फ़ेक न्यूज़ से लड़ती ये महिला पुलिस अधिकारी

- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के दक्षिणी राज्य तेलंगाना में वो गर्मियों के शुरुआती दिन थे. उन दिनों, 400 से ज़्यादा गांववालों के व्यवहार में अजीब सा परिवर्तन दिख रहा था.
पुरुष और महिलाएं शाम ढलते ही खेतों से जल्दी लौट आते, वे घर के किवाड़ बंद कर देते और घरों की बत्तियां जला दी जातीं.
गांव के बच्चे, जो आमतौर पर देर तक घर के बाहर खेलते रहते थे, वो सबसे पहले घर के भीतर घुस जाते.
सड़कें सुनसान हो चुकी थीं और पूरे इलाके में एक अजीब सा सूनापन भर आया था.
यह पूरा दृश्य अपने आप में हैरानी भरा था क्योंकि गर्मियों के मौसम में आमतौर पर गांव के लोग घर के बाहर खाट डालकर खुले में सोने के आदी थे.
पुलिस भी परेशान
ये मार्च का महीना. पुलिसवाले भी लोगों के इस बदले व्यवहार से हैरान थे और उन्होंने इसकी जानकारी स्थानीय पुलिस प्रमुख रेमा राजेश्वरी को दी.
तेलंगाना के जोगुलांबा गडवाल ज़िले में तैनात पुलिस प्रमुख रेमा राजेश्वरी ने अपने हैरान-परेशान पुलिसकर्मियों की बात बड़ी ही शांति से सुनी.
अगले कुछ दिनों तक पुलिसकर्मियों ने गांववालों के इस बदले व्यवहार की वजह जानने की कोशिश की.
और जो वजह उनके हाथ लगी वह हैरान करने वाली थी.

वो वीडियो...
गांव के बहुत से लोगों को व्हाट्सएप के ज़रिए एक वीडियो और एक ऑडियो प्राप्त हुआ था.
इसी वजह से गांववालों की सांसें अटकी हुई थीं. उस वीडियो में एक आदमी के शरीर के साथ चीर-फाड़ की जा रही थी.
इस वीडियो के साथ तेलुगू भाषा में एक आदमी बोल रहा था, 'दशकों पहले जो लोग हाईवे पर चोरियां और लूटपाट करते थे, वो लौट आए हैं और अब वो इंसानों के अंग चोरी कर रहे हैं.'
जब पुलिस ने गांववालों के मोबाइल फ़ोन की जांच की तो पाया कि उनमें 30 से 35 ऐसे वीडियो और फ़ोटो थे.

बच्चा चोरी का संदेश
एक वीडियो जो कि बहुत ज़्यादा वायरल हुआ था उसमें एक बच्चे के किडनैप होने की बात दिखाई जा रही थी.
जबकि हक़ीकत में वह पाकिस्तान के एक जागरूकता अभियान का वीडियो था.
इस वीडियो के साथ ऑडियो संदेश भी था, जो कुछ यूं था-
''बच्चा चोरी करने वाले लोग गांव में आ रहे हैं. वो आपके घरों में पत्थर मारेंगे. अपने बच्चों को घर के बाहर मत जाने देना. कृपया इस मैसेज को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाएं और वायरल करें.''

स्मार्टफोन और सस्ता इंटरनेट
तेलंगाना के जोगुलंबा गडवाल और वनापर्थी ज़िलों को देश के सबसे पिछड़े 20 ज़िलों की सूची में एक बार शामिल किया जा चुका है.
इन ज़िलों में आमतौर पर कपास और धान की खेती होती है. लोगों के पास अपनी ज़मीनें नहीं है और वे काम की तलाश में शहरों की तरफ पलायन करते रहते हैं.
यहां की बमुश्किल आधी आबादी ही लिख-पढ़ सकती है. लेकिन इन सबके बावजूद हरएक घर में कम से कम एक स्मार्टफ़ोन ज़रूर पहुंच गया है. इसके साथ सस्ते इंटरनेट ने इनकी पहुंच अलग-अलग तकनीकों तक बढ़ा दी है.
लोगों के बीच मीडिया से जुड़ी सही जानकारियों की कमी है. गांव वाले अधिकतर व्हाट्सएप से प्राप्त समाचार और वीडियो से प्रभावित हो जाते हैं.
गांव में दो दर्ज़न से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप बने हुए हैं. एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग 20 करोड़ से अधिक लोग रोज़ाना 1,300 करोड़ से अधिक मैसेज व्हाट्सएप के ज़रिए एक दूसरे को भेजते हैं.

राजेश्वरी ने उठाया कदम
मार्च महीने में जब गांववासी व्हाट्सएप मैसेज से प्रभावित होकर घरों में कैद होने लगे तो पुलिस अधिकारी राजेश्वरी ने तय किया वो लोगों को फ़ेक न्यूज़ के बारे में शिक्षित करेंगी.
उन्होंने लोगों से कहा कि वो इस तरह की अफवाहों पर विश्वास न करें. पुलिसकर्मी गांव वालों के घर-घर जाकर उन्हें बताने लगे कि ये तमाम संदेश फ़र्जी हैं.
इसके साथ-साथ लोगों को यह भी बताया गया कि झूठे वीडियो या समाचार फ़ैलाना एक अपराध है जिसकी सज़ा हो सकती है.
पुलिसकर्मियों ने रात में अपनी गश्त बढ़ा दी साथ ही पुलिस अधिकारी और सिपाहियों के नंबर गांववालों को दे दिए गए.
व्हाट्सएप और शेयरचैट जैसी एप के ज़रिए बच्चा चोरी और इंसानी अंगों के चोरी होने वाली अफ़वाहों ने लगभग डेढ़ महीने तक राजेश्वरी को ठीक तरह से सोने नहीं दिया.

