अगर तेज प्रताप यादव की पत्नी ने तलाक़ नहीं चाहा तो...

    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की छह महीने पहले ही धूमधाम से शादी हुई थी. इस हाई प्रोफाइल शादी में बड़े नेता शामिल हुए थे और ये शादी मीडिया में भी छाई रही थी.

12 मई 2018 को हुई इस शादी की बातें अब भी हो रही हैं लेकिन इस बार चर्चा की वजह है तेज प्रताप और उनकी पत्नी ऐश्वर्या राय के बीच टकराव.

इनके बीच कड़वाहट तब सामने आई जब ये बात सार्वजनिक हुई कि तेज प्रताप अपनी पत्नी से तलाक लेना चाहते हैं.

तेज प्रताप ने 2 नवंबर को कोर्ट में तलाक़ की याचिका दायर कर दी है. उनका कहना है कि वह तलाक़ चाहते हैं लेकिन उनकी पत्नी और परिवार नहीं. उनका परिवार ऐश्वर्या की तरफ़ है.

अब 29 नवंबर को इस मामले में सुनवाई होनी है.

ऐश्वर्या राय की इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. उन्होंने अभी तक तलाक के लिए सहमति नहीं जताई है.

ऐसे कई मामले आते हैं जिनमें पति या पत्नी दोनों में से कोई एक तलाक़ चाहता है. ऐसे में दूसरे साथी के पास क्या विकल्प बचता है. तलाक़ लेने की प्रक्रिया क्या होती है.

तलाक़ की प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट में ​फैमिली लॉयर प्राची सिंह बताती हैं कि तलाक़ से जुड़े सभी मामले फैमिली कोर्ट में जाते हैं. अगर मुक़दमे के बीच में कोई आपराधिक आरोप लगता है जैसे दहेज, घरेलू हिंसा आदि तब पुलिस में शिकायत दर्ज होती है.

तलाक़ दो तरह से लिया जाता है एक सहमति से और दूसरा एक पक्षीय तरीके से. हिंदू विवाह कानून की धारा 13ए के तहत पति या पत्नी में से कोई एक तलाक़ मांग सकता है और 13बी के तहत सहमति से तलाक़ होता है.

तलाक़ के आधार

व्याभिचार-शादी के बाहर संभोग या किसी भी प्रकार के यौन संबंध में लिप्त कार्य को व्याभिचार माना जाता है. व्याभिचार पहले अपराध था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया. लेकिन, इसके आधार पर तलाक़ लिया जा सकता है.

क्रूरता- इसमें शा​रीरिक और मानसिक दोनों तरह की क्रूरता आती है. शारीरिक तौर पर चोट पहुंचाना भी इसी का हिस्सा है. मानसिक यातना सिर्फ एक घटना के आधार तय नहीं होती बल्कि घटनाओं की श्रृंखला पर आधारित होती है. इसमें लगातार दुर्व्यवहार, दहेज के ​लिए परेशान करना और यौन विकृति आदि क्रूरता आती है.

परित्याग- अगर पति या पत्नी में से कोई एक भी कम से कम दो साल की अवधि के लिए अपने साथी से अलग रहता है तो परित्याग के आधार पर तलाक़ की याचिका दायर की जा सकती है.

मानसिक विकार- अगर किसी का साथी मानसिक विकार से ग्रस्त है और इस कारण दोनों के साथ रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती. इस आधार पर तलाक़ मांग सकते हैं.

संक्रमित बीमारी- अगर पति या पत्नी को ऐसी बीमारी है जो संक्रमण से फैल सकती है जैसे एचआईवी/एड्स, कुष्ठ रोग और सिफलिस आदि. इस आधार पर तलाक़ ले सकते हैं.

धर्म परिवर्तन-अगर पति या पत्नी में से कोई अपना धर्म परिवर्तन कर लेता है तो भी तलाक़ मांगा जा सकता है.

जीवित न मिलना-पति या पत्नी के जीवित होने की जानकारी नहीं है लेकिन उनका शव प्राप्त नहीं हुआ है. ऐसे में क़ानून कहता है कि अगर एक व्यक्ति को सात साल की निरंतर अवधि तक जिंदा देखा या सुना नहीं जाए तो वो मृत माना जाता है. इस आधार पर तला​क़ की याचिका दायर कर सकते हैं.

सन्यांस- यदि पति या पत्नी में से कोई एक शादीशुदा ज़िंदगी छोड़कर संन्यास लेता है तो तलाक़ मांग सकते हैं.

इसके अलावा अगर पति बलात्कार या किसी गंभीर अपराध में लिप्त हो. दूसरी शादी कर ली हो या एक साल तक शारीरिक संबंध नहीं बनाए गए हों.

एक पक्षीय तलाक़

इन मामलों में पति या पत्नी में से कोई एक तलाक़ की याचिका दायर करता है. जैसे कि ​तेज प्रताप यादव के मामले में एक पक्षीय तलाक़ मांगा गया है.

​दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मेट्रीमोनी वकील मुरारी तिवारी बताते हैं​, ''जैसा कि तेज प्रताप के बयानों से लगता है तो उन्होंने क्रूरता के तहत मामला दर्ज किया होगा. इसमें मानसिक तौर पर परेशान करना भी शामिल होता है.''

