चंद्रशेखर ने मायावती को बुआजी की बजाय बहनजी कहा होता तो

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

पिछले हफ़्ते जेल से रिहा हुए भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर ने बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती को बुआ बताते हुए प्रधानमंत्री पद के लिए उनके समर्थन और महागठबंधन की वकालत की थी.

लेकिन दो दिन बाद ही यानी रविवार को मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ऐसे रिश्तों को सिरे से ख़ारिज कर दिया.

जेल से छूटने के बाद भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ने मायावती के बारे में पूछे गए सवाल पर कहा था, "वो मेरे परिवार की सदस्य हैं, मेरी बुआ हैं, मैं उनका भतीजा हूं. हमारा उनका पारिवारिक रिश्ता है."

चंद्रशेखर के बयान पर क्या बोलीं मायावती

चंद्रशेखर के इस बयान को राजनीतिक हलक़ों में काफ़ी गंभीरता से लिया गया क्योंकि पिछले दो साल के दौरान ऐसा कभी देखने में नहीं आया कि दोनों दलित नेता राजनीतिक स्तर पर एक साथ आने को आतुर हों. लेकिन मायावती ने रविवार को ख़ासतौर पर इसीलिए प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई और एकजुटता की ऐसी अटकलों को ख़ुद ही ख़ारिज कर दिया.

मायावती ने चंद्रशेखर का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा पर्याप्त स्पष्ट था.

प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान मायावती का कहना था, "कुछ लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ में, तो कुछ लोग अपने बचाव और कुछ लोग अपने आप को नौजवान दिखाने के लिए मेरे साथ कभी भाई-बहन का, तो कभी बुआ-भतीजे का रिश्ता बता रहे हैं. सहारनपुर के शब्बीरपुर में कराए गए जातीय उत्पीड़न कांड में अभी-अभी रिहा किया गया व्यक्ति भी मुझे अपनी बुआ बता रहा है. मेरा ऐसे लोगों से कोई रिश्ता नहीं है."

हालांकि, जेल से छूटने के तत्काल बाद चंद्रेशखर ने मायावती से भले ही क़रीबी होने की बात की, लेकिन अगले ही दिन बीबीसी से बातचीत में चंद्रशेखर का रुख़ बिल्कुल बदला हुआ था.

चंद्रशेखर से क्यों नाराज़ हुईं मायावती

चंद्रशेखर का कहना था, "मायावती तो सर्व समाज की बात करती हैं. उनका दलितों से कोई वास्ता नहीं है. बीएसपी पार्टी भले है, लेकिन वो तो सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय पर काम करती है. उसके तो कई विधायक भी सवर्ण हैं."

हालांकि, चंद्रशेखर को समय से पहले रिहा करने को लेकर ये अटकलें भी लगाई जा रही थीं कि इससे बीजेपी भीम आर्मी और दलितों की सहानुभूति अर्जित कर लेगी.

इन अटकलों को तो चंद्रशेखर ने रिहा होने के तत्काल बाद ही ख़ारिज कर दिया था. लेकिन सबसे ज़्यादा हैरान करने वाला बयान बीएसपी प्रमुख मायावती का रहा.

बहुजन समाज पार्टी की राजनीति पर नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक बद्री नारायण मायावती और चंद्रशेखर की इस बयानबाज़ी को जायज़ ठहराते हैं.

बद्री नारायण कहते हैं, "मायावती नहीं चाहतीं कि चंद्रशेखर उनकी पार्टी में या उनके क़रीब आएं. ऐसा इसलिए, क्योंकि तब हो सकता है कि उनकी अहमियत कम हो जाए. चंद्रशेखर युवा हैं, संघर्ष किया है, उनके साथ युवाओं की एक बड़ी टीम है. दूसरी ओर मायावती को बहुजन समाज पार्टी में चुनौती देने वाला अभी तक कोई है नहीं. तो वो चंद्रशेखर को अपनी पार्टी में लेकर या फिर क़रीब लाकर अपने लिए ही मुश्किल क्यों खड़ी करेंगी."

