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भारत-रूस हथियार समझौते को ट्रंप क्यों नहीं रोक पाए?
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ये दो परमाणु शक्तियों के राष्ट्र प्रमुखों के बीच वार्षिक शिखर सम्मेलन था. दो ऐसे देश जिन्होंने इतिहास में गंभीर परिस्थितियों का सामना आपसी सहयोग से किया. ये दो देश हैं भारत और रूस.
ये सच है कि इस शिखर सम्मेलन को लेकर तमाम अपेक्षाएं थीं. लेकिन ज़्यादातर लोगों की नज़रें थीं 'एस-400' डील पर.
रूस में बनने वाले 'एस-400: लॉन्ग रेंज सरफ़ेस टू एयर मिसाइल सिस्टम' को भारत सरकार ख़रीदना चाहती है.
भारतीय वायु सेना के लिए भारत सरकार ने रूस से पाँच एस-400 सिस्टम मांगे हैं.
शिखर सम्मेलन के बाद दोनों देशों ने एक साझा बयान जारी किया जिसके 45वें पॉइंट के अनुसार, एस-400 सिस्टम की आपूर्ति के लिए अनुबंध हो चुका है.
इस डिफ़ेंस सिस्टम के लिए भारत को कितनी क़ीमत चुकानी होगी, इसकी कोई आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की गई है. लेकिन कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि भारत को इसके लिए 5.4 अरब डॉलर से अधिक ख़र्च करने होंगे.
भारतीय वायु सेना की हालत
भारत की वायु सेना को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायु सेना कहा जाता है. लेकिन क्या भारतीय वायु सेना की क्षमता उसकी ज़रूरतों के अनुसार हैं.
भारतीय वायु सेना के पास अपने हवाई क्षेत्र की रक्षा करने के लिए कम से कम '45 स्क्वॉड्रन' होने चाहिए. हर एक स्क्वॉड्रन (वायुसेना की टुकड़ी) में 17-18 फ़ाइटर जेट होते हैं.
लेकिन भारतीय वायु सेना के पास आज के समय में सिर्फ़ 31 सक्रिय स्क्वॉड्रन हैं.
पिछले साल दिसंबर में भारतीय वायु सेना ने संसद की डिफ़ेंस पर बनी स्थायी समिति को ये बताया था कि उन्हें अगले दस साल में 14 और स्क्वॉड्रन चाहिए. इनमें मिग-21, मिग-27 और मिग-29 फ़ाइटर जेट शामिल होने चाहिए.
भारतीय वायु सेना ने अपनी इस रिपोर्ट में ये भी कहा था कि जो 31 स्क्वॉड्रन उनके पास हैं, वो साल 2032 तक घटकर सिर्फ़ 16 रह जाएंगे.
जब भारतीय वायु सेना को इस पर रक्षा मंत्रालय की प्रतिक्रिया मिली तो उसमें लिखा था, "सालों से स्क्वॉड्रन की क्षमता के घटने का मुद्दा बार-बार समिति द्वारा उठाया जाता रहा है. हालांकि, अब तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया है."
लेकिन सवाल ये उठता है कि बुधवार को वायु सेना प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल बी एस धनोआ ने कहा था कि एस-400 के साथ फ़्रांसीसी रफ़ाल लड़ाकू विमान एक 'बूस्टर ख़ुराक' होगी. क्या वास्तव में ऐसा हो पाएगा?
भारतीय वायु सेना की स्थिति का एक और पहलू भी है.
साल 2011 से 2013 तक मॉस्को में भारतीय राजदूत रहे अजय मल्होत्रा कहते हैं, "एस-400 का प्रस्ताव भारत को देर से नहीं मिला है, दरअसल ये रूसी सेना में ही साल 2007 में शामिल हुआ था. लेकिन हमें कुछ साल पहले इसे ले लेना चाहिए था. इसकी तुलना में हमारे पास विकल्प नहीं है और चीन भी एस-400 प्रणाली लेने जा रहा है. इसलिए ये हमारी आवश्यकता बन गया है."
अमरीका का नया क़ानून
डोनल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमरीकी संसद ने पिछले साल एक प्रतिबंध क़ानून (CAATSA) पास किया है.