''शादी का एक साल पूरा होने से पहले तलाक़ की अर्जी दाख़िल नहीं की जा सकती. हालांकि, इसमें कुछ आधारों पर छूट दी गई है. जैसे कि तेज प्रताप यादव ने शादी के छह महीनों के अंदर ही तलाक़ मांगा है तो उन्हें पहले कोर्ट से इजाज़त लेनी होगी कि क्या वो एक साल से पहले तलाक़ दायर कर सकते हैं या नहीं. इसके लिए उन्हें अत्यंत क्रूरता साबित करनी होगी तभी कोर्ट उन्हें इजाज़त देगा.''

लेकिन, जब पति या पत्नी में से कोई एक राजी और दूसरा नहीं तो दूसरे पक्ष के पास क्या विकल्प बचते हैं और इसमें परिवार क्या भूमिका निभाता है?

  • इसमें पति या पत्नी फैमिली कोर्ट में तलाक़ के लिए याचिका दायर करते हैं. इसके साथ सारे साक्ष्य और कागज भी जमा करते हैं.
  • इसके बाद कोर्ट की तरफ़ से दूसरे पक्ष को नोटिस भेजा जाता है और अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है.
  • क्योंकि ये एकतरफ़ा मांग है और दूसरा पक्ष तलाक़ नहीं चाहता तो इसलिए याचिकाकर्ता को अपना पक्ष सबूतों के ज़रिए प्रमाणित करना होता है.
  • तेज प्रताप यादव के मामले में भी यही होगा. उनकी पत्नी या तो सहमति देंगी या तलाक़ का विरोध करेंगी.
  • इसके बाद दूसरा पक्ष भी अपने समर्थन में सबूत पेश करता है. वह बताता है कि पहले पक्ष के आरोप ग़लत हैं.
  • एक पक्ष अगर कोर्ट में उपस्थित नहीं होता तो दूसरे पक्ष के साक्ष्यों के आधार पर फ़ैसला हो जाता है.
  • अगर दूसरा पक्ष कोर्ट में आता है तो पहले सहमति से किसी एक नतीजे (साथ रहना या तलाक़) पर पहुंचने की कोशिश होती है. अगर सहमति नहीं बन पाती तो कोर्ट अंतिम फ़ैसला सुना सकता है.
  • इस बीच अगर घरेलू हिंसा, दहेज या अन्य कोई प्रताड़ना का मामला हो तो कोर्ट पुलिस को जांच के आदेश दे सकता है.
  • इसमें फ़ैसला होने में महीनों से लेकर सालों तक का समय लग सकता है.

वकील मुरारी तिवारी बताते हैं कि तलाक़ बिल्कुल ही निज़ी विषय है. इसमें परिवार का दख़ल नहीं होता.

परिवार तलाक़ चाहता है या नहीं इससे फ़र्क नहीं पड़ता. तलाक़ प्रक्रिया के दौरान ही महिला गुजारा भत्ता मांग सकती है. लेकिन, पत्नी कमा रही है या पति से ज़्यादा कमाने की स्थिति में गुजारा भत्ता नहीं ले सकती.

तेज प्रताप यादव के मामले में उनकी पत्नी मुक़दमे के दौरान और तलाक़ होने की स्थिति में भी गुजारा भत्ता ले सकती हैं. अगर गुजारा भत्ते पर सहमति नहीं बनती तो इसका अलग केस चलेगा.

सहमति से तलाक़

वक़ील प्राची सिंह बताती हैं कि एक पक्षीय तलाक़ के मुक़ाबले ये तरीक़ा ज़्यादा आसान होता है. इसमें कम समय लगता है. लेकिन, इसके लिए ज़रूरी है कि पति और पत्नी कम से कम एक साल से अलग रह रहे हों. इससे जुड़ी अन्य प्रक्रियाओं के बारे में वह बताती हैं:

  • तलाक़ का दूसरा तरीका सहमति से अलग होना है.
  • इसके लिए दोनों पक्ष फैमिली कोर्ट में सहमति पत्र के साथ तलाक़ की याचिका दाख़िल करते हैं. इस पर दोनों के हस्ताक्षर होते हैं.
  • इस तरह के तलाक़ के लिए कोई प्रमाण देना ज़रूरी नहीं होता.
  • इसमें दो स्तर पर याचिका दायर की जाती है. पहली याचिका में कोर्ट दोनों पक्षों के बयान रिकॉर्ड कर उन्हें छह महीने का समय देता है. ये समय तलाक़ के फैसले पर अंतिम बार विचार करने के लिए दिया जाता है.
  • सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद से इस छह महीने के समय से भी छूट दी गई है. लेकिन, इसके लिए ठोस कारण देने होते हैं. जैसे ज़ान को ख़तरा, कई सालों से दूर रहना और पढ़ने या नौकरी के लिए जाना.
  • जब छह महीने का समय ख़त्म हो जाता है तो दोनों पक्ष दूसरी याचिका दायर करते हैं.
  • अगर दोनों तलाक़ न लेने का फ़ैसला लेते हैं तो दोनों का बयान रिकॉर्ड किया जाता है. अगर वो तलाक़ का फ़ैसला नहीं बदलते तो कोर्ट बयान दर्ज कर अंतिम फ़ैसला सुनाता है.
  • सह​मति से तलाक़ के लिए पति और पत्नी का तीन पक्षों पर सहम​त होना ज़रूरी है. एक गुजारा भत्ता, बच्चे की कस्टडी और संपत्ति का बंटवारा. अगर इनमें से किसी भी पक्ष पर दोनों में सहमति नहीं बनती है तो पहले कोर्ट उस पर फ़ैसला लेता है.

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