ब्लॉग - विज्ञापन में दिखाए जाते हैं कैसे पति?

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

विज्ञापन में दीपिका पादुकोण को शादी का न्योता आता है, वो ख़ूबसूरत लिबास खरीदने जाती हैं और वो उन्हें फ़िट आएगा या नहीं, इस बात से घबराने की बजाय वो केलॉग्स कॉर्नफ़्लेक्स खाती हैं ताकि दो सप्ताह में पतली हो जांए.

दो सप्ताह में वो पतली हो भी जाती हैं, कैमरा उनकी कमर पर ज़ूम-इन करता है और वो कहती हैं 'इस वेडिंग सीज़न, सिर्फ़ वज़न घटाइए, कॉन्फ़िडेन्स नहीं'.

यानी पतली औरत ही सुंदर होती है और अगर वो पतली नहीं है तो उसमें कॉन्फ़िडेंस हो ही नहीं सकता.

दशकों से विज्ञापनों में औरतों को गोरी-पतली, सुगढ़ गृहणी, बच्चों-बड़ों को संभालनेवाली और घर-दफ़्तर के बीच संतुलन बनाकर चलनेवाली दिखाया जाता है.

लेकिन एक ताज़ा शोध में पता चला है कि एशिया में दिखाए जानेवाले विज्ञापनों में औरतो का ही नहीं मर्दों का चित्रण भी समाज की रूढ़ीवादी सोच ही दिखाता है.

सिर्फ़ 9 फ़ीसदी विज्ञापन मर्दों को घर का काम या बच्चों की देखभाल करते हुए दिखाते हैं और सिर्फ़ तीन फ़ीसदी उन्हें ध्यान रखनेवाले पिता के किरदार में दिखाते हैं.

चीन, भारत और इंडोनीशिया में इस साल के पहले छह महीनों में दिखाए गए 500 से ज़्यादा विज्ञापनों के इस शोध को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया कंसलटेंसी कंपनी 'इबिक्विटी' और मल्टीनैश्नल कंपनी 'यूनीलिवर' ने करवाया.

शोध ने पाया कि सिर्फ़ दो फ़ीसदी विज्ञापनों में 40 साल के ऊपर के मर्दों को दिखाया गया और सिर्फ़ एक फ़ीसदी में ऐसे कलाकारों का इस्तेमाल किया गया जो ख़ूबसूरती के 'खांचे' से अलग थे.

विज्ञापनों से हवा बदलने की कोशिश

ये चौंकानेवाले आंकड़े तब हैं, जब पिछले सालों में कई कंपनियों ने अपने विज्ञापनों से ये हवा बदलने की कोशिश की है.

हैवल कंपनी के पंखे के विज्ञापन, 'हवा बदलेगी', में एक युवा जोड़े को अपनी शादी रजिस्टर करते हुए दिखाया गया है.

पति कहता है कि शादी के बाद उनकी पत्नी का नाम नहीं बदलेगा बल्कि वो अपने नाम में अपनी पत्नी का सरनेम जोड़ेंगे.

एरियल कंपनी के डिटरजेंट के विज्ञापन में एक पिता अपनी बेटी को ऑफ़िस के काम के साथ पति की शर्ट धोते, बेटे को होमवर्क कराते, उसके बिखरे खिलौने समेटते और सबके लिए चाय और खाना बनाते देखते हैं.

और ये सब देखते हुए शर्मिंदा होते हैं कि इसके लिए वो और उनके जैसे ज़्यादातर पिता ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वो अपने बेटों को ये नहीं सिखाते कि वो भी घर के काम में हाथ बंटाए.

दिन भर में केवल 19 मिनट का काम

बेटी को चिट्ठी लिखकर कहते हैं कि अब वो कपड़े धोने से शुरुआत करेंगे ताकि मां पर पड़े घर के काम के बोझ को हल्का कर सकें.

