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चौटाला परिवार में फूट के पीछे कौन, जानिए पूरा मामला
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दल पारिवारिक अंतर्कलह से जूझ रहे हैं. बिहार में लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल में उनके दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं तो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी से उनके छोटे भाई शिवपाल यादव अलग हो चुके हैं.
तमिलनाडु की डीएमके में दोनों भाइयों की राह अलग हो चुकी है. पंजाब के अकाली दल में सुखबीर और उनके चचेरे भाई मनप्रीत भी जुदा हो गए हैं. महाराष्ट्र में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की लड़ाई तो अब पुरानी पड़ चुकी है.
पिछले हफ़्ते हरियाणा के चौटाला परिवार में भी ऐसी उठपटक सामने आई. चौटाला परिवार की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल की लड़ाई अब सार्वजनिक हो गई है. ओमप्रकाश चौटाला ने अपने दो पोतों दुष्यंत और दिग्विजय पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए पार्टी से बाहर कर दिया है. दुष्यंत और दिग्विजय, अजय सिंह चौटाला के बेटे हैं.
चौटाला परिवार में अंतर्कलह
इस परिवार की जड़ें राजस्थान से जुड़ी हैं, लेकिन हरियाणा में सिरसा का चौटाला गांव इस परिवार के कारण जाना जाता है. आइएनएलडी हरियाणा विधानसभा में मुख्य़ विपक्षी पार्टी है. इसकी स्थापना ओपी चौटाला के पिता देवी लाल ने की थी.
देवी लाल 1971 तक कांग्रेस में रहे थे. दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे. 1977 में देवी लाल जनता पार्टी में आ गए और 1987 में लोकदल के साथ. 1989 में देवी लाल भारत के उपप्रधानमंत्री बने. देवी लाल की पकड़ ग्रामीण मतदाताओं में अच्छी मानी जाती है. आगे चलकर देवी लाल के बड़े बेटे ओपी चौटाला भी हरियाणा के तीन बार मुख्यमंत्री बने.
पारिवारिक विवाद की जड़ में सत्ता की चाहत
ओपी चौटाला आइएनएलडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. ओपी चौटाला और उनके बड़े बेटे अजय सिंह जूनियन बेसिक ट्रेनिंग टीचर्स भर्ती में घपला करने में 10 साल की जेल की सज़ा काट रहे हैं. ओपी चौटाला जेल से ही पार्टी के सारे अहम फ़ैसले लेते हैं. पार्टी शक्ति का दूसरा केंद्र ओपी चौटाला के छोटे बेटे अभय सिंह को माना जाता है.
अजय सिंह चौटाला की पत्नी नैना सिंह विधायक हैं. इनके दो बेटे हैं. दुष्यंत सिंह बड़े बेटे हैं और ये हिसार से लोकसभा सांसद हैं. छोटे बेटे दिग्विजय सिंह आईएनएलडी के युवा मोर्चे के प्रमुख हैं. इन दोनों को ही ओपी चौटाला ने पार्टी से बाहर किया है.
अजय सिंह के भाई अभय सिंह हरियाणा विधानसभ में नेता प्रतिपक्ष हैं और साथ ही आईएनएलडी हरियाणा प्रदेश यूनिट के महासचिव हैं. अभय सिंह के भी दो बेटे हैं. करण सिरसा ज़िला परिषद के उपाध्यक्ष हैं और साथ में भारतीय ओलंपिक संघ के भी उपाध्यक्ष हैं. दूसरे बेटे अर्जुन परिवार के साथ सिरसा ज़िले में अपने खेतों को देखते हैं.
अभय की पत्नी कांता चौटाला ने 2016 में ज़िला परिषद का चुनाव लड़ा था, लेकिन हार मिली थी. कांता को आदित्य देवी लाल से ही हार का सामना करना पड़ा था. आदित्य देवी लाल भी इसी परिवार से हैं. आदित्य ओपी चौटाला के भाई के बेटे हैं. आदित्य और अनिरुद्ध बीजेपी में शामिल हो गए हैं.
शुरुआत में संघर्ष अभय चौटाला और उनके भतीजे दुष्यंत के बीच सामने आया. सात अक्टूबर को सोनीपत में आइएनएलडी की रैली थी. दो हफ़्ते की परोल पर ओपी चौटाला भी जेल से बाहर आए थे और वो रैली में मंच पर मौजूद थे.
भीड़ के हिस्से ने अभय के ख़िलाफ़ नारेबाजी शुरू कर दी. इसका नतीजा यहु हुआ कि ओपी चौटाला ने दुष्यंत और दिग्विजय को पार्टी से निकाल दिया और साथ में आइएनएलडी के युवा मोर्चे को भी भंग कर दिया, जिसका नेतृत्व दिग्विजय सिंह कर रहे थे.
हालांकि दुष्यंत और दिग्विजय ने फ़ैसला मानने से इनकार कर दिया है. इनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई केवल उनके पिता अजय सिंह ही कर सकते हैं.
आइएनएलडी ने दोनों से पार्टी अनुशासन के ख़िलाफ़ जाने को लेकर जवाब मांगा है. दुष्यंत ने 17 अक्टूबर को जवाब भेजा और 15 दिनों का वक़्त मांगा है. इस घटना के बाद दुष्यंत ने पूरे हरियाणा में बैठकें शुरू कर दीं और ये मांग की कि पार्टी उन्हें बताए कि कौन सा अनुशासन तोड़ा है.
दूसरी तरफ़ अभय सिंह ने अपने भतीजों से किसी भी तरह की मतभेद से इनकार किया है. उन्हें दुष्यंत और दिग्विजय के बारे में कहा कि ये उनके बच्चे हैं.
2019 के लिए इसके मायने क्या हैं?
2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में आइएनएलडी को 24 फ़ीसदी वोट मिले थे और 90 सदस्यों वाली विधानसभा में 18 सीटों पर जीत मिली थी. पार्टी उम्मीदवारों के चयन की ज़िम्मेदारी ओपी चौटाला के पास है और वो ही तय करेंगे कि हिसार से दुष्यंत को लोकसभा का टिकट मिलेगा या नहीं.
दिग्विजय के भविष्य का फ़ैसला भी ओपी चौटाला ही करेंगे. ज़ाहिर है अभय चौटाला भी चाहेंगे कि उनके भी दोनों बेटों को टिकट मिले. ओपी चौटाला और अजय सिंह दोनों जेल में हैं, ऐसे में मुख्यमंत्री के उम्मीदवार को लेकर भी स्थिति साफ़ नहीं है.
2013 में इन्हें दोषी क़रार दिया गया था. इसके साथ ही दोनों 6 सालों तक चुनाव भी नहीं लड़ सकते हैं.
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