झूठी अफ़वाहें
साल 2016-17 में पूरे भारत में लगभग 54 हज़ार से अधिक बच्चों के अगवा होने की रिपोर्ट दर्ज हुई थी लेकिन तेलंगाना के इन इलाकों में इनमें से एक भी मामला दर्ज नहीं था.
फिर भी लोगों के दिलों में डर समाया हुआ था. एक रात, एक गांववाले ने पुलिस को फ़ोन कर बताया कि उसके दरवाज़े पर किसी ने पत्थर मारा है और बच्चा चोरी करने वाला गैंग गांव में आ चुका है.
इस फ़ोन के बाद पुलिस का सिपाही उनके घर के पास पहुंचा लेकिन उसे वहां कुछ भी नहीं मिला.
इसके बाद राजेश्वरी ने खुद इस मामले की जांच की और पाया कि कुछ लोग शराब के नशे में बच्चा चोरी होने वाला वीडियो देख रहे थे और नशे में ही उन्होंने पुलिस को वो फ़ोन भी किया था.

इसी तरह अप्रैल महीने में एक दूर के गांव में कोई धार्मिक कार्यक्रम था. उस कार्यक्रम में दो महिलाएं गाना गाने के लिए दूसरे गांव से आईं थीं.
रात में जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो उन महिलाओं की आखिरी बस निकल चुकी थी. इन महिलाओं ने सोचा कि वो उस रात इसी गांव के मंदिर में सोकर गुज़ार देंगी.
रात में नशे में धुत्त एक आदमी ने जब इन महिलाओं को मंदिर में सोया हुआ देखा तो उसने पूरे गांव में शोर मचाना शुरू कर दिया कि उसने बच्चा चोरी करने वालों को मंदिर में सोता हुआ देख लिया है.
इसके बाद गांववाले तुरंत मंदिर में पहुंचे और उन दोनों महिलाओं को मंदिर से बाहर निकाल लाए, उन्हें एक पेड़ पर बांध दिया गया और पीटा जाने लगा.
इसी बीच गांव के एक आदमी ने पुलिस को इसकी सूचना पहुंचा दी. चार पुलिसकर्मी गांव में पहुंचे और उन्होंने उन महिलाओं को गांव वालों के चंगुल से बचाया.
इसके कुछ हफ़्ते बाद एक दूसरे गांव में एक आदमी अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए खेतों में छुपा हुआ था, जब कुछ लोगों ने उसे देख लिया.
उस आदमी को भी बच्चा चोरी करने वाला बताकर बुरी तरह मारा पीटा गया. बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उस आदमी को बचाया गया.
इसी दौरान, एक और गांव में एक चरवाहे की अपने दो दोस्तों के साथ लड़ाई हो गई. उसके दोस्तों ने इस चरवाहे की फ़ोटो व्हाट्सएप पर इस संदेश के साथ फैला दी कि यह बच्चा चोरी करने वाला है.
कुछ देर में लोगों ने इस चरवाहे को घेर लिया और उसे मारने पर उतारू हो गए. बाद में पुलिस ने जब उसके दोस्तों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि हमने तो बस उसे सबक सिखाने के लिए यह काम किया था.
अलग-अलग माध्यमों से किया जागरूक
पूरे इलाके में अप्रैल से मई महीने के बीच ऐसी लगभग 13 वारदातें सामने आईं. हालत इतनी ख़राब हो गई कि डरे सहमे गांव वालों ने रात रात भर जागकर निगरानी करनी शुरू कर दी.
राजेश्वरी बताती हैं कि पुलिसकर्मी लगातार गांव के बड़े-बुज़ुर्गों और नेताओं को फ़ेक न्यूज़ के बारे में समझाते रहे.
पुलिसकर्मियों ने खुद को गांव के व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ लिया जिससे वे उन वीडियो पर नज़र रख सकें जो गांववालों के बीच फ़ैल रहे थे.
गांव में ढोल आदि के माध्यम से लोगों को अफ़वाहों से बचकर रहने के बारे में सचेत किया गया. पुलिसवालों ने सांस्कृतिक समूह बनाए, गाने गाए इसके अलावा नाटक मंडलियों के साथ मिलकर लोगों को जागरूक किया.

अप्रैल महीने में पूरे भारत में व्हाट्सएप से फैली अफ़वाहों की वजह से कम से कम 25 लोग भीड़ की भेंट चढ़ गए.
मॉब लिंचिंग की लगातार बढ़ती ख़बरों के बाद भारत सरकार ने व्हाट्सएप को निर्देश दिए कि वो इस तरह से फ़र्जी समाचारों के फैलने पर रोक लगाए.
इसी दौरान तेलंगाना के 400 से अधिक गांवों में भी ये अफ़वाहें फैली लेकिन वहां एक भी व्यक्ति की जान नहीं गई.
लोग ख़बरों को सुनने और देखने के बाद उनके तथ्यों को परखने लगे, जिसके जरिए अफ़वाहें हवा में गुम हो जाने लगीं.
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