़ करने की कोशिश ज़रूरी की है.

माओवादियों के फेंके एक पर्चे में दावा किया गया कि साल 2014 से अब तक माओवादी संगठन जेल में बंद अपने साथियों के कानूनी ख़र्च पर 77 लाख 26 हज़ार 700 रुपए ख़र्च कर चुके हैं.

पुलिस अधिकारियों ने इस तरह के पर्चे पाए जाने की बात तो की है मगर उनका कहना है कि वे उनकी विश्वसनीयता जांच रहे हैं.

आंकड़े बताते हैं कि इस साल माओवादी हिंसा में मारे जाने वाले आम लोगों की संख्या पांच साल में सबसे ज्यादा रही है.

'साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल' ने सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण किया है, जिसके मुताबिक:

  • 2013 में कुल 128 लोग मारे गए थे जिनमें 45 सुरक्षाबलों के जवान, 35 माओवादी छापामार और 48 आम नागरिक शामिल थे. यानी इस हिंसा में ज्यादा नुकसान आम लोगों का हुआ था.
  • 2014 में सुरक्षा बलों को ज़्यादा नुकसान झेलना पड़ा. इस साल माओवादी हिंसा में 55 जवानों की मौत हुई, जबकि 25 आम नागरिक और 33 माओवादी भी मारे गए.
  • 2015 में 45 माओवादी, 41 सुरक्षाकर्मी और 34 आम नागरिक मारे गए.
  • 2016 में हुई मुठभेड़ों में मारे जाने वाले माओवादियों की संख्या 133 बताई जाती है जबकि 36 सुरक्षाकर्मी और 38 आम नागरिक मारे गए.
  • 2018 के सितम्बर महीने तक 48 आम नागरिक अब तक माओवादी हिंसा में मारे जा चुके हैं जो बीते पांच सालों में सबसे ज़्यादा है.

माओवादी हिंसा का सबसे गहरा दंश झेलते रहे सुकमा के चिंतलनार के रहने वाले एक ग्रामीण गोपाल (बदला हुआ नाम) कहते हैं, "नोटबंदी ने माओवादियों की कमर तोड़ी है या नहीं, सरकार और माओवादियों के बीच पिसकर आदिवासी ग्रामीणों की कमर ज़रूर टूट गई है."

चिंतलनार वही इलाक़ा है जहां 2010 में माओवादी हमले में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 78 जवान मारे गए थे. ये वही जगह है जहां माओवादियों ने सुकमा के ज़िला अधिकारी एलेक्स पॉल मेनन को अगवा कर रखा था.

आज भी चिंतलनार और जगरगुंडा के बीच आवाजाही मुश्किल है.

गोपाल और चिंतलनार के नागरिक बताते हैं कि इस टूटे-फूटे रास्ते पर एक ही सवारी बस चलती है. अगर बस ख़राब हो गई तो लोगों को रास्ते में ही रुकना पड़ता है.

अंदरूनी इलाक़ों में रहने वालों के लिए हालात ज़्यादा अच्छे नहीं हो पाए हैं. ये इलाक़े जैसे थे, वैसे ही हैं.

माओवादी हिंसा में तेज़ी?

मगर नक्सल विरोधी अभियान में शामिल पुलिस अधिकारियों का दावा है कि छत्तीसगढ़ में चुनावों से ठीक पहले माओवादी हिंसा में तेज़ी आती है क्योंकि माओवादी चुनाव बहिष्कार को प्रभावी बनाने और मतदाताओं के बीच दहशत का माहौल बनाने के लिए हिंसक घटनाओं को अंजाम देते हैं.

वो पिछले चुनावों से पहले का हवाला देते हुए कहते हैं कि साल 2013 में चुनावों में ठीक पहले कांग्रेस पार्टी के पूरे नेतृत्व को माओवादियों ने साफ़ कर दिया था. सबसे बड़ा हमला सुकमा ज़िले के दरभा की झीरम घाटी में हुआ था जिसमे 25 कांग्रेसी नेता मारे गए थे. इस घटना में कुल 27 लोग मारे गए थे.

