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चुनाव आयोग के आदेश से क्या उल्टा पड़ा केसीआर का दांव?
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
देश के कई राज्यों में चुनाव की तैयारियां ज़ोरों पर हैं और इससे पहले भारतीय निर्वाचन आयोग ने बड़ा फैसला किया है.
आयोग ने आदेश जारी किया है कि अगर किसी राज्य में वक़्त से पहले विधानसभा भंग की जाती है तो विधानसभा के भंग होने के साथ ही राज्य में तत्काल प्रभाव से आचार संहिता लागू हो जाएगी.
निर्वाचन आयोग के इस फ़ैसले का मतलब है कि अब राज्य में विधानसभा भंग होने के बाद कार्यवाहक सरकार नई योजनाओं की घोषणा नहीं कर सकती है.
निर्वाचन आयोग ने कैबिनट सचिव समेत सभी राज्यों और केंद्र शासित राज्यों के सचिवों को फ़ैसले की जानकारी दी है.
केसीआर की बढ़ेंगी मुश्किलें?
जानकारों का मानना है कि ये फ़ैसला इस साल के अंत में होने वाले तेलंगाना चुनाव को सबसे ज़्यादा प्रभावित कर सकता है.
तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव सरकार ने 6 सितंबर को विधानसभा भंग कर दी और राज्य में नए जनादेश की मांग की.
पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने बीबीसी से कहा, ''चुनाव आयोग की कोशिश है कि राजनीतिक पार्टियां विधानसभा भंग करने के बाद फ़ायदा ना उठा सकें. इस फ़ैसले का मुख्य उद्देश्य तेलंगाना ही है, जहां अब आचार संहिता लागू होगी और वहां कोई भी योजना जनता को प्रभावित करने के लिए कार्यवाहक सरकार लागू नहीं कर सकेगी.''
क़ुरैशी कहते हैं, ''किसी राज्य में चुनाव होते हैं तो वहां आचार संहिता लागू की जाती है. तेलंगाना सबसे ज़्यादा प्रभावित होगा. लेकिन कई योजनाओं का ऐलान केंद्र सरकार की ओर से भी किया जाता है. ये आचार संहिता अब केंद्र सरकार पर भी लगेगी. अगर उनके फ़ैसले उस राज्य को प्रभावित करेंगे, जहां चुनाव होने हैं तो यह आचार संहिता का उल्लंघन होगा.''
क़ुरैशी कहते हैं, ''ये समझना होगा कि केंद्र सरकार भी तो एक राजनीतिक पार्टी की ही है. ऐसे में अगर आचार संहिता किसी राज्य में लागू की जाती है तो वह उस राज्य के संदर्भ में केंद्र सरकार के लिए भी लागू होती है. ये दोनों ही सरकारों पर लागू होती है ताकि दोनों मिलकर कोई भी ऐसे फ़ैसले ना लें जिससे तेलंगाना या किसी भी राज्य पर असर पड़े.''
एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ
निर्वाचन आयोग ने ये आदेश सुप्रीम कोर्ट के साल 1994 में एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ केस में दिए फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए दिया है. इस ऐतिहासिक फ़ैसले पर एस. वाई. क़ुरैशी कहते हैं, ''दरअसल इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि यदि किसी राज्य में मौजूदा सरकार कामकाज करने में असमर्थता व्यक्त करती है तो विधानसभा को तुरंत भंग करने के बजाय सरकार बनाने के अन्य विकल्प पर ग़ौर किया जाना चाहिए. अगर विधानसभा भंग हो जाती है तो कार्यवाहक सरकार को प्रतिदिन के कामकाज करने का ही अधिकार है. उसे किसी भी बड़ी योजना के ऐलान की मनाही होती है.''
राष्ट्रपति शासन की स्थिति में क्या?
क़ुरैशी कहते हैं, ''जहां राष्ट्रपति शासन होता है वहां भी तो चुनाव होंगे. इसका यही मतलब होता है कि राज्य की सरकार अल्पमत में है और अब विधानसभा भंग करके वहां राष्ट्रपति का शासन होगा. ऐसे में ये समझना होगा कि विधानसभा भंग होते ही आचार संहिता लागू हो ही जाएगी. अगर किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगता है तो वहां भी निर्वाचन आयोग का नया आदेश लागू होगा. यानी इस सूरत में भी कोई पार्टी विशेष या केंद्र सरकार ऐसे फ़ैसले नहीं लेगी जो लोक-लुभावन हो. ''
क़ुरैशी बताते हैं, ''विधानसभा भंग होते ही राज्य दोबारा चुनाव की स्थिति में आ जाता है. निर्वाचन आयोग के सामने नए फ़ैसले को लेकर एक रुकावट सामने आ सकती है. दरअसल, साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और भारत सरकार के बीच समझौते के तहत यह कहा था कि आदर्श आचार संहिता चुनाव के नोटिफिकेशन आने के बाद ही लागू की जा सकती है. ऐसे में ये नया आदेश कैसे लागू होगा ये देखना होगा. ''
अब तक किसी भी राज्य में निर्वाचन आयोग की तरफ़ से तब ही आदर्श आचार संहिता लगाई जा सकती थी जब आयोग की ओर से चुनाव की तारीख़ों का ऐलान कर दिया जाता था. अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू से चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा, ''आयोग जहां कहीं भी चुनाव हैं वहां की राजनीतिक पार्टियों को एक समान स्तर देने के लिए बाध्य है. ये आदेश पूरे देश के लिए लागू होगा.''
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