चंद्रशेखर से दूरी क्यों रखना चाहती हैं मायावती

लगभग इसी तरह की राय लखनऊ स्थित वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान रखते हैं.

बीबीसी से बातचीत के दौरान शरत प्रधान कहते हैं, "चंद्रशेखर मायावती के लिए चुनौती हैं, वो भले इसे न स्वीकार करें. मायावती को ये पता है कि चंद्रशेखर उनके लिए चुनौती बनकर खड़े हैं. मायावती से नाराज़ दलित समुदाय के लिए भीम आर्मी एक बेहतर विकल्प है. दूसरा, ये भी एक संयोग है कि जिस सहारनपुर से मायावती ने अपनी राजनीति की शुरुआत की, भीम आर्मी और चंद्रशेखर का कार्यक्षेत्र भी वही है. इसलिए मायावती दूरी बनाकर चलना चाहती हैं. चंद्रशेखर को अपने समानांतर खड़े होने नहीं देना चाहतीं."

शरत प्रधान के अनुसार, मायावती ये तो स्वीकार कर सकती हैं कि चंद्रशेखर बीएसपी में शामिल होकर राजनीति करें, लेकिन दूसरे संगठन के साथ दलित नेता के रूप में वो उन्हें अपने बराबर बिल्कुल नहीं बर्दाश्त करेंगी.

लेकिन कुछ लोगों की राय इससे बिल्कुल अलग है. उनके अनुसार भीम आर्मी और बीएसपी भले ही अलग दिख रहे हों, लेकिन दलित समुदाय के लिए दोनों एक जैसे ही हैं.

दलित आंदोलन और राजनीति पर नज़र रखने वाले मेरठ विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सतीश प्रकाश कहते हैं, "बहुजन समाज पार्टी और भीम आर्मी दोनों दलित हितों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं और दोनों एक हैं. कहीं कोई दिक़्क़त नहीं है. चंद्रशेखर ने बुआजी की बजाय मायावती को बहनजी कहा होता तो शायद ये स्थिति न आती. बुआजी कहने से मायावती नाराज़ हो गई होंगी. लेकिन इसका ये बिल्कुल मतलब नहीं कि इससे दोनों अलग हैं."

दलित राजनीति के नेतृत्व का मसला

सतीश प्रकाश को भीम आर्मी संगठन के थिंक टैंक के रूप में भी जाना जाता है.

उनका कहना है, "मायावती को बहुजन समाज या दलित समाज बहनजी कहता है और वो इसे पसंद भी करती हैं. दूसरे, बुआजी उन्हें अखिलेश यादव ने तब कहा था जब सपा और बसपा के रिश्ते ठीक नहीं थे. यानी अखिलेश ने बुआजी किसी सम्मान में नहीं बल्कि तंज़ में कहा था."

सतीश प्रकाश यह भी कहते हैं कि बीएसपी यदि भीम आर्मी से दूरी बनाने का कथित दिखावा कर भी रही है तो ये सिर्फ़ राजनीतिक विवशता है, सच्चाई नहीं.

वहीं, जानकारों का ये भी कहना है कि चंद्रशेखर के उपनाम 'रावण' की वजह से बीएसपी खुलकर उनका साथ देने से इसलिए भी हिचक रही है कि कहीं इससे उसके सवर्ण मतदाता न प्रभावित हो जाएं. शायद इसका एहसास चंद्रशेखर को भी हो गया और उन्होंने अपने नाम के साथ रावण उपनाम न लगाने की अपील जारी कर दी.

बहरहाल, सच्चाई जो भी हो. लेकिन चंद्रशेखर का मायावती से बुआ का रिश्ता जोड़ना और फिर मायावती का उस रिश्ते को बेरहमी से ख़ारिज कर देना, दोनों के बीच मधुरता का संकेत तो नहीं ही देता है.

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