इस क़ानून के बारे में मॉस्को में अजय मल्होत्रा के उत्तराधिकारी और वर्तमान में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी) के प्रमुख पी एस राघवन कहते हैं, "इस क़ानून को चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रपति कहें कि भारत ने रूस पर निर्भरता कम कर दी है. लेकिन ऐसा कुछ है नहीं जिसके आधार पर डोनल्ड ट्रंप ये कह पायें."
''सच कहा जाये तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपनी ख़ुशी से इस क़ानून पर हस्ताक्षर नहीं किये थे. बल्कि उन्होंने ये भी कहा था कि इस क़ानून में कई गड़बड़ियाँ हैं. साथ ही वो बोले थे कि मैं बतौर राष्ट्रपति कांग्रेस की तुलना में बेहतर कानून बना सकता हूँ जिनके आधार पर हम अन्य देशों से डील कर सकें."
डोनल्ड ट्रंप ने ये आशंका जताई थी कि CAATSA के प्रभाव में आने से अमरीकी कंपनियों के साथ-साथ उनके सहयोगी देशों का भी नुकसान होगा.
अगर सिर्फ़ डिफ़ेंस सेक्टर की बात करें तो अमरीकी कंपनियों को भारतीय बाज़ार में उतरने से काफ़ी फ़ायदा हुआ है.
भारत की स्थिति
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, साल 2013 से 2017 के दरमियान पूरी दुनिया के हथियार आयात का 12 फ़ीसदी अकेले भारत में हुआ जो कि किसी भी देश से काफ़ी ज़्यादा था.
एक देश जिसने इसके ज़रिए सबसे ज़्यादा पैसा कमाया, वो रूस नहीं बल्कि संयुक्त राज्य अमरीका था. रूस की तुलना में अमरीका भारत को ज़्यादा मात्रा में हथियार सप्लाई करता है.
इस पर अजय मल्होत्रा का नज़रिया है, "भारत पर किसी तरह के प्रतिबंध लगाने से न तो ट्रंप के और न ही अमरीका के व्यापक हित पूरे होंगे."
फिर भी कोई ये भविष्यवाणी नहीं करना चाहता है कि अमरीका रूस और भारत के इस समझौते पर कैसे प्रतिक्रिया देगा. क्योंकि ये एक ऐसा समझौता है जिसपर हस्ताक्षर हों, ये अमरीका नहीं चाहता था.
हालांकि पर्यवेक्षकों की इसपर एकदम स्पष्ट राय है. उनका मानना है कि भारत पर प्रतिबंध लगे या न लगे, लेकिन उसे अपनी सुरक्षा के बंदोबस्त तो रखने ही होंगे.
मल्होत्रा ने कहा, "ये बहुत चुपचाप ढंग से किये जा रहे 'राजनैतिक चातुर्य' का नमूना है. अमरीका को इसका सम्मान करना होगा और उसे हमारी चुनौतियों को समझना होगा. भारत की चिंताएं वाक़ई बड़ी हैं. जैसे ईरानी तेल की अगर बात होगी तो भारत अमरीका के विचारों को सुनेगा. लेकिन जहाँ तक भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, वहाँ समझौता नहीं किया जा सकता."
आख़िरी सवाल
अगर अमरीका ने भारत को रूस से हुए इस समझौते का दंड नहीं भी दिया, तो भी इसे लेकर दीर्घकालिक चिंताएं हैं.
पी एस राघवन की मानें तो ये सब कुछ भारत को एक बड़ा सिक्योरिटी सिस्टम बेचने के लिए हो रहा है, ये भी सच है कि प्रौद्योगिकी के मामले में जो कुछ रूस भारत को दे सकता है, वो अमरीका कई कारणों से दे ही नहीं सकता.
लेकिन ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए?
इसके जवाब में राघवन ने कहा, "अमरीका को ये समझना चाहिए कि भारत वाक़ई बहुत मुश्किल स्थिति में है. भारत को चीन और रूस, दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना है और उन्हें अनुकूल बनाए रखना है. जबकि अमरीका के साथ भारत की ये स्थिति नहीं है. हाँ, लेकिन एक सौदा होना तो हमेशा संभव है."
पर क्या डोनल्ड ट्रंप भी ऐसा ही सोचते होंगे? ये एक बड़ा सवाल है.
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