पुलिस के अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि माओवादियों ने नए इलाक़ों पर अपना प्रभाव बनाना शुरू कर दिया है. इनमें सबसे ज्यादा ओडिशा के वो इलाके हैं जो छत्तीसगढ़ से लगे हुए हैं, जैसे मलकानगिरी, कालाहांडी और कोरापुट.

नोटबंदी के बावजूद इनका प्रभाव बढ़ रहा है और हिंसा की घटनाएं भी बढ़ी हैं.

तो सवाल उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में तैनात किए गए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान आख़िर कर क्या रहे हैं?

बस्तर सबसे चुनौतीपूर्ण

बस्तर में सफ़र करते हुए अर्धसैनिक बलों के कई 'चेक पोस्ट' पर तलाशी के लिए जब मुझे रोका गया तो उसी दौरान मैंने वहां तैनात जवानों से बात करने की कोशिश की.

इनमें कुछ जवान ऐसे भी हैं जिन्होंने जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में भी काम किया है. मगर वो बस्तर की पोस्टिंग को ही सबसे चुनौतीपूर्ण मानते हैं.

कुछ लोगों का तर्क है कि बस्तर में जो कुछ हो रहा है वो जंग जैसा ही है. जबकि अर्धसैनिक बलों का गठन इसलिए किया गया है ताकि वो 'शांति बहाल' कर सकें और क़ानून व्यवस्था को ठीक रखने में योगदान दें.

लेकिन छापामार युद्ध लड़ने की उनकी क्षमता उतनी नहीं है जितनी जंग लड़ने के लिए फौजियों को दी जाती है. फ़ौज को बस्तर में उतारा नहीं जा सकता क्योंकि 'अपने लोगों से जंग नहीं लड़ी जा सकती'. फ़ौज की ज़िम्मेदारी है देश की सरहदों को सुरक्षित रखना और दुश्मन देशों के हमलों से निपटना.

ऐसे में इस लड़ाई में शामिल जवान सिर्फ 'बलि का बकरा' इसलिए है क्योंकि न तो वह स्थानीय भौगोलिक स्थिति से वाक़िफ है और न ही स्थानीय भाषा से.

बस्तर में तैनात सुरक्षाकर्मियों को जितनी बारूदी सुरंगों का सामना करना पड़ रहा है, वो भारत के किसी और हिस्से में नहीं करना पड़ता.

माओवादियों की ताक़त की वजह क्या?

लोग सवाल पूछते हैं कि अगर नोटबंदी का इतना असर हुआ तो फिर माओवादी इतना सामर्थ्य कैसे जुटा रहे हैं.

लेकिन बस्तर संभाग की नारायणपुर पुलिस का दावा है कि सुरक्षा बलों का इतना दबाव बन गया है कि हाल ही में 62 सक्रिय माओवादियों ने सिर्फ एक ही दिन में आत्मसमर्पण किया है.

सलवा जुडूम का भी उद्देश्य था नक्सलवाद का ख़ात्मा. सलवा जुडूम ख़ुद ख़त्म हो गया.

2013 की शुरुआत में दिवंगत कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने मुझसे ऑन रिकॉर्ड कहा था, "सरकार का जो रवैया है, उससे नक्सलवाद कभी ख़त्म नहीं हो सकता.'

आज उनकी बेटी तूलिका भी बीबीसी से बात करते हुए सरकार पर आरोप लगाती हैं.

वो कहती हैं, "नक्सल विरोधी अभियान के नाम पर ख़ूब पैसा आता है और उसकी बंदरबांट हो रही है. इसलिए कोई नहीं चाहता कि इस समस्या का ख़ात्मा हो. हमारा परिवार तो भुक्तभोगी है. हमसे अच्छा कौन समझता है इस बात को."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)