SC के फ़ैसले के बावजूद "ये महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगी"

सबरीमाला मंदिर, केरल, अयप्पा स्वामी, सुप्रीम कोर्ट

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    • Author, इमरान कुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही केरल में अयप्पा स्वामी के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से प्रतिबंध हटा लिया हो, लेकिन ऐसी कई महिलाएं हैं जो पहले से चली आ रही परंपरा का पालन करने के लिए तब तक का इंतजार करने को लेकर दृढ़ हैं जब तक वो 50 वर्ष की नहीं हो जातीं.

ये महिलाएं उस 'LetUsWait' अभियान का हिस्सा नहीं हैं, जिसकी चाल कुछ वर्षों पहले कमज़ोर पड़ गई थी, बल्कि ये कुछ नौकरीपेशा और अन्य महिलाएं हैं.

बेंगलुरू में रहने वाली और पेशे से वकील रजिता नांबियार ने बीबीसी से कहा, "फ़ैसले के बाद हमने दोस्तों के साथ आपस में विचार किया और ये तय हुआ कि हम मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगी. ये एक परंपरा है. वर्षों से इसका पालन किया जा रहा है और हम इसके ख़िलाफ़ नहीं जा सकते."

उनका ये नज़रिया हिंदू अय्यका वेदी के अध्यक्ष के. प्रभाकरन की राय के समान है, जिन्होंने इस संवाददाता से फ़ैसला आने से पहले कहा था कि यदि 10 से 50 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति मिल जाती है तो भी "केरल की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगी."

सामाजिक कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट में इसके प्रतिवादियों में से एक राहुल ईश्वर ने कहा, "कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी अधिकांश महिला भक्त मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगी. वास्तव में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कर रही बेंच के जजों में से एक जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने यह भी कहा है कि उनकी राय में कोर्ट को धार्मिक मान्यताओं में दख़ल नहीं देना चाहिए."

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'देवता और कोर्ट में विश्वास और मज़बूत हुआ'

तिरुवनंतपुरम स्थित सेंटर फॉर डेवलपमेंटल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर जे देविका सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद महिलाओं के मंदिर में प्रवेश नहीं करने के फ़ैसले पर आश्चर्यचकित नहीं हैं.

"इसी की उम्मीद की जा रही थी. हिंदू धर्म में महिलाओं को इससे इतर सोचने की इजाजत नहीं है. मंदिर में प्रवेश करने का अभियान चलाने वाली महिलाओं के साथ क्या हुआ ये हम जानते हैं. उन पर हमला किया गया और उन्हें चुप करा दिया गया."

देविका ने कहा, "यदि वो परंपरा तोड़ने की कोशिश करते हैं तो उन्हें भुगतना पड़ेगा. उन्हें रोका जाएगा और सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा. कई बार परंपरा के सम्मान की खातिर डर का सहारा लिया जाता है."

लेकिन एक महिला ने सार्वजनिक रूप से ये कहा कि वो मंदिर में महिलाओं के प्रवेश करने के फ़ैसले से बेहद खुश हैं, वो बीते जमाने की अभिनेत्री और वर्तमान में कर्नाटक सरकार में मंत्री जयमाला रामचंद्र हैं.

जयमाला वो अभिनेत्री हैं जिन्हें तब तीखी आलोचना और जांच का सामना करना पड़ा था जब उन्होंने यह दावा किया था कि श्रद्धालुओं की भीड़ के धक्के से वो मंदिर के गर्भगृह में जा पहुंची थीं और उस दौरान उन्होंने देवता को छुआ था.

जयमाला ने कहा, "तब भी मुझे देवता और कोर्ट में विश्वास था. अब यह और मज़बूत हो गया है.''

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समीक्षा याचिका दायर करेंगे असंतुष्ट

ईश्वर और हिंदू अय्यका वेदी जैसे संगठन शुक्रवार को आए फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक समीक्षा याचिका दायर करेंगे.

सामाजिक कार्यकर्ता राहुल ईश्वर के मुताबिक, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट, प्रतिवादियों की संस्था ने इस मामले पर मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ गठजोड़ का फ़ैसला किया है, क्योंकि यह फ़ैसला उन्हें भी प्रभावित करता है."

ईश्वर ने कहा, "हमने सुप्रीम कोर्ट के कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं से इस पर चर्चा की है. हम अगले 10 दिनों में समीक्षा याचिका दायर करेंगे. उम्मीद है कि हम इस केस को जीतने में कामयाब होंगे."

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