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पुणे पुलिस ने पेश किया फ़र्जी पत्र: सुधा भारद्वाज
महाराष्ट्र पुलिस ने बीते मंगलवार को देश के अलग-अलग हिस्सों से भारत के पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया था.
पुलिस ने ये गिरफ़्तारियां इस साल जनवरी में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा की जांच के सिलसिले में की.
गिरफ़्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ताओं में वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस शामिल हैं.
शुक्रवार को मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में महाराष्ट्र पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (लॉ एंड ऑर्डर) पीबी सिंह ने कहा कि जांच से पता चला है कि माओवादी संगठन एक बड़ी साज़िश रच रहे थे.
पीबी सिंह ने मीडिया के सामने कई पत्र पढ़े जिसके ज़रिए बताया गया कि ये सामाजिक कार्यकर्ता सीधे माओवादी सेंट्रल कमेटी के संपर्क में थे. इन पत्रों में सुधा भारद्वाज द्वारा कथित तौर पर सेंट्रल कमेटी को लिखा गया पत्र भी शामिल था.
सुधा का जवाब
पुलिस के इन आरोपों के बाद अब अपने ही घर में नज़रबंद की गई वकील सुधा भारद्वाज ने अपना पक्ष सामने रखा है. उन्होंने एक चिट्ठी के ज़रिए अपनी बात रखी है.
सुधा भारद्वाज ने पुलिस के ज़रिए पेश किए गए पत्र को मनगढ़ंत बताया है. उन्होंने लिखा है कि इस तरह के पत्रों को पेश कर उनकी आपराधिक छवि प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही है.
सुधा लिखती हैं कि जिस तरह की बैठकों को आपराधिक तौर पर पेश किया गया है वे किसी से छिपी नहीं हैं, बहुत सी लोकतांत्रिक गतिविधियों, बैठकों, सेमिनारों और विरोध प्रदर्शनों को यह कहकर रोक दिया गया है कि उनके पीछे माओवादियों का हाथ है.
शुक्रवार को की गई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पुलिस का कहना था कि ये कार्यकर्ता माओवादियों के साथ-साथ कश्मीर में अलगाववादियों के संपर्क के में भी थे. इसके जवाब में सुधा भारद्वाज ने लिखा है, ''मैं विशेषतौर पर बताना चाहती हूं कि मैंने मोगा में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए कभी भी 50 हज़ार रुपये नहीं दिए थे. इसके अलावा मैं महाराष्ट्र के किसी अंकित को नहीं जानती ना ही कॉमरेड अंकित को जानती हूं जो कश्मीरी अलगाववादियों के संपर्क में है.''
सुधा लिखती हैं, ''गौतम नवलखा को जानती हूं जो कि एक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. इसके साथ मैं जगदलपुर में न्यायिक सहायता पहुंचाने वाले समूहों को जानती हूं और मैंने कभी किसी प्रतिबंधित संगठन से किसी तरह के फंड का लेनदेन नहीं किया है.''
सुधा ने यह चिट्ठी अपनी वकील वृंदा ग्रोवर के ज़रिए सार्वजनिक की है. सुधा ने अपनी चिट्ठी के ज़रिए वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता डिग्री प्रसाद चौहान को जानने की बात भी कही है. उन्होंने लिखा है कि डीपी चौहान पर लगाए गए आरोप भी निराधार हैं.
पुलिस अधिकारी गिरफ़्तार लोगों को 'माओवादी हिंसा का दिमाग़' बता रहे हैं. पुलिस का ये भी कहना है कि भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के लिए भी इन लोगों की भूमिका की जाँच की जा रही है.
पुलिस का आरोप है कि 31 दिसंबर 2017 को भीमा कोरेगाँव में भड़काने वाले भाषण दिए गए थे. इस मामले में आठ जनवरी को केस दर्ज किया गया था. पीबी सिंह ने कहा कि गिरफ़्तार लोग कबीर कला मंच से जुड़े हुए हैं.
सुधा ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि जो भी वकील या कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ के बस्तर में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों को सामने ला रहे थे उनके ख़िलाफ़ यह बदले की कार्रवाई की जा रही है.
फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओ उनके घरों में ही नज़रबंद रखा गया है. इस मामले की अगली सुनवाई छह सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होगी.
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