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मोदी के लिए ताबड़तोड़ प्रचार से इनकार तक...बाबा रामदेव की पॉलिटिक्स क्या है
- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
स्वामी रामदेव ने टीवी चैनल एनडीटीवी के युवा कॉनक्लेव कार्यक्रम में साफ़-साफ़ कहा कि वे सर्वदलीय और निर्दलीय हैं.
इसके बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या वे 2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का प्रचार नहीं करेंगे, तो उन्होंने कहा कि ''भला क्यों करेंगे, नहीं करूंगा.''
हालांकि इसी कार्यक्रम में उन्होंने ये भी कहा कि कालाधन, भ्रष्टाचार और व्यवस्था में परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर उनका मोदी जी पर भरोसा था. ये भरोसा अभी है या नहीं, पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर उन्होंने फ़िलहाल मौन रखा है.
ये बाबा रामदेव का नया अंदाज़ है और राजनीतिक तौर पर नई पोज़िशनिंग है. 2019 के आम चुनाव के नज़दीक आने से पहले वे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से एक तरह से दूरी बरत रहे हैं.
ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले मोदी सरकार से दूरी बरतने का संकेत स्वामी रामदेव ने नहीं दिया था. दिसंबर, 2016 में द क्विंट से बातचीत में उन्होंने एनडीए सरकार के राजगुरु कहे जाने पर उसे अतीत की बात बताया था.
लेकिन बाबा रामदेव कथित तौर पर इतने पॉलिटिकल हैं कि उनके किसी भी राजनीतिक फ़ैसले का अंदाज़ा एक दो बयानों से नहीं लगाया जा सकता.
आख़िर इसी चार जून, 2018 को वो भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह से संपर्क फॉर समर्थन अभियान में मिले थे. इस मुलाकात के बाद अमित शाह ने मीडिया में बयान दिया था, "बाबा रामदेव से मुलाकात का मतलब हम लाखों लोगों से मिल रहे हैं, उन्होंने अगले चुनाव के दौरान पूरा समर्थन देने का वादा किया है."
बाबा रामदेव का ये बयान क्या किसी बदली हुई राजनीतिक तस्वीर का संकेत है या फिर रामदेव दबाव बनाने की भूमिका बना रहे हैं. इस बात को आंकने से पहले मोदी के 2014 के चुनावी अभियान की कामयाबी में स्वामी रामदेव की भूमिका को देखना होगा.
नरेंद्र मोदी का ताबड़तोड़ प्रचार
चुनावी समर से ठीक पहले देश भर में रामदेव नरेंद्र मोदी के समर्थन में कसीदे पढ़ते हुए यूपीए सरकार की आलोचना करते नजर आ रहे थे.
चार जून, 2013 को समाचार चैनल एबीपी के सवालों का जवाब देते हुए बाबा रामदेव ने कहा था, "नरेंद्र मोदी में तीन ऐसी बातें हैं जिनके चलते मैं उनका समर्थन कर रहा हूं. मोदी देश में स्थायी और मज़बूत सरकार दे सकते हैं."
"वे एक ऐसे शख्स हैं जो काले धन, भ्रष्टाचार और व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दों पर सहमत हैं. इसके अलावा जितने भी सर्वे हुए हैं, उनमें वे सबसे आगे चल रहे हैं. मैंने लाखों किलोमीटर की यात्रा की है, लोगों का समर्थन उनको मिल रहा है."
यहां ये बात ध्यान रखने की है कि चार जून, 2013 को रामदेव तब नरेंद्र मोदी को देश का अगला प्रधानमंत्री बता रहे थे जब मोदी को उनकी पार्टी ने चुनाव समिति का चेयरमैन भी नहीं बनाया था. नरेंद्र मोदी को चुनाव समिति के चेयरमैन की ज़िम्मेदारी नौ जून, 2013 को मिली थी.
यहां से शुरू होने के बाद प्रधानमंत्री बनने तक स्वामी रामदेव हर मंच से मोदी को ईमानदार, राष्ट्रवादी और काले धन के ख़िलाफ़ स्टैंड लेने वाला नेता बताते रहे. इसी सिलसिले में, 29 दिसंबर, 2013 को बेंगलोर प्रेस क्लब में स्वामी रामदेव ने घोषणा की थी कि वे 'वोट फ़ॉर मोदी' नाम से डोर-टू-डोर कैंपेन चलाने जा रहे हैं.
लेकिन यह कोई अचानक से नरेंद्र मोदी-स्वामी रामदेव के बीच उपजा प्रेम नहीं था. दरअसल, 2011 के अप्रैल-जून में अन्ना हज़ारे के आंदोलन में जिस तरह से रामदेव बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे, उससे ये ज़ाहिर हो रहा था कि वे अपने लिए किसी बड़ी राजनीतिक भूमिका तलाश रहे हैं. हालांकि 4 जून, 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान से स्वामी रामदेव को जिस तरह महिलाओं के कपड़ों में भागना पड़ा, उसका मीडिया में ख़ूब मज़ाक बना. लेकिन रामदेव जल्दी ही उससे उबर गए.
हालांकि, इससे भी पहले 2010 में स्वामी रामदेव भारत स्वाभिमान के नाम से एक राजनीतिक पार्टी भी बना चुके थे. इसके गठन की घोषणा करते वक्त उन्होंने अगले आम चुनाव में प्रत्येक सीट से अपना उम्मीदवार उतारने की बात कही थी, लेकिन एक साल के अंदर ही उन्होंने अपना इरादा बदल कर भारतीय जनता पार्टी का साथ देने का मन बना लिया.
बीजेपी को कितना फ़ायदा पहुंचाया?