ओईसीडी (ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर इकॉनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट) के एक शोध में पाया गया कि भारत में मर्द एक दिन में सिर्फ़ 19 मिनट घर के काम करने में लगाते हैं जबकि औरतें 298 मिनट.

भारतीय मर्दों का घरेलू काम में भागीदारी का ये आंकड़ा दुनिया में सबसे कम में से एक है.

ऐसे में विज्ञापनों में बदलती सोच का दिखाया जाना और अहम् हो जाता है.

स्कॉचब्राइट कंपनी के बरतन मांजने के जूने के विज्ञापन, घर सबका काम सबका, में एक मर्द को बरतन धोते हुए दिखाया गया है.

वो मर्द कहता है इसमें कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि घर का काम सबका काम है.

रेमंड कंपनी ने भी अपने पुराने स्लोगन 'द कम्प्लीट मैन' को नया मतलब दिया. इस विज्ञापन में पति ने अपने नवजात शिशु की देखभाल के लिए घर में रुकने का फ़ैसला किया ताकि पत्नी शांति से नौकरी पर जा सके.

सिर्फ़ बच्चों की देखभाल और घर के काम ही नहीं, कई और रिश्तों में मर्दों की भूमिका को बदलते हुए दिखाया जा रहा है.

फ़ोन बेचनेवाली कंपनी माइक्रोमैक्स ने रक्षाबंधन पर जारी किए अपने ख़ास विज्ञापन में एक भाई को अपनी बहन की कलाई पर राख़ी बांधते हुए दिखाया.

भाई अपनी बहन का शुक्रिया करना चाहता था क्योंकि बहन ने उन सभी तरीकों से भाई का ख़्याल रखा था जैसी भाइयों से उम्मीद की जाती है.

कपड़ों की कंपनी बीबा के 'चेंज द कॉनवरसेशन' विज्ञापन में लड़के का पिता दहेज ना लेने की बात कहते हैं.

लेकिन ये बदलाव कछुए की चाल से शुरू हुआ है और इसे गति देने के लिए ही साल 2017 में यूएन वुमेन, 'वर्ल्ड फ़ेडरेशन ऑफ़ ऐडवर्टाइज़र्स' (डब्ल्यूएफ़ए) और विज्ञापन जगत की कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने साथ आकर 'अनस्टीरियोटाइप एलायंस' बनाया.

डब्ल्यूएफ़ए के अध्यक्ष के मुताबिक़ विज्ञापन उद्योग को समाज की सच्ची सूरत दिखाने की हिम्मत करनी चाहिए जो समानता की ओर हो रहे सकारात्मक बदलाव दिखलाएं.

इसी सोच को ध्यान में रखते हुए इस एलायंस के सदस्य यूनीलिवर ने यशराज फ़िल्म्स के साथ मिलकर ट्रांसजेंडर लोगों के बैंड, 'सिक्स पैक बैंड', को लॉन्च किया था.

'हम हैं हैप्पी' नाम के उस कैम्पेन का मक़सद ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए बनी आम सोच को बदलना था.

डब्ल्यूएफ़ए के सीईओ स्टीफ़न लोर्क के मुताबिक विज्ञापन बनाते व़क्त खुली सोच रखना सिर्फ एक अच्छा और ज़िम्मेदार कदम ही नहीं है बल्कि इससे व्यापार को भी फ़ायदा होने की उम्मीद है.

इंटरनेट पर कई तरह का सामान एक जगह बेचनेवाली वेबसाइट ईबे का विज्ञापन 'थिंग्स दैट डोन्ट जज' कुछ ऐसा ही कहता है.

अंगूठी नहीं जानती कि उसका इस्तेमाल एक लड़का दूसरे लड़के से प्यार का इज़हार करने के लिए करेगा, आरामदायक सोफ़े पर एक गृहणी बैठेगी, दीवाली का दीया एक मुसलमान औरत अपने घर में जलाएगी या मोबाइल फोन के कैमरा में देख होंठ सिकोड़ के सेल्फ़ी मर्द खींचेंगे.

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