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मणिपुर यूनिवर्सिटी में क्यों घुसे हथियारबंद कमांडो?
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इम्फ़ाल (मणिपुर) से
क्या ये महज़ इत्तेफाक़ है कि मणिपुर विश्वद्यालय में कमांडो ऑपरेशन उसी दिन, 21 सितंबर को हुआ जो बहुत सारे मणिपुरियों के मन में उस तारीख़ के तौर पर दर्ज है जिस दिन महाराजा से विलय संधि पर ज़बरन दस्तख़त करवाए गए थे?
कई मणिपुरी संगठन हर साल 21 सितंबर को बंद का आयोजन करते हैं, ऐसा बंद शुक्रवार को भी बुलाया गया था.
20 सितंबर यानी गुरुवार आधी रात के बाद का वक़्त मणिपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए काली रात के तौर पर आया. आधी रात के वक़्त जब कमांडो हॉस्टल में घुसे तो ज्यादातर छात्र सो रहे थे और कुछ इम्तिहान की तैयारी के लिए पढ़ाई में मशग़ूल थे.
पूरी रात आंसू गैस और रबड़ की गोलियों का सामना करने और फिर पुलिस के सामने परेड करने में निकल गई.
मास कम्युनिकेशन के छात्र यूरी आसाई की नींद शोर-शराबे से खुली. वो कहते हैं, "उन्होंने लोगों की पकड़-धकड़ शुरू कर दी. तीन बजे के आस-पास वो कमरे का दरवाज़ा खुलवाने लगे और लोगों को पकड़ने लगे. टियर गैस का इस्तेमाल किया गिया जिसमें कई छात्रों को चोटें आईं."
वी हाओकिप उस पांच नंबर के हॉस्टल में रहते हैं जो सबसे पहले पुलिस के निशाने पर आया.
हाओकिप कहते हैं, "सभी छात्रों को कॉरीडॉर में लाइन लगवा कर खड़ा कर दिया गया और पुलिस उनसे सवाल-जवाब करने लगी."
पुलिस ने दिन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये दावा किया कि छात्र पुलिस पर पथराव कर रहे थे जिसकी वजह से उन्हें मामूली बल प्रयोग करना पड़ा.
'चेहरे पर टूथपेस्ट लगा लिया'
आईजी काईलुंग ने कहा छापे के दौरान कुछ शिक्षकों और छात्र संघ के कुछ नेताओं को पकड़ा गया है और ये लोग नए कुलपति के साथ ज़बरदस्ती करने और उन्हें बंद करने के काम में शामिल थे.
लेकिन छात्र कह रहे हैं कि वो निहत्थे थे. वे अपने साथियों को ले जाने का विरोध करने की बात स्वीकार करते हैं लेकिन किसी तरह की हिंसा की बात को ग़लत बताते हैं.
हॉस्टल नंबर पांच में रहनेवाले गईसिंगदुआनांग गोनमई एक तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं, "हम निहत्थे थे, अपने स्लीपिंग ड्रेस में, जब कुछ न सूझा तो अपनी आंखों की हिफाजत के लिए हमने चेहरे के कुछ हिस्से पर टूथ पेस्ट लगा लिया लेकिन पुलिस को लगा कि ये हमलावर हैं और उन्होंने कुछ लोगों को पकड़ लिया."
शुक्रवार दोपहर तक किसी को विश्वविद्यालय गेट से अंदर भी नहीं जाने दिया जा रहा था और पुलिस ने ये रोक तब हटाई जब मणिपुर के कई सामाजिक संगठन वहां पहुंच गए और इस रोक के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने लगे.
कार्यकारी कुलपति की एफआईआर पर हुई कार्रवाई
सबसे पहले वहां पहुंचने वालों में मणिपुर विमेंस सोशल फॉर्मेशन की महिलाएं थीं.
संगठन की अध्यक्ष 85 साल की थॉकचौम रमानी सीधे सवाल करने लगीं, "किसकी इजाज़त से छात्रों पर ये हमला किया गया है, उन्हें फौरन छोड़ा जाए."
हालांकि पुलिस ने हिरासत में लिए गए लोगों की तादाद नहीं बताई है लेकिन कम से कम 90 छात्र और छह शिक्षकों को हिरासत में लिए जाने की बात स्थानीय मीडिया समूह कर रहे हैं.
पुलिस का दावा है कि ये कार्रवाई उन्होंने उस एफ़आईआर के आधार पर की है जो कार्यकारी कुलपति ने करवाई है.
प्रोफ़ेसर वीसी गुरुवार को चार्ज लेने गए थे लेकिन पुलिस के मुताबिक़ कुछ लोगों ने उनके साथ ज़ोर जबरदस्ती की और उन्हें एक जगह बंद भी रखा गया.
समझा जाता है कि पुलिस उन लोगों की छात्रों और शिक्षकों की तलाश में है जिन्होंने कार्यकारी कुलपति के साथ कथित तौर पर इस तरह की कार्रवाई की.
विश्वविद्यालय छात्र यूनियन के सदस्य अमर युमनाम ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि कार्यकारी कुलपति की नियुक्ति कार्यकारी परिषद की रज़ामंदी के बिना की गई है जो नियमों के खिलाफ़ है.
विश्वविद्यालय में पिछले कई महीनों से हाल में पद से हटाए गए कुलपति आद्या प्रसाद पांडेय के ख़िलाफ़ अनियमितता, वित्तीय गड़बड़ियां और भगवाकरण के आरोप में आंदोलन जारी था.
उनके ख़िलाफ़ आरोपों की जांच के लिए एक समिति भी तैयार हुई थी.
मगर कुछ छात्रों के मुताबिक़ ये तस्वीर का एक पहलू है.
नाम न लिखने की शर्त पर कुछ छात्रों ने बताया कि हालांकि पांडेय के ख़िलाफ़ लगे कुछ आरोप सही हैं लेकिन उनके खिलाफ़ विरोध का पूरा मामला उससे कहीं अधिक अनुसूचित जनजाति के छात्रों को रिज़र्वेशन न देने और उन लॉबियों का भी कारनामा है जिनके सामने पांडेय झुकने को तैयार नहीं.
उन छात्रों का कहना है कि हटाये गए कुलपति पांडेय ने रिजर्व्ड कैटेगरी को 31 प्रतिशत से कम कर सात पर लाने के नियम को रद्द कर फिर से उसे 31 फ़ीसद पर बहाल कर दिया था जो कुछ लोगों को पसंद नहीं आया था.
मणिपुर में पहाड़ और घाटी में रहने वाली जनजातियों के बीच तनाव रहता है, जबकि प्रदेश का बड़ा हिस्सा - 70 फ़ीसद पहाड़ है. घाटी में मैतई समुदाय के लोग ज़्यादा बसते हैं, उनकी आबादी और प्रभाव भी अधिक है.
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