उनका ये फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी की राजनीति के अनुकूल साबित हुआ. दरअसल भारतीय जनता पार्टी का कोर वोट बैंक कथित तौर पर सर्वण मतदाता ही थे. गुजरात दंगों में मोदी की विवादास्पद भूमिका के चलते मुसलमानों का इस पार्टी को लेकर बना संदेह और पुख्ता हो चुका था, ऐसे में यूपीए सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए राजनीतिक तौर पर देश के पिछड़ों और दलितों का भरोसा जीतना ज़रूरी था.
रामदेव ने उस भरोसे को बनाने में एक तरह से पुलिया की भूमिका निभाई, क्योंकि ये वो दौर था जब योग के रास्ते बाबा सेलिब्रेटी हो चुके थे, मध्यवर्ग उनके योग शिविर में हज़ारों की संख्या में जुट रहा था और टीवी पर आने वाले उनके योग कार्यक्रम की पहुंच करोड़ों लोगों तक थी. आध्यात्म और राष्ट्रवाद के नाम पर बाबा रामदेव एक तरह से हिंदुत्व का चेहरा बन चुके थे.
काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ जो हवा बन रही थी, उसे बाबा रामदेव एक दिशा देने का काम करने में लगे थे और उनकी ये भूमिका कुछ ऐसी थी जिससे भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की चुनावी मुश्किल बेहद आसान होने जा रही थी.
2014 के चुनाव से ठीक दो सप्ताह पहले, नई दिल्ली में आयोजित मेगा योग कैंप में उन्होंने नरेंद्र मोदी को स्टेज पर आमंत्रित किया और हज़ारों लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि 'आप लोग ना केवल वोट डालने जाएंगे बल्कि दूसरे लोगों को समझाएंगे भी.'
रामलीला मैदान में हुए इस आयोजन में नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से कहा था कि उनका और बाबा रामदेव का लक्ष्य कॉमन है.
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि बाबा रामदेव को नरेंद्र मोदी से दूरी बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? हालांकि ये भी सच है कि एनडीटीवी के कार्यक्रम में वे नरेंद्र मोदी की किसी आलोचना से बचते नज़र आए, उनके मुताबिक दूसरे लोगों का मौलिक अधिकार है कि वे मोदी की आलोचना कर सकते हैं.
दांव पर है हज़ारों करोड़ का कारोबार
हालांकि बाबा रामदेव अगर अपना स्टैंड बदल रहे हैं तो इसे व्यवहारिकता के आईने में भी देखना होगा. बाबा रामदेव का पंतजलि आयुर्वेद का कारोबार हज़ारों करोड़ तक पहुंच गया है.
हाल ही में न्यूयार्क टाइम्स ने 'द बिलियनेर योगी बिहाइंड मोदी'ज राइज़' नाम से विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है. इसमें बाबा रामदेव कहते हैं कि 2025 तक उनका लक्ष्य अपने समूह के उत्पादों की बिक्री को 15 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है. ये मौजूदा वित्तीय साल में 1.6 अरब डॉलर तक है.
मोदी की सरकार में बाबा रामदेव का कारोबारी साम्राज्य कितना बढ़ गया है, इसकी झलक रायर्ट्स की एक खोजी रपट से भी लगाया जा सकता है जिसमें दावा किया गया है कि 2014 में मोदी सरकार के बनने के बाद पंतजलि समूह ने देश भर में 2000 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया है और कई मामलों में ये अधिग्रहण बेहद सस्ती दरों पर किया गया है. इसमें असम से लेकर महाराष्ट्र तक में बीजेपी शासित राज्यों की ज़मीनें शामिल हैं.
बीते साल जब हरिद्वार में रामदेव ने अपने पंतजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट का उद्घाटन किया तो ये काम उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के हाथों से ही कराया. इसके अलावा जिस तरह से मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में योग और आयुर्वेद को बढ़ावा दिया है, उसका अप्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा बाबा रामदेव के कारोबार को भी मिला है.
ऐसे में ये समझना मुश्किल नहीं है कि हज़ारों करोड़ रुपये का कारोबारी समूह चलाने वाले शख़्स के लिए अब मोदी की तरफ़दारी करना उस तरह से संभव नहीं रह गया है जैसी स्थिति 2014 से पहले थी. क्योंकि किसी एक राजनीतिक समूह से नज़दीकी भविष्य में उनके लिए मुसीबतों का जंजाल साबित हो सकती है.
इन सबके बीच हक़ीकत ये भी है कि बाबा रामदेव भारतीय राजनीति की नस नस से भी वाक़िफ हैं और समय-समय पर क्षेत्रीय दलों चाहे वो समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव रहे हों या फिर अतीत में बिहार के लालू प्रसाद यादव रहे हों, इन सबसे भी गलबहियां करते नज़र आए हैं.
क्या पता उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं नया मोड़ ले रही हो, जैसा कि न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बाबा रामदेव भारत के अगले डोनल्ड ट्रंप बनने की कोशिश कर सकते हैं, यानी खुद को सत्ता के शिखर पर देखने की उनकी महत्वाकांक्षा हो सकती है. हालांकि ऐसा उन्होंने कभी भी ज़ाहिर नहीं किया है.
रामदेव एनडीटीवी के ही कार्यक्रम में कहते हैं कि पॉलिटिकल पार्टी पूरा देश नहीं है, अभी उनकी ज़िंदगी बीती नहीं है, वे अगले पचास साल तक देश के लिए समाजिक, राजनीतिक और अध्यात्मिक तौर पर सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे और ये भूमिकाएं किस रूप में सामने आएंगी ये तो आनेवाले वक्त के गर्भ में है. अभी इसके बारे में अंदाज़ा लगाना शायद ठीक नहीं रहेगा.
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