RBI के पास 'ज़रूरत से ज़्यादा' पैसे होने का सच क्या

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दो साल पहले आज ही के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करके सबको चौंका दिया था.

कुछ लोगों का मानना है कि नोटबंदी और आरबीआई के हालिया विवाद के तार भी जुड़े हुए हैं. इस विवाद में अब ये बात भी शामिल हो गई है कि सरकार आरबीआई से 3.61 लाख करोड़ रुपए मांग रही है.

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रियरंजन दास कहते हैं कि "पिछले दिनों मोदी सरकार ने आरबीआई से जो 3.61 लाख करोड़ रुपये मांगे हैं उसकी कड़ी नोटबंदी के ग़लत फ़ैसले से मिलती है."

वो बताते हैं, "सरकार आरबीआई से पैसे इसलिए माँग रही है क्योंकि सरकार ये सोच रही थी कि नोटबंदी से वो तीन या साढ़े लाख करोड़ रुपए काला धन पकड़ेगी यानी ये राशि सिस्टम में वापस नहीं आएगी. सरकार सोच रही थी कि ये राशि वो आरबीआई से ले लेगी. अब वो हुआ नहीं तो सरकार बैंकों की मदद करने के नाम पर आरबीआई से साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये माँग रही है."

क्या आरबीआई को पैसा देना पड़ेगा?

हालांकि इकनॉमिक टाइम्स अख़बार के संपादक टी के अरुण इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते और वो मानते हैं कि नोटबंदी का सरकार द्वारा आरबीआई से फंड लेने का कोई संबंध नहीं है.

टीके अरुण बताते हैं, "नोटबंदी से पहले ही मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने अपने आर्थिक सर्वे में लिखा था कि दुनिया के बाक़ी केंद्रीय बैंकों की तुलना में आरबीआई के पास ज़रूरत से बहुत अधिक राशि जमा है. ये राशि सरकार को ट्रांसफ़र की जा सकती है जिससे सरकार कोई अच्छा काम कर सकती है."

विशेषज्ञ इस बात पर पूरी तरह से सहमत नहीं हैं कि सरकार को पैसे देने चाहिए या नहीं, लेकिन इस बात पर उनकी सहमति है कि आरबीआई और केंद्रीय सरकार के बीच इस तनाव में आरबीआई जल्द ही झुक जाएगी.

प्रियरंजन दास की राय ये है कि आख़िर में आरबीआई को पैसे देने ही पड़ेंगे.

उनके अनुसार आरबीआई जैसी संस्थाओं की पूरी स्वायत्तता होनी चाहिए लेकिन नोटबंदी के समय सरकार ने इस आर्थिक संस्था से कोई सलाह मशविरा नहीं किया था. इससे ये समझ में आता है कि आरबीआई की स्वायत्तता को सरकार ने 'किरकिरा' कर दिया है.

वहीं टीके अरुण के विचार में आरबीआई की स्वायत्तता को इस तरह से देखना चाहिए कि ये सरकार से अलग नहीं है.

वो कहते हैं कि "आरबीआई वित्त मंत्रालय का ही अंग है".

अरुण के अनुसार आरबीआई के पास सरकार को पैसे देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है.

प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का फ़ैसला किया था तो उसकी ख़ूब आलोचना हो रही थी. इस आलोचना के जवाब में मोदी ने कहा था, "भाइयों-बहनों, मैंने सिर्फ़ देश से 50 दिन मांगे हैं. 50 दिन. 30 दिसंबर तक मुझे मौक़ा दीजिये. अगर 30 दिसंबर के बाद कोई कमी रह जाए, कोई मेरी ग़लती निकल जाए, कोई मेरा ग़लत इरादा निकल जाए. आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे, मैं खड़ा होकर... देश जो सज़ा देगा वो सज़ा भुगतने को तैयार हूँ."

अपने फ़ैसले से देश को एक बड़ा झटका देने वाले पीएम मोदी ने उस वक़्त कहा था कि नोटबंदी काले धन के ख़िलाफ़ एक बड़ी मुहिम है.

उन्होंने नोटबंदी को चरमपंथ और आतंकवाद की फंडिंग के ख़िलाफ़ एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' कहा था. साथ ही कैशलेस (नक़दी रहित) अर्थव्यवस्था और डिजिटल सोसायटी की तरफ़ एक बड़ा क़दम बताया था.

