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भारतीय रिज़र्व बैंक बैंकिंग सिस्टम को क्यों देगा 40 हज़ार करोड़ रुपये
- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
पंजाब नेशनल बैंक में नीरव मोदी का हज़ारों करोड़ का चर्चित फ़र्जीवाड़ा, आईएलएंडएफएस का कथित डिफॉल्ट, कई गैर बैंकिंग फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन यानी एनबीएफ़सी पर डिफॉल्ट का ख़तरा, वित्तीय घाटे में बढ़ोतरी, डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कमज़ोरी और महंगाई का बढ़ना.
साल 2018 में अब तक फाइनेंस से जुड़ी ख़बरों ने निवेशकों और आम नागरिकों को परेशान किए रखा. दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं की बुरी ख़बरों की परवाह न करते हुए साल 2013 से 2017 के आखिर तक भारतीय शेयर बाज़ार सरपट भाग रहे थे, लेकिन फिर एक के बाद एक ऐसी खबरें आने लगी जो निवेशकों में घबराहट की वजह बनीं.
विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ़आईआई) का भारतीय बाज़ारों पर भरोसा डिगने लगा और हाल ये है कि इस साल जनवरी से अब तक एफआईआई शेयर बाज़ारों में 75 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली कर पैसा अपने देश ले जा चुके हैं.
अक्टूबर में ही विदेशी संस्थागत निवेशकों ने तकरीबन 25 हज़ार करोड़ रुपये की शेयर बिकवाली की. अप्रैल के बाद ये सबसे बड़ी बिकवाली थी, इससे पहले अप्रैल में लगभग साढ़े 12 हज़ार करोड़ रुपये के शेयर विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बेचे थे.
इस बीच, पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने अपना असर दिखाया और महंगाई सिर उठाने लगी है. सितंबर में खुदरा महंगाई दर 3.77 फीसदी थी. अगस्त में महंगाई दर 3.69 फीसदी थी. औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों में भी गिरावट आई है. जुलाई 2018 में औद्योगिक उत्पादन 6.6 फीसदी से घटकर में अगस्त में 4.3 फ़ीसदी रही.
रिज़र्व बैंक ने महंगाई दर का लक्ष्य चार फ़ीसदी रखा है और इस लक्ष्य को बनाए रखने के लिए उसने दो बार ब्याज दरें भी बढ़ाईं, लेकिन फिर रिज़र्व बैंक ने एलान किया कि वो नवंबर में ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ के ज़रिये बैंकिंग सिस्टम में 40 हज़ार रुपये डालेगा. आख़िर क्या हैं इसके मायने और रिज़र्व बैंक ने ऐसा क्यों करने जा रहा है?
क्या हैं मायने?
बैंकिंग सिस्टम में जब भी नकदी की कमी होती है यानी उपभोक्ताओं की रुपये की मांग बैंकिंग सिस्टम में मौजूद कुल नकदी से अधिक होती है तो ऐसे में रिज़र्व बैंक ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ का रास्ता अपनाता है.
बैंकिंग सिस्टम में पिछले तीन हफ्ते से कैश की कमी थी. इंडिया रेटिंग के अनुसार सिस्टम में तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये की कमी थी.
ओएमओ के ज़रिये आरबीआई सरकारी बॉन्ड्स की ख़रीदारी करता है. इस तरह सिस्टम में नकदी आ जाती है. यानी रिज़र्व बैंक 40 हज़ार करोड़ रुपये के सरकारी बॉण्ड्स ख़रीदेगा. इससे पहले, रिज़र्व बैंक ने 17 मई को 10 हज़ार करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में डाले थे.
त्योहारी सीज़न है वजह?
दशहरा, दिवाली के कारण बाज़ार में नकदी की मांग बढ़ी है. रिज़र्व बैंक के इस कदम के पीछे इसे ही सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा है.
अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, "आम तौर पर लोग त्योहारों में अधिक ख़रीदारी करते हैं. ज़ाहिर है इससे बैंकिंग सिस्टम में नकदी की मांग बढ़ जाती है. इस कमी को दूर करने के लिए ही आरबीआई ने ये कदम उठाया है."
इसके लिए एक्साइज़ और जीएसटी की देनदारी की वजह से भी नकदी में कमी हुई.
रुपये को संभालने में हुआ कैश क्रंच
डॉलर के मुक़ाबले रुपये में लगातार गिरावट को संभालने के लिए रिज़र्व बैंक उपाय करता है.
बाज़ार के जानकार आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, "डॉलर लगातार गिर रहा था और रिज़र्व बैंक पर ये दबाव था कि इस गिरावट को थामा जाए. इन उपायों के तहत रिज़र्व बैंक डॉलर बेचकर बैंकिंग सिस्टम से रुपया ले लेता है. इस वजह से भी सिस्टम में रुपये की कमी होती है."
शेयर बाज़ार के लिए
कई दिनों से बिकवाली की मार झेल रहे भारतीय शेयर बाज़ारों में सोमवार को भारी उछाल देखने को मिला. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई का 30 शेयरों का संवेदी सूचकांक 718 अंकों की बड़ी तेज़ी के साथ बंद हुआ. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी में 220 अंकों की तेज़ी रही.
हालाँकि बाज़ार के जानकारों का मानना है कि इस तेज़ी में रिज़र्व बैंक के फ़ैसले का सीधे-सीधे कोई असर नहीं है. अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, "बैंकिंग सिस्टम में कैश की कमी थी और इसे देखते हुए रिज़र्व बैंक ने ये फ़ैसला किया है. आरबीआई समय-समय पर ऐसे फ़ैसले करता रहता है, लेकिन शेयर बाज़ार ने इसे पॉजीटिव सेंटिमेंट के रूप में लिया है."
बाज़ार में दिग्गज कंपनियों आईसीआईसीआई बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज, लार्सन एंड टूब्रो, स्टेट बैंक, टाटा कंसल्टेंसी और ऐक्सिस बैंकों के शेयरों में ज़ोरदार ख़रीदारी को इस तेज़ी से जोड़ा जा रहा है.
दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज फर्म में रिसर्च एनालिस्ट आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, "जिस तरह से आईएलएंडएफएस और दूसरे एनबीएफसी का मामला सामने आया और लोगों में अफरातफरी फैली, ख़ासकर म्यूचुअल फंड निवेशकों में कि कहीं उसका पैसा न डूब जाए. हालाँकि सरकार की दखलंदाज़ी से ये अफ़रातफ़री बड़ी घबराहट में नहीं बदली और पैसों की निकासी का बड़ा ख़तरा टल गया."
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