You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: अनुशासन की बात करके लोकतंत्र कमज़ोर होता है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को दिल्ली में उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू की किताब 'मूविंग ऑन मूविंग फॉरवर्ड: ए इयर इन ऑफ़िस' का लोकार्पण किया.
इस दौरान दिए अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इन दिनों अनुशासन को 'निरंकुशता' करार दे दिया जाता है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, पुस्तक का विमोचन करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ''वैंकेया जी अनुशासन के प्रति बहुत आग्रही हैं और हमारे देश की स्थिति ऐसी है कि अनुशासन को अलोकतांत्रिक कह देना आजकल सरल हो गया है.''
प्रधानमंत्री ने कहा, ''अगर कोई अनुशासन का ज़रा सा भी आग्रह करे तो उसे निरंकुश बता दिया जाता है. लोग इसे कुछ नाम देने के लिये शब्दकोष खोलकर बैठ जाते हैं.''
प्रधानमंत्री द्वारा अनुशासन की बात कहने के क्या अर्थ हैं? और अगर कोई सरकार अनुशासन में रहने की बात कहती है तो क्या वह असहमति को दबा रही होती है? यही सब सवाल बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी ने वरिष्ठ पत्रकार एच.के. दुआ से पूछे.
पढ़ें एच.के. दुआ का नज़रिया
अगर कोई स्कूल टीचर अपनी क्लास में अनुशासन की बात करता है तो वह दूसरी बात है लेकिन जब देश की सत्ता में बैठे लोग अनुशासन की बात करते हैं तो वो बड़ा ख़तरनाक हो जाता है.
अनुशासन के नाम पर किसी चीज़ का बचाव नहीं करना चाहिए. सरकार जब अनुशासन की बात करती है तो वह कुछ नियंत्रित कर रही होती है, जैसे इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने से पहले किया था.
जब सरकार अनुशासन का नाम लेगी तो उससे लोगों को ख़तरा ज़रूर होता है क्योंकि अगर लोग सरकार की कही बात को नकारेंगे तो वह सरकार के हिसाब से अनुशासनहीनता कहलाएगी.
यही नहीं कभी-कभी तो सत्ता में बैठे लोगों ने अनुशासनहीनता की जगह 'देशद्रोही' शब्द का इस्तेमाल किया है. असहमति और लोकतंत्र साथ-साथ चलते हैं और जहां अनुशासन की बात आती है उससे लोकतंत्र के बल में कमी आ जाती है.
आलोचनाओं को नहीं सुनना चाहते
बीते दो-तीन सालों से ये देखने को मिला है कि असहमतियों को नियंत्रित किया जा रहा है.
सत्तारुढ़ दल के लोग देश के हित की बात का सवाल उठाकर कह देते हैं कि यह क्यों हो रहा है. आलोचना एक प्रकार से लोगों का अधिकार है लेकिन सत्तारुढ़ मंडली में इसे ग़लत तरीक़े से लिया जाता है.
दूसरों की आलोचनात्मक टिप्पणियों को वह अनुशासनहीनता बताते हैं. लोकतंत्र और अनुशासन में एक रिश्ता ज़रूर होता है जो ख़राब हो चुका है. हर बात पर अनुशासन की बात करना और लोकतंत्र को नियंत्रित करना देश के लिए ठीक नहीं है.
लोकतंत्र में अहमति बेहद ज़रूरी है और सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में यह कहा था.
असहमति को दबाना देश के लिए कितना ख़तरनाक?
असहमतियों को दबाने का ख़तरा हम इंदिरा गांधी के कार्यकाल में देख चुके हैं. उन्होंने अनुशासन के नाम पर लोकतंत्र को ख़त्म कर दिया और आपातकाल लगा दिया.
उनको भी पसंद नहीं था कि संसद में उनकी आलोचना हो, अख़बारों में आलोचना हो, न्यायपालिका से ऐसे फ़ैसले आ जाएं जो उनके ख़िलाफ़ हों.
किस-किस को अनुशासन सिखाया जा सकता है? लोकतंत्र में असहमति होगी ही. वह लोकतंत्र कैसा लोकतंत्र होगा जिसमें सब हां में हां मिलाने वाले लोग होंगे.
हां में हां मिलाने वाले न सिर्फ़ देश के लिए बल्कि सरकार के लिए भी ठीक नहीं होते हैं. असहमतियों से तो सरकार को सीखना चाहिए कि उसके पीछे जनता की क्या भावनाएं हैं.
असहमतियों से ऐसी बातें पता चलती हैं जो देश के हित में होती हैं.
आपातकाल लगने से पहले और आपातकाल के दौरान भारत जो ख़तरा झेल चुका है, उसके काले बादल अब मंडरा रहे हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)