दो साल बाद नरेंद्र मोदी की सरकार ये दावा कर रही है कि नोटबंदी से जुड़े उनके सारे उद्देश्य पूरे हो गए हैं.

नोटबंदी पर विपक्ष का सवाल

वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस नोटबंदी के भारत सरकार के फ़ैसले को 'मोदी-निर्मित आपदा' कहता रहा है.

पार्टी ने अपने एक बयान में कहा था कि सरकार को काला धन नहीं मिला क्योंकि 99 प्रतिशत नोट रिज़र्व बैंक के पास लौट गए.

कांग्रेस पार्टी के अनुसार, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन लोगों से चार लाख करोड़ का लाभ अर्जित करने की उम्मीद की थी जो अपने नोट वापस करने में सक्षम नहीं थे. इसका नुकसान ये हुआ कि नए नोट छापने में हमारी टैक्स मनी के 21,000 करोड़ रुपए ख़र्च हो गए."

एक नाकाम फ़ैसला

नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि इससे टैक्स नेट बढ़ा है और विकास दर में भी वृद्धि हुई है.

पिछले साल ही रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कहा था कि 99.3 प्रतिशत नोट सिस्टम में वापस आ गए हैं.

यानी केंद्रीय बैंक के अनुसार नोटबंदी के समय देशभर में 500 और 1000 रुपये के कुल 15 लाख 41 हज़ार करोड़ रुपये के नोट चलन में थे जिनमें से 15 लाख 31 हज़ार करोड़ के नोट अब सिस्टम में वापस में आ गए हैं.

यही कोई 10 हज़ार करोड़ रुपए के नोट सिस्टम में वापस नहीं आ पाए. अभी तो भूटान और नेपाल से आने वाले नोटों की गिनती होनी बाक़ी है.

इसका मतलब ये हुआ कि लोगों के पास कैश की शक़्ल में काला धन नहीं के बराबर था.

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रियरंजन दास कहते हैं कि ये सोचना मोदी सरकार का भ्रम था कि लोग काले धन को कैश की शक़्ल में अपने घरों में रखते हैं.

उनके अनुसार काले धन से कमाया गया धन ज़मीन जायदाद में निवेश कर दिया जाता है.

प्रियरंजन ज़ोर देकर कहते हैं कि नोटबंदी बिल्कुल नाकाम रही. वो कहते हैं, "ये सरकार का एक अतार्किक क़दम था. ये एक एकतरफ़ा फ़रमान था जिससे देश और देश की अर्थव्यवस्था को स्थायी चोट पहुँची. इससे सकल घरेलु उत्पाद में दो प्रतिशत की गिरावट हुई जो तीन लाख या 3.5 लाख करोड़ रुपए का घाटा कहा जा सकता है."

सियासी मास्टर स्ट्रोक

वहीं टीके अरुण के अनुसार आर्थिक रूप से नोटबंदी नाकाम रही, लेकिन सियासी ऐतबार से ये एक बड़ी कामयाबी थी. ये मोदी सरकार का एक सियासी मास्टरस्ट्रोक था.

अरुण दावा करते हैं कि कई विशेषज्ञ ऐसा ही मानते हैं.

वो कहते हैं, "इसका असल उद्देश्य जनता को ये पैग़ाम देना था कि भाजपा केवल बनियों और छोटे दुकानदारों की पार्टी नहीं है. ये आम जनता की पार्टी है और मोदी सरकार काले धन को ख़त्म करना चाहती है. इस पैग़ाम को लोगों ने अपनाया और इसीलिए नोट वापस करने के लिए लंबी लाइनों में खड़े रहे. वो घंटों लाइन में खड़े रहे जिससे उन्हें लगा कि वो भी सरकार के इस क़दम में साथ दे रहे हैं."

अरुण कहते हैं, "मोदी नहीं आम जनता बेवक़ूफ़ है. आम जनता की ग़लतफ़हमी और भरोसे का सरकार ने फ़ायदा उठाते हुए नोटबंदी की और इसका सियासी लाभ हुआ. मगर आर्थिक रूप से देश को काफ़ी नुक़सान हुआ"

प्रियरंजन ने इस विचार से सहमती ज़ाहिर करते हुए कहा, "ये अर्थव्यवस्था पर सर्जिकल स्ट्राइक थी. ये सब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए था." उनके अनुसार नोटबंदी का यही असली मक़सद था.

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